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    Bhognadih clash: ”झारखंड में ‘हूल दिवस’ पर लाठीचार्ज, अंग्रेजी हुकूमत जैसी बर्बरता”

    Bhognadih clash
    Bhognadih clash: ''झारखंड में 'हूल दिवस' पर लाठीचार्ज, अंग्रेजी हुकूमत जैसी बर्बरता'' Photo- 'X'

    Jharkhand Hul Diwas 2025: रांची। वर्ष 1855 में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रारंभ हुई संथाल क्रांति की स्मृति में प्रति वर्ष मनाए जाने वाले हूल दिवस के अवसर पर इस बार झारखंड के साहिबगंज जिले स्थित ऐतिहासिक ग्राम भोगनाडीह में आदिवासी समुदाय और पुलिस-प्रशासन के बीच टकराव हो गया, जिसके कारण राज्य की राजनीति में उबाल आ गया है। Bhognadih clash

    यह वही पावन भूमि है जहाँ 30 जून 1855 को वीर सेनानियों सिदो-कान्हू ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंका था। हूल दिवस पर आयोजित राजकीय कार्यक्रम के समानांतर जब शहीदों के वंशजों और स्थानीय ग्रामीणों ने अपना स्वतंत्र कार्यक्रम आयोजित करने का प्रयास किया, तो प्रशासन द्वारा उसे हटाने की कार्रवाई के चलते दोनों पक्षों में तनाव उत्पन्न हो गया। इसके बाद पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और आंसू गैस के उपयोग की घटनाएं सामने आईं।

    नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि हूल क्रांति की पुण्यभूमि पर लाठीचार्ज और बल प्रयोग अत्यंत निंदनीय है। उन्होंने इसे राज्य सरकार द्वारा जनजातीय समाज पर किया गया दमन बताते हुए कहा कि “यह घटना हमें अंग्रेजों के अत्याचार की याद दिलाती है। आज छह पीढ़ियों बाद फिर एक बार सिदो-कान्हू के वंशज अन्याय के विरुद्ध सड़कों पर उतरने को विवश हुए हैं।” Jharkhand Hul Diwas News

    मरांडी ने अपने सामाजिक मीडिया संदेश में आरोप लगाया!

    मरांडी ने अपने सामाजिक मीडिया संदेश में आरोप लगाया कि “घुसपैठियों को संरक्षण देने वाली सरकार नहीं चाहती कि आदिवासी समाज अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा ले। लेकिन यह साजिश कभी सफल नहीं हो पाएगी।” गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने भी सोशल मीडिया पर लाठीचार्ज में घायल ग्रामीणों की तस्वीरें साझा करते हुए इसे शर्मनाक बताया और सरकार से आदिवासियों के साथ किए गए व्यवहार पर प्रश्न उठाए।

    इसी प्रकार भाजपा नेता अमर कुमार बाउरी ने कहा कि “जिस पावन भूमि पर वीरता और बलिदान की गाथाएं गूंजती हैं, वहाँ आज सरकारी दमन और राजनीतिक अहंकार का बोलबाला है। सरकार आदिवासियों की अस्मिता को सम्मान देने की बजाय उनकी आवाज़ को दबाने में लगी है।” निष्कर्षतः, हूल दिवस पर हुई यह घटना राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक माहौल को झकझोरने वाली है। वीर शहीदों के सम्मान और आदिवासी अस्मिता की रक्षा के प्रश्न पर अब राज्य सरकार की भूमिका और नीयत को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। Bhognadih clash

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