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    Gyanvapi mosque: ज्ञानवापी का मामला अदालत पर छोड़ना बेहतर

    Gyanvapi mosque

    Gyanvapi mosque: ज्ञानवापी परिसर का सर्वे आरंभ हो चुका है। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सर्वे की रिपोर्ट के बाद सच सबके सामने आ जाएगा। और इस सर्वे के आधार पर न्यायालय को भी निर्णय सुनाने में सहायता मिलेगी। ज्ञानवापी का मामला काफी लंबे से विवादों में है। इसे लेकर हिंदू व मुस्लिम दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं। लेकिन अंतिम निर्णय तो न्यायालय को ही करना है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा सर्वे को न्यायहित में अनिवार्य माना है। अंजुमन इंतेजामिया कमेटी ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसकी तुरंत सुनवाई को मंजूरी भी दी है, लेकिन सर्वे जारी रहेगा। Gyanvapi mosque

    इस विवाद को अदालत के भरोसे छोड़ दिया जाना बेहतर है, लेकिन ऐसे अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य हैं, जो इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर का ही एक हिस्सा है, जिस पर मुगल काल में जबरन कब्जा कर मस्जिद खड़ी कर दी गई। कुछ समय पहले जब वजू खाने में शिवलिंग होने की बात सामने आई तब भी दीवारों और स्तंभों पर हिंदू धार्मिक प्रतीकों की बात उजागर हुई थी।

    देश-विदेश के अनेक पुरातत्व विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने भी इस बात को माना है कि ज्ञानवापी, विश्वनाथ मंदिर के हिस्से में ही बनाई गई और ऐतिहासिक शिवलिंग भी इसके नीचे दबा हो सकता है। एक नंदी प्रतिमा भी है, जो मस्जिद की तरफ मुंह करते हुए खड़ी है, जिसके आधार पर हिंदू पक्ष का दावा है कि भीतर शिवलिंग है। ये साक्ष्य कई पुस्तकों से संकलित किए गए हैं। यह बादशाह औरंगजेब की हुकूमत के दस्तावेजों से भी स्पष्ट है कि 1669 में मंदिर को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण कराया गया था। इस संदर्भ में वाराणसी की जिला अदालत ने दो कोर्ट कमिश्नरों की अध्यक्षता में ज्ञानवापी परिसर का सर्वे कराया था। Gyanvapi mosque Survey

    सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने भी अयोध्या विवाद का फैसला एएसआई के सर्वे और खुदाई के आधार पर दिया था। एएसआई भारत सरकार की संस्था है और इसके पुरातात्विक निष्कर्षों को अधिकृत और विज्ञान-सम्मत माना जाता रहा है। इलाहाबाद अदालत ने मस्जिद कमेटी की दलीलों को खारिज कर दिया कि सर्वे से मस्जिद को नुकसान पहुंच सकता है। इन दावों को बेदम करार दिया गया।

    उच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष द्वारा खुदाई से ढांचे को होने वाले नुकसान की आशंका जताए जाने पर एएसआई को निर्देश दिया कि सर्वे के अत्याधुनिक तरीके अपनाए जाएं, जिससे इमारत को किसी तरह की क्षति न पहुंचे। एएसआई ने भी अदालत को आश्वस्त किया है कि आजकल बिना फर्श खोदे या दीवारों की ऊपरी परत को खुरचे भी भीतरी जानकारी हासिल करना संभव है।

    उल्लेखनीय है अयोध्या में खुदाई इसलिए हुई थी क्योंकि विवादित स्थल पर कोई इमारत नहीं थी। सर्वे वैज्ञानिक होगा और किसी भी तरह की खुदाई नहीं की जाएगी। ग्राउंड पेनिट्रेरटिंग रडार (जीपीआर) तकनीक का इस्तेमाल कर सर्वे किया जाएगा। फोटोग्राफी का भी इस्तेमाल किया जाएगा। बहरहाल चूंकि न्यायालय के आदेशानुसार सर्वे होगा और इसमें मस्जिद के ढांचे को क्षति न पहुंचे इसकी सावधानी रखी जाएगी, तब एतराज करने की बजाय मुस्लिम पक्ष को सहयोग करना चाहिए।

