महामारी में 10 हजार परिवारों को बेघर किया जाना इंसानियत नहीं : यूएन

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20 हजार बच्चे, 5 हजार गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सरकार से अपील की

  • खोरी गांव मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट करेगा पुनर्विचार अपील पर सुनवाई

सच कहूँ/अनिल कक्कड़, चंडीगढ़। हरियाणा के फरीदाबाद के खोरी गांव में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद ढहाए जा रहे मकानों और बेघर हुए लोगों की सुध लेते हुए संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत की मोदी सरकार से इन लोगों की रक्षा करने की अपील की है। वहीं उन्होंने कहा कि महामारी के दौरान पलायन और बेघर होने के इस कठिन वक्त में अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदाय के 20 हजार से ज्यादा बच्चे हैं। 5,000 से ज्यादा गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। इनकी सुरक्षा और शिक्षा के साथ ही स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जाए। इसके साथ ही यह भी अपील की गई है कि अपने ही देश के कानून की अनदेखी करते हुए भारत सरकार खोरी के निवासियों को बिना समुचित मुआवजे और व्यवस्था के जबरन बेघर न करे। बता दें कि अरावली की पहाड़ियों और जंगलों की जमीन पर अवैध कब्जों पर बने इन मकानों को तोड़ने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने पारित किया था, जिसके बाद प्रशासन लगातार वहां के मकानों को तोड़ रहा है।

वहीं सुप्रीम कोर्ट सोमवार को पुनर्विचार अपील पर सुनवाई करेगा। इस अपील में अरावली की पहाड़ियों और जंगल की जमीन पर जबरन कब्जा कर बनाए गए खोरी गांव को 19 जुलाई तक ढहाए जाने के आदेश पर फिर से विचार करने की गुहार लगाई गई है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जंगल की जमीन पर कब्जा किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगा। हरियाणा की भाजपा-जजपा सरकार ने खोरी गांव से हटाए जाने वाले लोगों को वैकल्पिक तौर पर फ्लैट्स और जमीन मुहैया कराने की स्कीम दी है लेकिन गांव वालों ने योजना स्वीकार नहीं की। वहीं संयुक्त राष्ट्र की तरफ से बयान जारी करने वाले बालकृष्णन राजगोपाल, मैरी लॉलर, सेसिलिया जिमेनेज डेमरी, फर्नांद डि वेरेनेस, पेड्रो अरोजो अगुडो, ओलिवर डे शटर और कोंबू बॉली बेरी आदि विशेषज्ञों ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की भूमिका कानून की रक्षा के साथ साथ जनता के बुनियादी अधिकारों का संरक्षण और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त मानवाधिकार कानूनों की रक्षा भी है। खोरी गांव के लोगों के मामले में जो आदेश हुआ वह भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के उद्देश्यों और प्रावधानों के मुताबिक नहीं है।

बिजली-पानी काट देना इंसानियत के खिलाफ

वहीं विशेषज्ञों ने प्रशासन द्वारा इस भयानक महामारी और तपती गर्मी के बीच बिजली और पानी की लाइने काट देने के कृत्यों का अमानवीय बताया। विशेषज्ञों ने सरकार से अपील की है कि कोरोना की इस भयानक महामारी के दौर में इतने बड़े स्तर पर लोगों को बेघर करना उनका जीवन तबाह करने जैसा होगा। उन्होंने मांग की कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की परिपालना पर पुनर्विचार करे, क्योंकि ऐसे कदमों से सरकार के उस लक्ष्य को नहीं पाया जा सकता, जिसके मुताबिक 2022 तक देश में हर नागरिक को घर मुहैया कराए जाने का संकल्प है।

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