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    बढ़ रहा प्रदूषण प्रकृति को दे रहा विनाश

    Pollution

    सात वर्ष पहले भी इसी क्षेत्र में बादल फटने से हजारों लोग मौत के मुंह में समा गए थे। प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए प्रबंधों को बढ़ाने के साथ-साथ प्रकृति के इशारों को समझना भी बहुत जरूरी है। वह चेतावनियां सच साबित हो रही हैं जो कई दशकों से पर्यावरण वैज्ञानिक देते आ रहे थे कि धरती का लगातार बढ़ रहा तापमान शांत पड़े ग्लेशियरों को परेशान कर रहा है।

    उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने से नदी में बाढ़ आने से प्राकृतिक आपदा आ गई है। इस तबाही में अभी तक 10 के करीब शव बरामद किए जा चुके हैं व 100 से अधिक लोगों के लापता होने की खबरें हैं। बचाव कार्य लगातार जारी है। राहत की बात यह है कि 16 मजदूरों को तपोवन टनल से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। सरकार ने पूरी सक्रियता दिखाते हुए प्राकृतिक आपदा के साथ निपटने के लिए आपदा प्रबंधन टीम के सदस्यों को एयरलिफ्ट किया गया है। आपदा में फंसे व्यक्तियों को बचाने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी जा रही। यह पूरी तबाही मानवता व सरकारों के लिए बड़ी सीख है। सात वर्ष पहले भी इसी क्षेत्र में बादल फटने से हजारों लोग मौत के मुंह में समा गए थे।

    प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए प्रबंधों को बढ़ाने के साथ-साथ प्रकृति के इशारों को समझना भी बहुत जरूरी है। वह चेतावनियां सच साबित हो रही हैं जो कई दशकों से पर्यावरण वैज्ञानिक देते आ रहे थे कि धरती का लगातार बढ़ रहा तापमान शांत पड़े ग्लेशियरों को परेशान कर रहा है। ग्लेशियरों का पिघलना या टूटना मानवता व पूरे वातावरण के लिए खतरनाक है।

    देश में सख्त कानून होने के बावजूद अवैध माईनिंग लगातार जारी है। वृक्षों की चोरी-छिपे कटाई भी चल रही है। विकास कार्याें के लिए करोड़ों वृक्ष काटे जा रहे हैं। इन काटे गए वृक्षों की जगह नए पेड़-पौधे लगाए जा रहे हैं लेकिन इनके बड़े होने में 5-7 साल का वक्त लगेगा जो बहुत सी बड़ी परेशानियां खड़ी करने वाला है। वृक्षों की लगातार हो रही कटाई से पक्षी जगत भी बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। प्रवासी पक्षियों की आमद पर इसका काफी प्रभाव दिखाई दे रहा है। पर्यटन उद्योग से रोजगार तो बढ़ा है लेकिन प्रकृति के साथ छेड़छाड़ भी बहुत बढ़ी है। साफ-सुथरे पहाड़ी क्षेत्रों में प्रदूषण व गंदगी फैलने का मुख्य कारण पर्यटन है।

    बढ़ रहे निर्माण कार्यों से वृक्षों का क्षेत्रफल कम हो गया है। समय पर बरसात नहीं हो रही, कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं बाढ़ आ रही है। बाढ़ आने का मुख्य कारण भी वृक्षों की लगातार हो रही कटाई है। कभी पहाड़ों में जंगल भी बाढ़ के आगे दीवार बन जाते थे। बांधों के निर्माण के समय वृक्षों की कटाई बडेÞे स्तर पर हुई है। कट रहे वृक्ष, बढ़ रहा प्रदूषण प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन रहा है। अभी भी वक्त है सरकारें व मनुष्य वातावरण सरंक्षण की ओर तेजी से आगे बढ़ें। वातावरण का सरंक्षण ही भावी जीवन की गारंटी है, जिसे हर हाल हासिल करना होगा।

     

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