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    किसानों की आय का हो स्थायी हल

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    हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में कांग्रेस को सत्ता मिलने के पीछे किसानों की कर्जमाफी की घोषणा ने अहम भूमिका निभाई। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दस दिन में कर्जमाफी का वादा किया था। शपथ ग्रहण के बाद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने किसानों की कर्जमाफी की घोषणा कर दी है। मध्य प्रदेश सरकार ने किसानों का 2 लाख तक का कर्जा माफ किया है, माना जा रहा है कि इस फैसले का असर करीब 30 लाख से ज्यादा किसानों पर पड़ेगा। जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने किसानों के मुद्दे विशेषकर किसानों की कर्जमाफी को विधानसभा चुनाव में उठाया उससे इस बात का आभास हो रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के एजेण्डे में किसान केन्द्रीय भूमिका में रहेंगे। किसानों के मुद्दे को उठाने का सियासी लाभ कांग्रेस को मिलते देख भाजपा भी सक्रिय हो गयी है, जिसकी बानगी पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रायबरेली की रैली के दौरान देखने को मिली।

    प्रधानमंत्री ने कांग्रेस और गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली में सेना के जवान और कर्जदार किसान के मुद्दे उठाते हुए तीखे प्रहार किए। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें बनी हैं और जनादेश की बुनियादी वजह किसान कर्जमाफी भी रही है। भूख, गरीबी, कर्ज से किलसते आदमी को और क्या चाहिए? लिहाजा बीते दो सालों के अंतराल में जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें कर्जमाफी ही जीत का प्राथमिक और बुनियादी फार्मूला साबित हुआ है। इन चुनावों में करीब 1.40 लाख करोड़ रुपए के कर्ज माफ करने की घोषणाएं की गईं, लेकिन करीब 80 हजार करोड़ के कर्ज ही अभी तक माफ किए गए हैं।

    रिजर्व बैंक के मुताबिक किसानों का कर्ज माफ करने के लिए सरकार को अतिरिक्त 2.20 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है। यह राशि कहां से आएगी और बजट में किस मद में उसे दिखाया जाएगा? भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी कहा कि चुनावी वादों में कृषि कर्जमाफी की घोषणा नहीं करनी चाहिए थी। खस्ता आर्थिक हालात में इतनी बड़ी रकम 10 दिन में इंतजाम करना कठिन है। साल 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा 36,000 करोड़ का कर्ज माफ करने के बाद सरकार को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा और उसे कर्मचारियों को वेतन देने में भी परेशानी का सामना करना पड़ा। आखिर किसान की आमदनी जीने लायक कब होगी और वह स्थिर कैसे होगी कि किसान को कर्ज ही न लेना पड़े? किसान बरसों बरस से सियासत का मोहरा बनता रहा है, आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किसानों की समस्याओं पर पर सियासी शोर जोर-जोर से सुनाई देगा लेकिन किसानों की समस्या का स्थायी हल कौन देगा यह अभी कहीं नजर नहीं आ रहा।

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