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    अर्थव्यवस्था में खुलापन ही एकमात्र मंत्र

    Economy

    अर्थव्यवस्था को तेजी से पटरी पर लाने के लिए भारत को लॉकडाउन को पूरी तरह समाप्त करना होगा। लॉकडाउन एक झूले की तरह है। केन्द्र सरकार लॉकडाउन को खोलने के लिए उत्सुक है किंतु राज्य सरकारों का रूख एक जैसा नहीं है और देश भर में अलग अलग राज्य दैनिक, साप्ताहिक या घंटों के आधार पर लॉकडाउन की घोषणाएं कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, तमिलनाडू, राजस्थान और महाराष्ट्र सहित अनेक राज्यों ने कई हिस्सों में फिर से कर्फ्यू लगा दिया है। कुछ ही राज्य पूरी तरह कार्य कर रहे हैं। इसके चलते आपूर्ति, व्यापार, परिवहन, स्वास्थ्य व्यवसाय, आदि प्रभावित हो रहे हैं और देश भर में अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है।

    देश में लगभग 40 करोड़ लोग अभी भी स्थानीय स्तरों पर लॉकडाउन में हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार लोगों के स्वास्थ्य और जीवन का ध्यान रख रही है। यह एक सांत्वना की बात है। आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव ने अनलॉक प्रक्रिया शुरू करने से पहले कहा था कि यह बीमारी इतनी घातक नहीं है। उनके अनुसार छोटे शहरों में इस बीमारी से मृत्यु दर 1 प्रतिशत से भी कम है। अनलॉक के बाद सभी सावधानी बरतने लग गए हैं और इस बात के पुख्ता साक्ष्य नहंी हैं कि स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन से कोरोना महामारी के प्रसार में कमी आयी है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन से इस पर प्रभाव पड़ा है।

    लगभग आधा वर्ष पहले दिसंबर 2019 से आर्थिक संकट के कारण और फिर कोरोना महामारी के कारण अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ रही है। अनलॉक के बाद आॅटोमोबाइल जैसे बड़े उद्योगों का प्रदर्शन अच्छा दिख रहा है फिर भी उनका सामान्य कामकाज शुरू नहीं हो पा रहा है। अमरीका की नीतियों में उतार चढाव से विश्व अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ रहा है और पोत परिवहन संचालन तथा अन्य बाधाओं के कारण यह और प्रभावित हुई है। चीन के साथ व्यापार युद्ध से अमरीका बहुत प्रभावित हुआ है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका की बड़ी कंपनिया जैसे ड़िज्नी, एपल आदि प्रभावित हुए हैं।

    भारत भी चीन द्वारा सीमा पर अतिक्रमण और आर्थिक अतिक्रमण से प्रभावित हुआ है। भारत ने चीनी माल और 59 एप्स पर प्रतिबंध लगाए हैं। इस पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारत ने विकल्पों की तलाश शुरू कर दी है किंतु मनमोहनोक्सि पर लंबे समय तक निर्भरता के कारण इसमें विलंब हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के सपनों के अनुसार पूर्ण स्वदेशी या आत्मनिर्भर भारत एक लंबा समय लेने वाली प्रक्रिया है। इसलिए इन प्रयासों में तेजी लाने के लिए पूर्णत: अनलॉक किए जानेकी आवश्यकता है।

    श्रम भागीदारी दर, संचालन सूचकांक, बिजली खपत आदि जैसे मुख्य आर्थिक कारक जुलाई के महीने में निचले स्तर पर रहे हैं। नोमुरा इंड़िया बिजनेस इंड़ेक्स 12 जुलाई तक गिरकर 66.8 अंक तक आ गया था जबकि 5 जुलाई को यह 69.3 और जून अंत में 70.5 था। जून में मांग कुछ बढी। जीएसटी के अंतर्गत ईवे बिल जून 15 को 18.7 मिलियन तक पहुंच गए थे। जबकि जुलाई में यह 17.2 मिलियन रह गए। इसी तरह श्रम भागीदारी में भी गिरावट आ रही है। गूगल द्वारा 10 बिलियन ड़ालर और फेसबुक तथा क्वालकाम जैसी अन्य कंपनियों द्वारा निवेश की घोषणा उत्साहवर्धक है और देश में पूर्णत: अनलॉक होने के बाद यह प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

