आरक्षण नहीं रोजगार ही समस्या का हल

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Supreme Court
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सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्टÑ में मराठों के लिए जाति आधारित आरक्षण को रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा है कि मराठे आर्थिक तौर पर पिछड़ी श्रेणी में नहीं आते बल्कि व समर्थ हैं। इस निर्णय से जाति आधारित आरक्षण का मामला फिर से चर्चा में आ गया है। आरक्षण की मांग के बढ़ते चलन को देखते हुए पिछली व्यवस्था को समझने व सुधारने की जरूरत है, जो इस मांग की मुख्य वजह हैं। आधुनिक युग में बदल रहे आर्थिक सामाजिक मूल्यों ने प्राचीन व मध्यकालीन जात-पात की कुप्रथा को कमजोर किया है। लोकतांत्रिक राजव्यवस्था व मानववादी चिंतन ने समानता व भाईचारे की सद्भावना को आगे बढ़ाया है। इसके बावजूद समाज में जाति आधारित संगठनों की सक्रियता बढ़ रही है जो जाति की सामाजिक संस्कृति की पहचान को बरकरार रखने के लिए अपनी-अपनी बिरादरी को संगठित कर रहे हैं।

जातिगत चेतना इस स्तर तक पहुंच गई है कि उच्च जाति के लोगों के लिए आरक्षण से रोजगार की मांग उठ रही है। इन संगठनों के इस तर्क में पूरा दम है कि बढ़ रही बेरोजगारी व महंगाई के कारण इन वर्गों की आबादी का बड़ा हिस्सा आर्थिक तौर पर कमजोर हो गया है। इन कमजोर लोगों के लिए शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं हासिल करने की भी क्षमता नहीं रही है और भुखमरी के चलते आत्महत्याओं का दौर जारी है। नि:संदेह आर्थिक तौर पर उच्च जाति के लिए आरक्षण आवश्यक होगा, लेकिन पूरी की पूरी जाति के लिए आरक्षण किसी भी तरह से उचित नहीं। यहां यदि सरकारें रोजगार के सही अवसर पैदा करें तब आरक्षण की जाति आधारित मांग भी कमजोर पड़ सकती है। दरअसल में जाति संगठनों की यह धारणा बन चुकी है कि जिस तरह वह अपनी एकता दिखाकर राजनीतिक पार्टियों पर प्रभाव जमा लेते हैं।

उसी तरह वह आरक्षण की मांग भी मनवा लेंगे। राजनेता भी वोटों के लिए जाति संगठनों को खुले दिल से वायदा करते हैं। इसका परिणाम यह है कि अब देश में जाति आरक्षण आंदोलन भी कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करने लगे हैं। हरियाणा में जाट आंदोलन और राजस्थान का गुर्जर आंदोलन इसका उदाहरण हैं। आंध्र प्रदेश का कापू समाज सक्षम माना जाता है, वह भी आरक्षण की मांग कर चुका है। पटेल समाज की भी ऐसी ही मिसाल है। राजनीतिक दलों ने आरक्षण के थोक वायदे करते हुए सुप्रीम कोर्ट की आरक्षण की 50 फीसदी व्यवस्था का भी ध्यान नहीं रखा, जिस कारण महाराष्टÑ, राजस्थान सहित कई राज्य सरकारों के निर्णय बीच में ही लटककर रह गए।

मामला एकतरफा कार्रवाई से हल होने वाला नहीं। इसके सभी पहलुओं पर समान ध्यान देने की आवश्यकता है। जहां केन्द्र व राज्य सरकारों को मिलकर रोजगार में बढ़ोतरी के लिए काम करना चाहिए, वहीं जाति संगठनों को आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति को बनाने पर ध्यान देना चाहिए। यह भी जरूरी है कि जाति भावना मजबूत करने की बजाय संयुक्तवार्त्ता, समानता व मानववादी विचारधारा को मजबूत किया जाए। पहले ही देश ने हजारों वर्ष जाति-पाति के दर्द को झेला है, जाति रहित होने से ही मानवीय गरिमा बढ़ेगी।

 

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