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    गरीबी की बढ़ती खाई

    Increasing poverty gap

    पूरे उत्तर भारत में आजकल शीतलहर का प्रकोप चल रहा है। देश के बहुत सारे लोग इस ठंड के कारण बहुत परेशानी में है। इसके बावजूद जो लोग इस ठंड में आराम से अपना समय बिता रहे हैं और अपने घर में हैं। वे दुनिया के सबसे खुशनसीब लोगों में से एक हैं, क्योंकि दुनिया में करीब 380 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी बहुत मुश्किल काम है। इनमें से बहुत कम लोगों के पास अपना खुद का घर है। यह दुनिया की उन सच्चाइयों में से एक है जिनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। समस्या यह है कि देश में अमीर लोग और अमीर होते जा रहे हैं तथा गरीब और ज्यादा गरीब होते जा रहे हैं। क्योंकि दुनिया के सिर्फ 26 अमीर लोगों के पास जितना पैसा है उतना पैसा दुनिया के 380 करोड़ गरीब लोगों के पास भी नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था आॅक्सफैम के अनुसार पिछले वर्ष दुनिया के 62 अमीर लोगों के पास इन 380 करोड़ गरीबों से भी ज्यादा संपत्ति थी। जबकि इस वर्ष दुनिया के आठ लोगों के पास दुनिया की आधी आबादी से ज्यादा संपत्ति है। लगातार बढ़ती आर्थिक असमानता को दशार्ने वाले आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं।

    आॅक्सफैम के इस सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय अरबपतियों की आमदनी में 2200 करोड़ का इजाफा होने से अमीर उन्तालीस फीसद और अमीर हो गए हैं। देश में बीते एक वर्ष में शीर्ष एक फीसद लोग उन्तालीस फीसद और अमीर हुए हैं, जबकि पचास फीसद आबादी की अमीरी केवल तीन फीसद ही बढी है। वहीं, देश में दस फीसद लोगों के पास देश की सतत्तर फीसद संपत्ति है। देश के शीर्ष नौ अमीरों के पास पचास फीसद आबादी से भी ज्यादा पैसा है जो सरकारों की समावेशी विकास की तमाम नीतियों की सच्चाई को उजागर करता है। आज अमीर और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं । वहीं, गरीबों की गरीबी बढ़ने के अलावा इनकी दस फीसद आबादी 2004 से लगातार कर्ज में भी है। अमेरिकी अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था ने गरीबी – अमीरी की गहरी खाई को पैदा किया है, लेकिन भारत में नेताओं ने इसे वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर सियासी मकसद बना दिया है। इसीलिए देश में गरीबी मिटाने के लिए नहीं बल्कि, गरीबी के नाम पर वोट बैंक की राजनीति होती है।

    आॅक्सफैम के अनुसार दुनिया के आठ अमीर लोगों के पास कुल मिलाकर इकतीस लाख करोड रुपए की संपत्ति है। जबकि दुनिया भर के 360 करोड़ गरीब लोगों के पास कुल 28 लाख करोड़ की संपत्ति है। अगर इन 8 अमीर लोगों की संपत्ति का औसत किया जाए तो प्रत्येक के हिस्से में 3 लाख 47 हजार करोड रुपए आएंगे। जबकि गरीबों की संपत्ति में प्रत्येक की औसतन हिस्सेदारी 7 हजार 745 रुपए की है। यह आंकड़े दशार्ते हैं कि अमीरों और गरीबों के बीच की खाई कितनी गहरी है। अगर भारत के संदर्भ में देखें तो यहां अमीरों और गरीबों के बीच की यह खाई और भी गहरी है। देश में नौ लोगों के पास पचास फीसद से भी ज्यादा सम्पत्ति है। आॅक्सफेम की इसी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 360 करोड़ गरीब लोगों में से पच्चीस फीसद भारतीय उपमहाद्वीप में निवास करते हैं। आॅक्सफेम की सालाना रिपोर्टों की उपयोगिता यह है कि वह हर साल इस बढ़ती समस्या की ओर ध्यान दिलाती हैं ।