    किसी शहर या राज्य प्रशासन द्वारा बीच बीच में लॉकडाउन की घोषणा से मांग और उत्पादन प्रभावित हो रहे हैं। बड़े विनिर्माता और उपभोक्ता वस्तुओं, स्मार्ट फोन, आॅटोमोबाइल आदि के विक्रेताओं को आरंभ में अनलॉक के लाभ मिल रहे थे वे कम होने लग गए हैं। इससे ट्रकों की आवाजाही प्रभावित हो रही है जो पहले ही ड़ीजल के उंचे दामों से प्रभावित हो रहा है। उत्तर प्रदेश और बंगलुरू, गोहाटी, कोलकाता आदि जैसे शहरों में साप्ताहांत पर लॉकडाउन के कारण कंपनियों के माल की बिक्री 30 प्रतिशत तक कम हो गयी है। आयात नीति भी स्थिर नहीं है।

    देश को स्वदेशी आत्मनिर्भरता के बारे में स्पष्ट रूपरेखा अपनानी होगी। उच्च शुल्क नीति उचित नहंी है क्योंकि देश कच्चा माल और उत्पादित माल के लिए चीन सहित विभिन्न देशों पर निर्भर है। देश को इस दुविधा से बाहर आना होगा कि पूर्णत: स्वदेशी उत्पादन हो या स्वदेशी-विदेशी का मिश्रण हो। राजनीतिक नेतृत्व को स्पष्ट करना होगा कि वे गांधीवादी समाधान चाहते हैं या आधुनिक समाधान। कोई भी पार्टी इसका उत्तर नहीं दे सकती है। इसके लिए राष्ट्रीय आम सहमति के आधार पर अगले 30 वर्र्षाे के लिए योजना बनानी होगी।

    सार्वजनिक क्षेत्र को बंद कर निजी क्षेत्र को बढावा देने की नीति पर भी पुनर्विचार करना होगा। सार्वजनिक क्षेत्र ने न केवल उत्पादन गुणवत्ता अपितु श्रम नियमों में भी मानक स्थापित किए हैं। श्रम कानूनों में संशोधन कर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की क्षमता को कम किया जा रहा है। इसके अलावा हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड़ जैसी कंपनियों को नौसेना के हेलीकाप्टरों के उत्पादन का आदेश न देकर निजी क्षेत्र की सहायता की गयी है। मोदी सरकार ने कई अच्छे कदम उठाए हैं। उसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को स्वतंत्र रूप से कार्य करते देना चाहिए ताकि निजी क्षेत्र भी गुणवत्ता के मानकों को प्राप्त कर सके।

    भारत को अमरीका से सबक लेना चाहिए जहां पर निजी क्षेत्र के विकास के बावजूद सरकारी क्षेत्र के साथ कोई समझौता नहीं किय गया है और अधिकतर पश्चिमी देशों ने इस मॉड़ल को अपनाया है। निजी क्षेत्र से कहा जाना चाहिए कि वह सरकारी क्षेत्र की बराबरी करे किंतु उसकी कीमत पर नहीं। निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र को इस देश को मजबूत बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए न कि एक दूसरे को समाप्त करने के लिए। दोनों में जनता का पैसा लगा होता है और दोनों का विकास देश के लिए लाभप्रद है।

    देश के समग्र आथिक विकास के लिए दोनों का विकास आवश्यक है न कि देश के कुछ चुनिंदा लाभप्रद रेलमार्गों को निजी क्षेत्र को सौंप दिया जाए। यह प्रफुल्ल पटेल की एयर इंड़िया को समाप्त करने की नकल लगता है। भारत को त्वरित आथिक विकास के मार्ग पर आगे बढना होगा और कोरोना महामारी के बावजूद लॉकडाउन को पूर्णत: समाप्त करना होगा। रेलवे का सामान्य संचालन शुरू करना होगा ताकि अर्थव्यवस्था में और गिरावट न आए। हमारा देश आशंकाओं या भय से घबराता नहीं है। साहसिक और व्यावहारिक कदम उठाकर आने वाला समय भारत का होगा।

                                                                                                                   -शिवाजी सरकार

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