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    मालवा के खिलाड़ी देश के लिए जीत रहे ‘सोना’

    Malwa

    खिलाड़ी खेलो में गोल्ड मैडल हासिल कर कर रहे माता पिता का सपना साकार

    मानसा (सुखजीत मान)। मालवा (Malwa Punjab)क्षेत्र के खिलाड़ी अब मालवा क्षेत्र की पहचान बनने लगे हैंं। पंजाब में किसी समय पर भी कोई लहर चले तो मालवा से संबंधित खिलाड़ी उसमें अग्रणी होते हैं। साहित्यक व संगीतक क्षेत्र में मालवा की बड़ी देन है। भारत को दुनिया के खेल नक्शे पर चमकाने में भी मालवा वालों का अहम योगदान है। अभी हुए एशियाई खेलों के अलावा कल ही खत्म हुई 52वीं विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप में इस क्षेत्र के खिलाड़ी गोल्ड मैडल जीतकर देश के लिए ‘स्वण पुत्र’ साबित हुए हैं। विवरणों मुताबिक एशियाई खेलों में 20.75 मीटर गोला फेंककर देश को गोल्ड मैडल जिताने वाला तेजिन्दरपाल सिंह तूर मोगा जिले के गांव खोसा पांडो के साथ सबंधित है।

    तेजिन्दरपाल सिंह तूर को गोला फेंकने की उत्साह घर में से ही अपने चाचे से मिला व तूर के गोल्ड मैडल जीतने की खुशी तो उसके पिता क्रम सिंह सहित सभी परिवार ने खुशी मनाई थी परंतु कैंसर की लाईलाज बीमारी से पीड़ित होने के कारण वह अपने गोल्ड मैडलिस्ट विजेता बेटे के घर लौटने से पहले ही जिंदगी की जंग हार गए। इसके अलावा भारत को रोइंग मुकाबलों में से गोल्ड मैडल जिताने वाले खिलाड़ी स्वर्न सिंह और सुखमीत सिंह जिला मानसा से सबंधित हैं। भारतीय सेना में सेवाएं निभा रहे यह दोनों खिलाड़ी किश्ती चला कर पानी में से सोना निकालने में माहिर हो गए हैं।

    खिलाड़ियों को देश के लिए गोल्ड मैडल जिताने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है इसका सबूत एशियाई खेल बाद में मानसा रेलवे स्टेशन पर पहुंचे स्वर्न सिंह के हाथों से की गई मेहनत को देखकर मिला। स्वर्न सिंह मानसा जिलो के गांव दलेलवाला का जमपल है अपने खेलों के साथ-साथ वह घोड़ी रखने का भी शौकीन है। स्वर्न सिंह ने खेल कैरियर की शुरूआत सेना में भर्ती होने बाद में ही की थी।

    शुरूआती हालात यह रहे कि उसका वेतन उसके खेल अभ्यास पर ही खर्च हो जाता था। माता पिता ने खिलाड़ी को प्रोत्साहन दिया व जरूरत लायक और पैसे घर से उसको भेजे जाते। अर्जुन अवार्ड से सम्मानित स्वर्न सिंह का कहना है कि पड़ोसी राज्य हरियाणा खिलाड़ियों को मेहनत का मूल्य देता है और पंजाब सरकार को भी चाहिए कि वह उन जैसी खेल नीति बनाए सुखमीत सिंह का गांव भी जिला मानसा में किशनगढ़ फरवाही है। सुखमीत ने भी खेल की शुरूआत स्वर्ण की तरह ही सेना में भर्ती होकर की वह अपना आदर्श भी स्वर्न सिंह को ही मानता है। सुखमीत के घर में भी आर्थिक हालात कोई बहुत से अच्छे नहीं थे। सुखमीत और उसका भाई मनदीप सिंह सेना में भर्ती हुए तो घर की कबीलदारी पटड़ी पर लौट आई।

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