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    लोकसभा चुनाव 2019: नेताओं की बढ़ रही धड़कनें, देखते हैं कौन भारी?

    Lok Sabha Elections 2019

    नेताओं की तैयारी, जनता की समझदारी

    -लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ईमानदार और स्वच्छ छवि के उम्मीदवारों का चयन जरूरी

    नई दिल्ली सच कहूँ/जसविन्द्र सिंह। वायदों, घोषणाओं और आरोप-प्रत्यारोप के तीखे वारों के बीच चुनावी थाली सज रही है। जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आती जा रही हैं, वैसे-वैसे उम्मीदवारों की धड़कनें तेज हो रही हैं। आए दिन कुछ नया देखने और सुनने को मिल रहा है। मीडिया अपने धर्म से विमुख सा नजर आ रहा है। निजी चैनल चाटुकारिता की हदें पार करते दिखाई देते हैं। चलिए अब बात करते हैं मुद्दे की।

    पिछले चुनाव में मोदी लहर के बीच भाजपा ने आमजन के मन में जो आस जगाई थी, पिछले पाँच सालों वो कितनी पूरी हुई ये तो देश की जनता ही बताएगी। लेकिन नौकरियों, भ्रष्टाचार, महंगाई जैसे अहम मुद्दों पर सरकार की कार्रवाई का ज्यादा असर देखने को नहीं मिला। हालांकि विदेशों से संबंध सुधारने, सड़क निर्माण, शौचालय निर्माण, उज्जवला योजना और पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकियों की पनाहगाह पर वायुसेना की एयर स्ट्राइक से वाहवाही जरूर मिली। हालांकि पिछली सरकार के वायदों की अधूरी फेहरिस्त भी सत्ताधारी पार्टी के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं।

    -वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने वालों से रहना होगा सावधान

    दूसरी ओर कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में गरीबी के खिलाफ जंग का ऐलान कर सत्ता पक्ष के लिए चुनौतियां जरूर पेश कर दी हैं। लेकिन चुनावी रणनीति की धुरंधर मानी जाने वाली भाजपा और उसके सहयोगी दल अब कांग्रेस की इस चाल को कैसे मात देती है, ये काफी रोचक होगा। इस सबके बीच पिछली सरकारों के अधूरे वायदों की बनिस्पत कांग्रेस के लिए आमजन के मन में अपने वायदों को पूरा करने का विश्वास जगाना भी किसी चुनौती से कम नहीं होगा

    आमतौर पर नजर आता है कि चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक पार्टियां अपनी गोटियां फीट करके अहम मुद्दों से ध्यान भटकाकर शराब, पैसों या अन्य प्रलोभनों से वोट हासिल कर सत्ता पर काबिज हो जाती हैं। अब ये देखना काफी रोमांचक होगा कि देश की जनता इस चुनावी रण में अहम मुद्दों को तव्वजों देती है या फिर राजनीतिक पार्टियों द्वारा वॉर रूम में बिछाई गई बिसात में उलझकर अपने वोट का इस्तेमाल करेगी।

    लड़ें नहीं समझें

    वर्तमान दौर में हर व्यक्ति किसी-न-किसी पार्टी से अपने आपको इस कदर जोड़ चुका है कि उसे जनता के वास्तविक मुद्दों बेरोजगारों की फौज, गरीबी के चलते भूख से सिसकती जनता, भ्रष्टाचार, शिक्षा का गिरता स्तर से मानों कुछ लेना-देना नहीं है। एक बार अगर आप किसी नेता के खिलाफ थोड़ा बोल दें तो नौबत लड़ाई तक की आ जाती है, जो कि लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं है। जबकि नेता हमसे कितना इत्तेफाक रखते हैं या हमारे कितने हितैषी हैं, इस पर विचार करने की कोई जहमत नहीं उठा रहा है। जबकि इस वक्त देश के प्रत्येक के सिर पर नागरिक हिन्दू, मुस्लिम या जात-पात में बंटने और सत्ता और विपक्ष की चिकनी चुपड़ी बातों में आने की बजाय सतर्क होकर एक ईमानदार और स्वच्छ छवि का प्रत्याशी चुनने की जिम्मेदारी है, जिसे हमें बखूबी निभाना होगा।

