हमसे जुड़े

Follow us

13.1 C
Chandigarh
Sunday, February 8, 2026
More
    Home विचार लेख भारत के रूख म...

    भारत के रूख में बदलाव की आवश्यकता

    भारत के सिवाय और सभी मध्यम शक्तियां किसी न किसी गठबंधन प्रणाली का हिस्सा हैं इनमें से अधिकतर अमरीकी गठबंधन का हिस्सा है और उसके द्वारा उनकी सुरक्षा की गारंटी ली गयी है। यूरोपीय देश नाटो सुरक्षा प्रणाली के हिस्से हैं तथा जापान, कनाडा आस्टेÑलिया आदि देशों का अमरीका के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा समझौता है। इसलिए उनकी सुरक्षा चिंताएं सापेक्ष हैं। यदि वे किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं होते हो तो उन्हें अपनी रक्षा तैयारियों पर भारी धनराधि खर्च करनी पडती और गठबंधन का हिस्सा बनने से उन्हें अपने संसाधनों को बचाने में सहायता मिली।

    डा. डीके गिरी

    चीन द्वारा हाल ही में भारतीय भूभाग पर अतिक्रमण के बाद भारत और अन्य देशें के पर्यवेक्षकों को अपेक्षा थी कि भारत अपनी विदेश नीति में आमूल-चूल परिवर्तन करेगा तथा अल्पकाल में एक सुदढ़, विश्वसनीय और स्थायी सुरक्षा व्यवस्था का का निर्माण करेगा। दीर्घकाल में भारत से अपेक्षा है कि वह विश्व की अन्य शक्तियों के साथ मिलकर भारत और चीन के बीच में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए बफर जोन तिबत तथा चीन के कब्जे के अन्य भूभागों को मुक्त करने के लिए सहयोग करेगा। किंतु विदेश मंत्री एस जयशंकर के बयान से निराशा हुई। माइंड माइन शिखर सम्मेलन में उन्होंने कहा गुटनिरपेक्षता एक पुरानी अवधारणा है किंतु भारत न किसी गठबंधन प्रणाली का अंग है और न बनेगा। वह जापान, यूरोपीय संघ और अन्य मध्यम शक्तियों के लिए अपने द्वार खोल रहा है। जैसे-जैसे उन्होंने अपनी रणनीति स्पष्ट की उसमें विरोधाभास स्पष्टत: दिखायी देने लगे। यह तर्क दिया जाता रहा है कि भारत स्वयं अपने भूभागों की सुरक्षा के लिए एक पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था नहंी बना सकता है। आर्थिक रूप से अधिक मजबूत और आक्रामक चीन जैसे पड़ोसी के कारण भारत रक्षा खरीद पर चीन की सेना के समान खर्च नहीं कर सकता है और उसके साथ बराबरी नहीं कर सकता है। किंतु आज भारत रूस, अमरीका अ‍ैर फ्रांस से अपनी सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए हथियार खरीद रहा है।
    दूसरा, मोदी सरकार लगता है पुरानी गुटनिरपेक्ष की अवधरणा को अपनाए हुए है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू, ट्रंप, शिंजो आबे जैसे नेताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध बढ़ा रहे हैं किंतु किसी राष्ट्र के हितों को एक ढांचागत संबंधों से बढ़ावा दिया जाता है न कि व्यक्तिगत आधार पर। हालांकि व्यक्तिगत संबंध राष्ट्रों के हितों एवं सुरक्षा में सहायक होते हैं। गुटनरिपेक्ष नीति भी समय की कसौटी पर खरी नहीं उतरी क्योंकि हमें पाकिस्तान के साथ युद्ध के चलते सोवियत संघ के साथ मैत्री और सुरक्षा संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े।
    वस्तुत: यह एकपक्षीय युद्ध था क्योंकि पाकिस्तान ने बिना युद्ध किए आत्मसमर्पण कर दिया था। किंतु पाकिस्तान की ओर से अमरीका द्वारा हस्तक्षेप करने की संभावना थी और जिसके चलते भारत सोवियत कैंप में शामिल हो गया और उस समय सोवियत संघ दूसरी महाशक्ति थी। अब चीन लगातार भारत पर हमला कर रहा है और अभी भी हम अंधेरे में हाथ पांव चला रहे हैं। वस्तुत: चीन के बारे में वर्तमान सरकार ने नेहरू की तरह गलतियां की है हालांकि भाजपा का नेतृत्व नेहरू को नापसंद करता है किंतु आज भारत फिर वही पुरानी गुटनरपेक्ष नीति का शिकार बना है और वह सीधे चीन से निपटना चाहता है किंतु इसमें सफल नहंी हो रहा है।
    विदेश मंत्री के वक्तव्य में जिस विरोधाभास का मैंने उल्लेख किया वह यह है कि उन्होंने स्वयं अपने तर्क को काट दिया कि भारत किसी गठबंधन में शामिल क्यों नहीं हो सकता है। इसके विपरीत भारत को किसी न किसी गठबंधन प्रणाली का हिस्सा होना चाहिए क्योंकि भारत एक विकासशील देश है और सुरक्षा की दृष्टि से इसे खतरा पैदा हो सकता है। आर्थिक रूप से हम कमजोर हैं और हम चीन के विरुद्ध अपनी स्वतंत्र सुरक्षा प्रणली विकसित नहंी कर सकते हैं। विदेश मंत्री ने उन कारकों के बारे में बताया जो भारत की विदेश नीति को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा हमारे देश में पर्याप्त औद्योगिकीकरण नहंी हुआ। हमने अपने विनिर्माण क्षेत्र को बढावा नहंी दिया। हमने अपनी अर्थव्यवस्था को चीन से डेढ़ दशक बाद खोला और इन्ही कारणों से आज चीन