‘‘मेरे मुर्शिद के चरणों में कहीं कंकर भी न चुभ जाएं’’

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डॉक्टर साहिबानों की सलाह के अनुसार पूजनीय परम पिता जी प्रतिदिन सेवादारों के साथ किसी खुली व स्वच्छ जगह पर सैर करने के लिए जाते थे। आप जी ने अपने टहलने के लिए जो जगह पंसद की थी वहां की भूमि कंकरीली एवं पथरीली थी। समस्त भूमि पर कंकरों की मोटी तह बिछी हुई थी। पूज्य हजूर पिता जी को जब यह पता चला कि पूजनीय परम पिता जी ने अपने टहलने के लिए जिस रास्ते का चयन किया है वह कंकर, पत्थरों से भरा हुआ है तो उन्होंने सोचा कि मेरे मुर्शिद के चरणों में कहीं कंकर न चुभ जाएं। अत: वे कस्सी और झाडू लेकर पूरी रात उस रास्ते को साफ करने में लगे रहे।

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सुबह जब पूजनीय परम पिता जी टहलने के लिए उस रास्ते की तरफ गए तो उस रास्ते की कायापल्ट देखकर दंग रह गए तथा पूज्य हजूर पिता जी की तरफ देखकर फरमाने लगे, आंखों ही आंखों में बातें हुई, शायद कह रहे थे कि हमारे लिए इतना कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता थी। उल्लेखनीय है कि पूजनीय परम पिता जी रोजाना तीस-चालीस कदम ही चलते थे। लेकिन उस दिन पूजनीय परम पिता जी अपनी लाठी को फैंककर बिना किसी सहारे के लगभग 300 कदम (जहां तक पूज्य हजूर पिता जी ने सफाई की थी) तक चलकर गए। यह दृश्य देखकर सब हैरान रहे कि वाह सतगुरू तेरे खेल निराले हैं।

 

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