    14 मई, 2022 को जिन वकीलों ने सर्वे में भूमिका अदा की थी, उनके मुताबिक ज्ञानवापी के भीतर पान के पत्ते के आकार की फूल की आकृतियां, त्रिशूल, स्वास्तिक, दीवार पर अंकित श्लोक और 4 तहखाने भी हैं। काफी संख्या में कमल के फूल की कलाकृति पत्थरों पर खुदी दिखी। एक खंभे पर हिंदी में 7 पंक्तियों में कुछ शब्द उकेरे दिखे। छत वाले तीन गुंबदों के अंदर त्रिशंकु शिखरनुमा आकृतियां दिखीं। भीतरी भाग मंदिर-सा लगता है।

    उत्तर से पश्चिम दीवार के कोने पर मंदिर का मलबा पड़ा है, जिसमें देवी-देवताओं की कलाकृतियां और अन्य शिलापट्ट थे। शिलापट्ट पर शेषनाग की आकृति अंकित है। एक और शिलापट्ट पर सिंदूरी रंग की उभरी हुई कलाकृति है। देव-विग्रह में 4 मूर्तियों की आकृतियां थीं। दीपक जलाने की जगह बनी हुई थी। दीवारें, नींव, खंभा, कुंड, गर्भगृह का दरवाजा, वजूखाने की ओर नंदी का मुख, घंटियां आदि की आकृतियां छपी हुई नहीं, उकेरी हुई थीं।

    ऐसे में अहम प्रश्न यह है कि क्या किसी मस्जिद में ऐसी कलाकृतियां, आकृतियां और संरचनाएं होती हैं? स्कंदपुराण में भी ज्ञानवापी का विस्तृत उल्लेख है। कहा जाता है कि मस्जिद करीब 400 साल या 600 साल अथवा 1000 साल पुरानी है, इस तथ्य पर भी मुस्लिम संगठनों, नेताओं और धर्मगुरुओं में मतैक्य नहीं है। दरअसल दलीलें ये भी दी जा रही हैं कि उपासना स्थल कानून, 1991 के मद्देनजर इस मस्जिद से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। Gyanvapi mosque

    बहरहाल इसकी अंतिम व्याख्या तो सर्वोच्च अदालत ही करेगी, लेकिन इस कानून की संवैधानिकता पर सवाल करने वाली कुछ याचिकाएं शीर्ष अदालत के ही विचाराधीन हैं। सभी पक्षों को उस निर्णय की भी प्रतीक्षा करनी चाहिए। किसी भी सुव्यवस्थित देश में अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा एक मानवीय जरूरत है। भारत का संविधान इसकी गारंटी देता है।

    ज्ञानवापी के अलावा मथुरा की शाही मस्जिद का मामला भी ऐसा ही है। ये दोनों हिंदुओं की आस्था के बड़े केंद्र हैं। इनको लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बना रहे तो ये भावी पीढ़ियों के लिए भी तकलीफदेह होगा। होना तो ये चाहिए था कि स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद एक निश्चित समयावधि में ऐसे सभी मामलों को सुलझा लिया होता, जिससे कि व्यर्थ के तनाव न पैदा होते। कोई भी फैसला वैज्ञानिक सबूतों और ऐतिहासिक तथ्यों की रोशनी में होना चाहिए।

    पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक मीडिया साक्षात्कार में ज्ञानवापी मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि, अगर ज्ञानवापी को मस्जिद कहेंगे तो विवाद तो होगा ही। सरकार ज्ञानवापी विवाद का समाधान चाहती है। वर्तमान स्थितियों में ऐसा नहीं लगता है कि मुस्लिम पक्ष योगी आदित्यनाथ के सुझाव को स्वीकार करेंगे। ज्ञानवापी का प्रकरण चूंकि अदालत की निगरानी में है इसलिए उसका निर्णय तो अब वहीं से होना ठीक रहेगा।

    डॉ.आशीष वशिष्ठ, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं स्वतंत्र पत्रकार

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