    मगर दिक्कत यह है कि वह उन्हीं उद्योगपतियों और राजनेताओं से समाधान की आस जोड़ती है, जो इस स्थिति से लाभान्वित और वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। यह बहुत विरोधात्मक स्थिति है कि देश के सिर्फ एक फीसदी लोगों के पास देश की साठ फीसद संपत्ति है। ऐसा तब है जब आजादी से अब तक देश की हर राजनीतिक पार्टी का वादा गरीबी उन्मूलन का रहा है। हर राजनीतिक पार्टी इसी वादे के साथ सत्ता में आती है कि वह गरीबी को जड़ से खत्म कर देगी। लेकिन सच्चाई यह है कि देश के बीस करोड़ लोग रोज रात भूखे सोने पर मजबूर हैं तथा अठारह लाख लोग बेघर हैं। देश के राजनेताओं को गरीबों में अपना बड़ा वोट बैंक दिखता है। शायद इसीलिए कोई राजनीतिक पार्टी नहीं चाहती है कि देश से गरीबी उन्मूलन हो।

    यह भारतीय राजनीति की अति गरीब सोच है जिसको बदले बगैर देश की तकदीर नहीं बदल सकती है। चुनावों के दौरान बड़े-बड़े नेताओं के एक्सक्लूसिव साक्षात्कार देखने को मिलते हैं। इन साक्षात्कारों में ये नेता गरीबी हटाने के बड़े- बड़े वादे भी करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद यह सभी नेता इन गरीबों को भूल जाते हैं। चुनाव के समय नेताओं को अपने भविष्य की चिंता रहती है। इसीलिए नेता गरीबों के घरों में चक्कर काट रहे होते हैं। चुनाव के बाद पूरे पाँच वर्षों तक गरीब कतार में खड़े रहते हैं। वादों के पूरा होने का इंतजार करते रहते हैं। लेकिन ज्यादातर गरीबों की उम्मीदों वाली झोली खाली ही रहती है। गरीबी नेताओं के लिए राजनीतिक गहना बन चुकी है, जिसे नेता हमेशा पहन कर रखना चाहते हैं। चुनावी मौसम आते ही नेताओं में गरीब दिखने की होड़ मच जाती है।

    देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियों के आदर्श महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया, भीमराव अंबेडकर और दीनदयाल उपाध्याय जैसे महापुरुष रहे हैं। इन महापुरुषों का मकसद समाज के पिछड़े गरीब लोगों की भलाई करना था। आज सभी राजनीतिक पार्टियां अपने आदर्शों की तस्वीरों का इस्तेमाल तो जरुर करती हैं, लेकिन उनके विचारों के अनुसार गरीबों का विकास नहीं कर पाती हैं। क्योंकि लोहिया, अंबेडकर जैसे महापुरुषों का मकसद राजनीति करना नहीं था। यह महापुरुष राजनीति में इसीलिए आए ताकि गरीबों का भला किया जा सके। लेकिन इन महापुरुषों के आदर्शों पर चलने की बात करने वाले नेता आज सिर्फ अपनी भलाई में जुटे हुए हैं। आज के नेता तस्वीर तो इन्हीं महापुरुषों की इस्तेमाल करते हैं।

    लेकिन करोड़ों की गाड़ियों में चलते हैं। महँगे – महँगे कपड़े पहनते हैं। इनकी जीवन शैली किसी अमीर आदमी से कम नहीं होती है। यही वजह है कि ये नेता गरीबों को गरीब रखकर अपना वोट बैंक सुनिश्चित करना चाहते है। चुनावी मौसम में गरीबों के करीब दिखने की कोशिश करते हैं। लेकिन इनमे से कोई नेता ऐसी नीति नहीं बना पाता है जिससे गरीबों को तन ढकने के लिए कपड़े, सिर ढकने के लिए छत, सोने के लिए बिस्तर और खाने के लिए दो वक्त की रोटी नसीब हो सके। गरीबों के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना सत्तर वर्ष पहले भी चुनौती था और आज भी उतनी ही बड़ी चुनौती है।

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