हमसे जुड़े

Follow us

30.7 C
Chandigarh
Friday, March 27, 2026
More
    Home विचार सम्पादकीय कला में राजनै...

    कला में राजनैतिक दखल व राजनैतिक कलाकार

    केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज नेहलानी ने इस्तीफे के बाद जो खुलासे किए हैं वह राजनैतिक पतन की निशानी है। राजनेता कला को अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं। कौन सी फिल्म को हरी झंडी देनी है, कौन सी फिल्म पर कितने कट लगाने हैं, यह भी मंत्रियों की मनमर्जी पर निर्भर करता है। यदि कोई अधिकारी स्वतंत्र होकर काम करता है तो उसे पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। नेहलानी ने दावा किया है कि एक मंत्रालय फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को रिलीज करने की अनुमति नहीं देना चाहता था।

    नेहलानी की तारीफ करनी बनती है जिन्होंने अध्यक्ष रहते हुए बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र रूप से फिल्मों के संबंध में निर्णय लिए, किंतु सिक्के का दूसरा पहलू काला है। यदि राजनेता कला में दखलअंदाजी करते हैं तो कलाकार भी राजनैतिक नेताओं की मंशा अनुसार फिल्मों का विषय तय करने की मानसिकता का शिकार हो रहे हैं, जो अपने आप में कला का अपमान है। ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म तब आई जब पंजाब विधानसभा चुनाव सिर पर थे। इस फिल्म में पंजाब में नशे की चपेट में आए युवाओं को दिखाया गया, जिससे शिरोमणी अकाली दल को चुनावों में नुक्सान पहुंचना तय था। अकाली दल ने अप्रत्यक्ष रूप से इसका विरोध कर फिल्म के प्रसार व सिनेमाघरों में पहुंचने पर विलम्ब करवा दिया। कलाकार राजनैतिक नेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर चुनावों पर आधारित फिल्में बनाने लग जाते हैं। यहां कला, कला न रहकर राजनैतिक प्रचार बन जाती है।

    कलाकार कला को बेचने लगता है। नि:संदेह सब पैसों का खेल बन जाता है। पैसे के बिना कुछ नहीं होता। राजनेता सत्ता में आने के लिए हर तौर-तरीके इस्तेमाल करते हैं किंतु जब किसी वस्तु को बुरी मंशा से इस्तेमाल किया जाए तो वह हथकंडा बन जाता है। सत्ता के खेल में कला का हथकंडा बनना कलाकार को बेईमान साबित करता है। कला के लिए आजादी जरूरी है, लेकिन आजादी के नाम पर किसी और के हाथ में खेलना कला का केवल प्रदर्शन है। राजनैतिक विषयों पर फिल्म बनाना गलत नहीं लेकिन राजनैतिक विचारधारा से फिल्म बनाना गलत है। अब ‘इन्दू सरकार’ की भी चर्चा हो रही है। फिल्मों की रिलीजिंग के लिए अदालतों के चक्कर भी लगा रहे हैं।

    इस घमासान में न तो राजनेता और न ही कलाकारों को क्लीन चिट दी जा सकती है। हर कला संदेश देती है लेकिन संदेश पर कला का ठप्पा लगाना कला को कमजोर करता है। कलाकार समाज की बेहतरी के लिए मानवीय जीवन को पेश करें। राजनेता फिल्मों को अपने उद्देश्य अनुसार बनवाने की बजाय कलाकारों द्वारा बनाई गई फिल्म में खुद की पहचान करें। फिल्म में दिखाए जा रहे जीवन दृश्य में से राजनेता यह जरूर देखें कि समाज कहां खड़ा है और उसे कहां ले जाने की जरूरत है।

    Hindi News से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।