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    Earth: ताकि धरती बची रहे और हम जीव-जंतु भी

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    Earth: ताकि धरती बची रहे और हम जीव-जंतु भी

    Earth: धरती, जिसने हमें जीवन दिया, आज खुद जीवन की आस में कराह रही है। मनुष्य की अनियंत्रित लालसा, भोगवादी सोच और प्रकृति से दूरी ने इस धरती को संकट में डाल दिया है। जब-जब मानव ने प्रकृति से अधिक लेने की कोशिश की है, तब-तब उसने अपना ही नुकसान किया है। आज स्थिति यह है कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, मौसम असंतुलित हो गए हैं, और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ गई है। Earth

    संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछली सदी में धरती का औसत तापमान 1.4 फारेनहाइट तक बढ़ा है। इसका सीधा असर हिमखंडों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर के बढ़ने और चरम मौसमी घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है। अंटार्कटिका से हर साल लगभग 148 अरब टन बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्री तटवर्ती और द्वीपीय देशों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। Earth

    धरती को बचाने के लिए दुनिया भर के देशों ने कई संधियाँ की हैं, जैसे क्योटो प्रोटोकॉल, जिसे 160 देशों ने स्वीकार किया, परन्तु कुछ बड़े प्रदूषक देश इससे पीछे हट गए। परिणामस्वरूप, समस्या और गहरी होती चली गई। आज का युग प्लास्टिक का युग बन गया है। भारत में हर साल 50 मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। अधिकांश प्लास्टिक रिसायकल नहीं हो पाता और सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी में पड़ा रहता है। अमेरिका और इटली जैसे देश सबसे अधिक प्लास्टिक उत्पादक और उपभोक्ता हैं। प्लास्टिक के जलने से जो गैसें निकलती हैं, वे ओजोन परत को क्षति पहुंचा रही हैं। इसी प्रकार, रेफ्रिजरेटर व अन्य उपकरणों से निकलने वाली क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैसें भी ओजोन में छेद कर रही हैं, जिससे हानिकारक पराबैंगनी किरणें धरती तक पहुंचने लगी हैं।

    रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति नष्ट हुई है, बल्कि मिट्टी जहरीली भी हो गई है। केंचुए और अन्य लाभकारी कीट समाप्त हो गए हैं। दूध, सब्जियां, अनाज और पानी प्रदूषित हो चुके हैं, जिससे कैंसर, दमा, त्वचा रोग, टायफायड, मस्तिष्क ज्वर जैसी बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। कारखानों का दूषित जल बिना उपचार के नदियों में डाला जा रहा है। यमुना दिल्ली और आगरा के बीच एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है। गंगा का जल अब पीने योग्य नहीं रह गया है। गोमती, वरुणा और असी जैसी नदियाँ शहरों का कचरा ढोने को विवश हैं। नदियों को जीवनदायिनी से प्रदूषण की धार बना दिया गया है।

    यदि हम वाकई धरती को बचाना चाहते हैं, तो हमें अपनी जीवनशैली बदलनी होगी। प्लास्टिक की थैलियों की जगह जूट या कपड़े के थैले अपनाने होंगे। रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद और देसी कीटनाशकों को बढ़ावा देना होगा। किसानों को इको-फ्रेंडली खेती की ओर प्रेरित करना होगा। साथ ही, हमें अपने बच्चों को भी प्रकृति के साथ जुड़ने का पाठ पढ़ाना होगा।

    हर व्यक्ति को छोटे-छोटे प्रयासों से बदलाव की शुरूआत करनी होगी। हमें अपने दैनिक जीवन में ऐसे निर्णय लेने होंगे जो धरती के हित में हों। सिर्फ 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाना काफी नहीं है, बल्कि हर दिन हमें यह याद रखना होगा कि धरती है तो हम हैं। यदि हमने समय रहते चेतना नहीं दिखाई, तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए केवल संकट और पछतावा ही शेष रह जाएगा। Earth
                                                                                                      (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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