मानसून सत्र का हंगामे की भेंट चढ़ना चिंताजनक

Monsoon Session

संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार हंगामे की भेंट चढ़ रही है। जहां महंगाई जैसे मुद्दों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर हावी होने का प्रयास कर रहा है, वहीं अब सत्ता पक्ष भी विपक्षी सासंद अधीर रंजन के विवादित ब्यान को लेकर विरोध का जवाब विरोध से देने के मूड़ में आ गए है। पक्ष-विपक्ष के बीच किसी भी मुद्दे पर आम सहमति न बन पाना चिन्ताजनक एवं सोचनीय स्थिति है कि किस विषय पर कब और कैसे चर्चा हो? लोकमान्य तिलक का मंतव्य था कि मतभेद भुलाकर किसी विशिष्ट कार्य के लिये सारे पक्षों का एक हो जाना जिन्दा राष्ट्र का लक्षण है। संसद का मानसून सत्र भारी हंगामे की भेंट चढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है, कोई ठोस कामकाज अथवा राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सार्थक चर्चा न होना विपक्ष की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिन्ह है।

यह भारतीय लोकतंत्र की बड़ी कमजोरी बनती जा रही है कि सरकार को जरूरी एवं राष्ट्रीय मुद्दों पर घेरने की बजाय उसको नीचा दिखाने, कमजोर करने एवं उसके कामकाज को धुंधलाने की कुचेष्टा के लिये हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। आजकल यह रिवाज हो गया है कि संसद सदस्य हर उस मसले को हल्ला-गुल्ला करके ही सरकार की नजर में ला सकते हैं, जिससे वे या उनका दल चिंतित हैं। अजीब बात है कि संसद में शोरगुल का रास्ता अपना कर संसद का मूल्यवान समय व्यर्थ कर रहे हैं जबकि उनके सामने बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं। संसदीय नियमावली में इतने सारे हथियार मौजूद हैं कि शोरशराबे की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए। फिर सदन की कार्यवाही में बाधा डालने का तरीका अपनाने का क्या औचित्य है?

विपक्षी नेताओं ने कहा कि कानून तो कानून होता है और उस पर अमल बिना किसी पक्षपात या भय के होना चाहिए। लेकिन इसका दुरुपयोग उस तरह नहीं किया जा सकता, जिस तरह से अभी किया जा रहा है। लेकिन विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं को यह भी सोचना होगा कि भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार ही है। इस तरह भ्रष्टाचार को होते हुए देखना तो सरकार की नाकामी ही मानी जायेगी। निलंबन की कार्यवाही सही कदम है। पर अभी जैसे बीज बोये जा रहे हैं उससे अच्छी खेती यानी लोकतांत्रिक मूल्यों की जीवंतता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इसलिए सत्ता और विपक्ष के सभी सदस्यों को चाहिए कि जनता के खून-पसीने की गाढ़ी से कमाई को इस तरह निरर्थक न किया जाए बल्कि वे देशहित को सर्वोपरि रखते हुए आमजन की समस्याओं के समाधान खोजने की पहल होनी चाहिए।

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