की अर्थव्यवस्था भारत की अर्थव्यवस्था से पांच गुणा बड़ी है। विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि भारत की विदेश नीति अतीत के तीन बोझों को ढो रही है जिनमें विभाजन, दूसरा विलंब से आरंभ किए गए आर्थिक सुधार और परमाणु विकल्प चुनने में विलंब। विभाजन अपरिहार्य बन गया था किंतु यह अधूरा रहा। उन्होंने कहा कि यदि संपूर्ण कश्मीर भारत के पास होता तो कश्मीर भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने का कारक नहंी बनता। आर्थिक सुधारों के बारे में भी हम सोवियत संघ से प्रभावित रहे और हमने अन्य मॉडलों की ओर नहीं देखा। नेहरू और इंदिरा अपने दृष्टिकोण में पश्चिम विरोधी थे। किंतु वर्तमान सरकार भी इससे अलग नहीं है। चीन द्वारा हमारे भूभाग पर अतिक्रमण के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सबसे पहले रूस की यात्रा की। परमाणु विकल्प के बारे में नेहरू ने विलंब किया किंतु यह हमारी सुरक्षा रणनीति में अधिक प्रासंगिक नहीं है क्यंोंकि यह केवल शांतिपूर्ण प्रयोजनों के लिए है। परमाणु हथियार प्रतिरोधक के रूप में भी एक अच्छा विकल्प नहंी है क्यंोंकि इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता है। कुल मिलाकर हम आशा कर रहे थे कि एक नई विदेश नीति का निर्माण होगा न कि पुरानी तटस्थ और अप्रसांगिक गुटनिरपेक्ष रणनीति का। वस्तुत: जमीनी स्तर पर कार्यवाही से बढ़ावा मिलता है केवल बयानों से काम नहीं चलता है। समुद्र, हवाई क्षेत्र और जमीन पर संयुक्त सैनिक अभ्यासों से स्पष्ट होता है कि भारत किन-किन देशों के साथ सैनिक संबंध बना रहा है इसलिए शब्दों के बजाय कार्यवाही पर ध्यान देने वाली रणनीति पर बल दिया जाना चाहिए क्यंोंकि भारतीय केवल बडबोले होते हैं। यदि इस संस्कृति में बदलाव हो रहा है तो यह खुशी की बात है किंतु विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के बयान महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन बयानों को हमारे मित्र और शत्रु दोनों देशों द्वारा नीतियों के रूप में देखा जाता है।
    भारत किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं है यह किसी क्षेत्रीय सुरक्षा प्रणाली और अन्य उपप्रणाली का हिस्सा भी नहीं है। भारत की गुटनिरपेक्ष नीति के कारण उसे अपनी सुरक्षा प्रणाली पर भारी खर्च करना पड़ता है और विदेश मंत्री अब भी इसी रणनीति की बातें कर रहे हैं कि भारत किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं होगा। ऐसी रणनीति का परिणाम यह है कि भारत को हमेशा खतरा बना रहता है हालांकि उसके पास विश्व की चौथी सबसे बड़ी सेना है। इसके अलावा एक गुटनिरपेक्ष शक्ति के रूप में उसकी सुरक्षा पर अधिक खर्च होता है जिससे उसका विकास प्रभावित होता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और अन्य आर्थिक कार्यकलापों के मामले में ये मध्यम शक्तियां महाशक्तियों के साथ भी प्रतिस्पर्धा करती हैं।
    कुछ मध्यम शक्तियां कुछ क्षेत्रों में लाभ की स्थिति में है किंतु भारत इस मामले में कहीं नहीं है। ये मध्यम शक्तियां मध्यस्थता का कार्य कर सकती हैं या अंतराष्टÑीय स्तर पर निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं किंतु सुरक्षा और आर्थिक रूप से भारत की कमजोरी के कारण भारत वह भूमिका नहीं निभा पाता है। भारत हमेशा से चीन और अमरीका के बीच सुलह कराने का प्रयास करता रहा जैसा कि पहले उसने अमरीका और सोवियत संघ के साथ किया था। इसीलिए भारत अमरीका और चीन दोनों के साथ व्यापार करना चाहता है। भारत में विदेश नीति निमार्ताओं को यह समझना होगा कि द्विपक्षीयता बने रहने का उसका दृष्टिकोण अधिक महत्वपूर्ण नहीं है और इसके कारण अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत कहीं का नहीं रह गया। मोदी की विदेश नीति अतीत से प्रभावित है। हाल ही में एक टीवी बहस में मैंने चीनी सामा्रज्य के विघटन की बात कही थी तो इस पर भाजपा के प्रवक्ता ने विरोध दर्ज किया और कहा कि हम किसी देश का विभाजन करना नहीं चाहते हैं। बंगलादेश का निर्माण परिस्थितियों के कारण हुआ। यह प्रवक्ता चीन एक देश और चीन एक साम्राज्य के बीच अंतर नहीं कर पाया। चीन साम्राज्य ने तिब्बत झिनजियांग और मंगोलिया के एक हिस्से पर जबरन कब्जा किया तथा हांगकांग और ताइवान की स्वतंत्रता और स्वायत्तता के लिए खतरा पैदा कर रहा है। विदेश मंत्री के सुर अतीत से मिलते हैं। इनमें कोई बदलाव नहंी आया है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी होगा और उन्हें आगे बढ़ाना होगा।

    अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।