राजनीतिक प्रयोगों का दौर

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आगामी वर्ष पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव होंगे, घोषणा होना अभी बाकी है। चुनावों में अभी काफी वक्त है लेकिन पार्टियों में घमासान मचना शुरू हो गया है। पार्टियों के लिए राजनीति का एक ही अर्थ और एक ही उद्देश्य रह गया है कि चुनाव जीतना। इस उद्देश्य को लेकर पार्टियां नए से नए प्रयोग करने और कोई भी जोखिम लेने के लिए तैयार हैं। इस विषय को आप पंजाब के उदाहरण से समझ सकते हैं। पंजाब में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर छोटे से लेकर बड़े नेताओं में हलचल देखी जा रही है। पुराने व बड़े नेताओं को दरकिनार कर सिद्धू को प्रधान बनाने की चर्चा यहां सबसे दिलचस्प है। पार्टी में दो गुट बनते नजर आ रहे हैं। पुराने नेताओं ने मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह के समर्थन में मोर्चा खोल दिया है और नई पीढ़ी के नेता और अमरेन्द्र सिंह से नाराज नेता नवजोत सिद्धू के साथ एकजुट हो रहे हैं।

कांग्रेस के इस नए प्रयोग से पनपा संकट कैसे टलेगा, यह तो समय ही बताएगा। दूसरी तरफ शिरोमणी अकाली दल द्वारा पुराने कांग्रेसी नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने की कोशिशें जारी हैं। साथ ही जो शिरोमणी अकाली दल अपनी सरकार में सहयोगी रही पार्टी भाजपा की उप-मुख्यमंत्री बनाने की मांग को ठुकराता रहा है, वही अकाली दल अब एक नहीं, बल्कि दो-दो उप-मुख्यमंत्री के वायदे कर चुका है। चुनावों के घमासान में एक और घटिया चलन यह है कि इंसानियत, भाईचारा, वास्तविक्ता जैसे गुणों के अब कोई मायने नहीं रहे। सत्ता की भूख में राजनीति इस हद तक गिर चुकी है कि पावन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी के मामले को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। सत्ता के लालच में उन डेरा श्रद्धालुओं को झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है जो दिन-रात सभी धर्मों की शिक्षा पर चलकर मानवता की सेवा कर रहे थे, जबकि देश की केंद्रीय जांच एजेंसी डेरा श्रद्धालुओं को निर्दोष करार दे चुकी है।

इस मामले में राजनीति इस कद्र हो रही है कि वास्तविक दोषियों को ढूंढने की बजाय यह मामला पार्टियों द्वारा एक-दूसरे पर आरोप लगाने तक सीमित हो गया है। यदि देखा जाए तब पंजाब में किसी भी पार्टी के पास जनता के मुद्दों के लिए कोई जवाब नहीं है। पंजाब की राजनीति में एक प्रयोग यह भी रहा है कि धार्मिक मुद्दों को उछालकर राजनीतिक कुर्सी को पक्का किया जाए, यह बुरा प्रयोग पंजाब की राजनीति पर ऐसा धब्बा है जिससे भावी पीढ़ियां शर्मसार होंगी। राजनेता समय के अनुसार राजनीतिक प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन ये प्रयोग मानवता, सामाजिक व धार्मिक भाईचारे को दांव पर लगाकर न हों। यह याद रखा जाना होगा कि राजनीति सेवा व मानवता के लिए है। राजनीति सत्ता का स्वार्थ बनाकर इतनी न बिगाड़ी जाए कि मानवता का शोषण हो।

 

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