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    शिक्षा व्यवस्था की अमानवीयता

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    शिक्षा की बदहाली और अमानवीयता को लेकर आज देशभर में चर्चा का बाजार गर्म है। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को अमानवीय बताया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि शिक्षा प्रणाली एक मशीन हो गई है जोकि क्लोन तैयार करने में लगी हुई है और व्यक्तित्व को पीछे छोड़ दिया है। पीठ ने यह मौखिक टिप्पणी एक छात्र द्वारा खुदकुशी मामले की सुनवाई के दौरान की।

    इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायलय ने भी कई बार हमारी शिक्षा प्रणाली की बदहाली पर सवाल उठाये हैं। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं। सुधार के बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं। छात्रों के शत-प्रतिशत नामांकन की बात कही जाती है, मगर पढ़ाई बीच में छोड़ने और गुणवत्ता की बातें गौण हो जाती हैं। माननीय न्यायालय की किसी पीठ की शिक्षा के सम्बन्ध में टिप्पणी आने पर एक बार फिर शिक्षा की बदहाली की बेइंतहा चर्चा शुरू हो जाती है। कुछ दिनों तक पत्रावलियां इधर-उधर खिसकती हैं, राजनेताओं के बयान आते हैं और एक बार फिर जस की तस स्थिति हो जाती है।

    यूनेस्को सहित अनेक संस्थाओं ने अपनी रिपोर्टों में देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं और बताया है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भारी शैक्षिक विस्तार के बावजूद गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के कार्य में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां हमारी आधी से अधिक आबादी गरीबी में जीवन बसर कर रही है। रिपोर्टों में खुलासा किया गया है कि प्रारम्भिक शिक्षा का देहाती क्षेत्रों में हाल बहुत बुरा है।

    भारत में गुरूकुल की शिक्षा को आज भी याद किया जाता है। गुरूकुल की शिक्षा में हमारे आपसी सम्बन्धों, सामाजिक सांस्कृतिक एकता, गौरवशाली परम्पराओं को प्रमुखता से केन्द्र बिन्दु में रखा जाता था, ताकि बालक पढ़-लिखकर चरित्रवान बनें और उनमें नैतिक संस्कारों का समावेश हो। मगर आज की शिक्षा प्रणाली संस्कारों से हटकर अंक प्राप्ति तक सीमित होकर रह गई है। आज ज्ञान-विज्ञान का स्थान अंक अर्जित करने पर अधिक हो गया है। इसमें अर्थोपार्जन की भूमिका अधिक बढ़ गई है। भौतिक साधनों की प्राप्ति अहम हो गई है। देशसेवा, प्रेम और उच्च नैतिक मानदण्डों का इससे निरन्तर क्षरण हो रहा है। मूल्य आधारित शिक्षा का स्थान सुख-सुविधा ने ग्रहण कर लिया है।

    भारत की प्रारम्भिक शिक्षा की कमजोरियों के कारण ही हम शिक्षा की दौड़ में पिछड़े हैं और गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्राप्त करने के अभाव के कारण शिक्षा की बदहाली का रोना रो रहे हैं। बताया जाता है कि सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों एवं शिक्षा के अधिकार कानून के अमल में लाने के बाद स्कूलों में बच्चों के दाखिले की स्थिति में आशातीत सुधार परिलक्षित हुआ है। मगर गुणवत्तायुक्त शिक्षा में हम पिछड़ गये हैं। सरकारी स्कूलों के मामलों में निजी स्कूलों की स्थिति फिर भी अच्छी बताई जा रही है।

    सक्षम लोग आज सरकारी विद्यालयों की अपेक्षा निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पठन-पाठन में अधिक रूचि लेते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि सरकारी स्कूल पुरानी परिपाटी का अनुसरण कर रहे हैं। अध्यापकों की पठन-पाठन के काम में उदासीनता और लापरवाही ज्यादा है। ग्रामीण विद्यालयों की हालत अधिक बुरी है।

    भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली आज भी अपने अस्तित्व के चक्रव्यूह में फंसी हुई है । यहाँ सरकार बदलते ही प्रत्येक पांच वर्षों में पाठ्य-पुस्तकें बदल दी जाती हैं। छात्र पुस्तक देखकर एक बारगी चकरा जाता है। कहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री की फोटो डाल दी जाती है तो कहीं निकालने के आदेश हो जाते है। सरकारें अपने हिसाब से महा पुरुषों की जीवनियां शामिल करती है। कहीं महाराणा प्रताप को महान बताया जाता है तो कहीं अकबर की महानता का बखान होता है। छात्र इसी चक्रव्यूह में खो जाने को मजबूर होता है। सरकारें अपने हिसाब से पाठ्यक्रम तय करती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन राजनीतिक प्रपंचों से ऊपर उठकर शिक्षा का मूलभूत स्वरूप परिवर्तित कर इसे रोजगारोन्मुखी बनाया जाएँ, ताकि छात्र क्लोन नहीं बनकर स्वाभिमानी बनें।


    यूनेस्को सहित अनेक संस्थाओं ने अपनी रिपोर्टों में देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं और बताया है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भारी शैक्षिक विस्तार के बावजूद गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के कार्य में हम बहुत पिछड़े हुए हैं।

    बाल मुकुन्द ओझा


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