    जनता से दूरी बनाने वालों से करें परहेज

    अक्सर देखा जाता है कि चुनाव के वक्त नेता आपकी खुशामद करते हैं और जीत दर्ज करते ही दूरी बना लेते हैं। फिर जब भी आप कोई समस्या लेकर जाते हैं तो मिलना तो दूर की बात है, नजदीक तक फटकने नहीं दिया जाता और आप स्वयं को ठगा सा महसूस करते हैं। ऐसे नेताओं को सबक सिखाने का यही सही वक्त है।

    ये हैं मुख्य मुद्दे

    -धन कुबेरों और बाहुबलियों को सत्ता से दूर करना
    -देश से गरीबी और भिक्षावृत्ति को हटाना
    -पढ़े-लिखे युवाओं को रोजगार दिलाना
    -दफ्Þतरों में रिश्वत लेने वालों पर नकेल कसना
    -जात-पात और धर्म के नाम पर हिंसा को रोकना
    -आतंकवाद की जड़ को खत्म करना

    कांग्रेस ने ये खोला पिटारा

    -गरीबों के खातों में हर साल डाले जाएंगे 72000 रुपये
    -22 लाख सरकारी नौकरियों के पदों को भरा जाएगा।
    -रेल बजट की तर्ज पर किसानों के लिए अलग बजट बनेगा।
    -शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का 6 फीसदी खर्च किया जाएगा।
    -मनरेगा के तहत 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन रोजगार

    ऐसे बिछती है चुनावी बिसात

    मिशन 2019 को कामयाब बनाने के लिए जुटी पार्टियों के वॉर रूम न सिर्फ पार्टी की रणनीति को अमलीजामा पहनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, बल्कि नेताओं के दौरों को तय करने से लेकर हर उस क्षेत्र के मौसम तक का अपडेट तैयार करने में जुटे हैं, जहां नेताओं की अहम रैलियां हैं। इसके अलावा इसी वॉर रूम के जरिए ही विरोधी नेताओं की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों और उन्हें जवाब देने के लिए भी अपने नेताओं को इनपुट देने की जिम्मेदारी दी गई है।

    हर पहलू पर नजर

    एक पार्टी से जुड़े सूत्र के अनुसार वॉर रूम में टीवी स्क्रीन के अलावा तैनात कार्यकतार्ओं और कर्मचारियों को बाकायदा लैपटॉप और कम्प्यूटर दिए गए हैं, जिन पर लगातार देश की राजनीतिक स्थिति पर नजर रखी जाती है।

    यूं चलता है काम

    वॉर रूम को कई भागों में विभक्त किया गया है, जिनमें कुछ की जिम्मेदारी मीडिया के जरिए अपने और विरोधी दलों के नेताओं के बयानों पर नजर रखी जाती है और जहां भी विरोधी नेताओं पर जवाब देने की जरूरत होती है, उसके बारे में फौरन आलाकमान को जानकारी दी जाती है। वॉर रूम से मॉनीटरिंग के अलावा उसके जवाब के लिए डेटा भी दिया जाता है। मसलन, अगर विपक्षी पार्टी को घेरना है तो फौरन ही वॉर रूम में ऐक्टिव लोग मामले से जुड़े पहलुओं की जानकारी लेकर फौरन अपने नेताओं को देता है।

    हर गतिविधि पर नजर

    कौन सा नेता कब किस जगह सभा करने जाएगा और वहां तक पहुंचने के लिए विमान, हेलिकॉप्टर और कार की कैसे व्यवस्था होगी, यह सारा काम भी एक हिस्से में होता है। इसी विभाग के लोग तय करते हैं कि किस नेता को क्या वाहन दिया जाए और फिर वहां नेता को छोड़कर उस विमान या हेलिकॉप्टर को आगे कहां भेजना है। यही नहीं, जिस जगह सभा है, वहां किस तरह के मुद्दे हैं, जिन पर पार्टी के नेता को बोलना चाहिए, उसके टॉकिंग पाइंट जुटाने की भी जिम्मेदारी वॉर रूम में तैनात लोग ही निभाते हैं।

     

     

     

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