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    ब्रह्मचर्य से बढ़ाई जा सकती है माइंड और बॉडी पॉवर: पूज्य गुरु जी

    Saint Dr. MSG Insan
    18th Letter of Saint Dr. MSG: नये साल का पूज्य गुरु जी ने सभी साध-संगत को दिया ये बड़ा तोहफा, जल्दी देखें

    गुरूकुल में गुरू को ही बाप और गुरु माँ को माँ मानकर बच्चे पढ़ा करते थे: पूज्य गुरु जी

    • -हमारे पवित्र वेदों में भी की जाती थी इन्सान की नींव मजबूत 

    बरनावा (सच कहूँ न्यूज)। पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (Saint Dr. MSG Insan) ने साध-संगत को आन लाइन गुरुकुल के माध्यम से फरमाते हुए कहा कि अगर आज का इन्सान शुरूआत में पॉजिटिव वेव लेकर चलेगा यानी बच्चा पॉजिटिव वेव लेकर चलेगा तो सारा दिन उसके अंदर पॉजिटिविटी रहेगी। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि पहले छोटी सी उम्र यानी 5 से 7 साल की उम्र के बीच बच्चे को गुरूकुल में छोड़ दिया जाता था। फिर गुरू और गुरु माँ उस बच्चे के माँ-बाप होते थे। तभी कहा जाता है कि जो गुरू होता है वो मां-बाप के तरह होता है।

    क्योंकि यह हमारे ही एक पवित्र धर्म है जिसमें यह रीत चली थी। गुरू मां-बाप का रूप होता था। आज लोग पिता जी कहते हैं। पूज्य गुरू जी ने कहा कि कुछ लोग प्रश्न उठाते हैं कि जिन्होंने जन्म दिया उनको बाप नहीं कहता और अपने गुरू को बाप कहता है। हम बता दें कि ये तो आदिकाल से 12 हजार साल पुराने धर्र्मों में लिखा हुआ है। क्योंकि गुरूकुल में गुरू को ही बाप और गुरु माँ को माँ मानकर बच्चे पढ़ा करते थे। लड़कियों को गुरू माँ और लड़कों को गरू पढ़ाता था।

    ब्रह्मचर्य में होती है एक अलौकिक शक्ति | Saint Dr. MSG Insan

    पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि ब्रह्मचर्य में एक अलौकिक शक्ति होती है, अलौकिक तेज होता है। पूज्य गुरू जी ने कहा कि वो 25 साल की उम्र, जो कहते है कि नींव होती है। अगर किसी मकान की नींव मजबूत होती है तो वो मकान हमेशा खड़ा रहेगा, कभी डगमगाता नहीं। हमारे पवित्र वेदों में भी इन्सान की नींव मजबूत की जाती थी। उसे दुनियावी ज्ञान, शारीरिक ज्ञान से परिपूर्ण किया जाता था। दुनियावीं वो ज्ञान जिसमें उसने विचरणा है, सिवाए गृहस्थ जिंदगी के।

    गृहस्थ जिंदगी का ए, बी, सी, डी भी नहीं सिखाया जाता था 25 साल तक। बच्चों को इसके बारे में पता भी नहीं होता था और ना ही कभी बच्चों को गुरूकुल में उत्तेजित करने वाला भोजन दिया जाता था। उन्हें सिर्फ सात्विक भोजन ही दिया जाता था। जिससे शरीर में पावर (शक्ति)आए, मसल बने, मजबूत हो। तभी गुरूकुल में पढ़ने वाले पुराने लोगों के शरीर मजबूत होते थे।

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    गुरुकुल में दी जाती है ऐसी शिक्षा, जो इंसान को सिखाती थी जीना

    पूज्य गुरु जी ने उदारण के तौैर पर महाराणा प्रताप की बात करते हुए फरमाया कि आप मानोगे नहीं कि वो 200 किलो लोहे का साजो सामान उठाकर युद्ध करने जाते थे। यह सब ब्रह्मचर्य का कमाल है। ब्रह्मचर्य में कैसी भी स्थिति आ जाती थी, उनमें से बच्चों को गुजारा जाता था। जंगलात में अकेला छोड़ देना कि कैसे वह इसमें से निकल के आएगा और इससे घबराए भी नहीं, ऐसी शिक्षा गुरूकुल में दी जाती थी।

    इसके अलावा पानी में तैरना सिखाया जाता था। बहुत से ऐसे गेम खिलाए जाते थे ताकि आने वाली उनकी जिंदगी में उन्हें सघर्ष ना करना पड़ें। अंधरे में रखा जाता था, लाइट में रखा जाता था, भूखा रखा जाता था, ज्यादा खिलाया जाता था, फिर कैसे हजम करना है सब सिखाया जाता था। सारी चीजें बताई जाती थी। ताकि लाइफ में अगर कभी ज्यादा खा ले तो उसे कैसे हजम करना है, अगर ना मिले तो कैसे जीना है यानी जीने के तरीके बताए जाते थे।

    गुरुकुल में बढ़ाई जाती थी माइंड पॉवर के साथ बॉडी पॉवर

    पूज्य गुरु जी ने कहा कि धर्म महाविज्ञान है। ब्रह्मचर्य का जब हम पालन करते हैं तो अंदर एक ढ़ाल बनती है, जिससे शक्ति आती है। जो ब्रहमचर्य का पालन करते हैं उसको शिकन तक उसमें नहीं आती। बल्कि वो और उभर कर आता है और शक्ति लेकर आता है। क्योंकि ब्रह्मचर्य चीज ही ऐसी है। सो जो ब्रहमचर्य की क्लास थी, वो अपने आप में एक ऐसी नींव थी हमारी इन्सान की जो गुरु और गुरु मां बनाता था।

    गुरु और गुरु मां का जो गृहस्थ एरिया होता था, वहां किसी बच्चे को जाने की आज्ञा नहीं होती थी। कोई मतलब नहीं होता था कि कोई वहां चला भी जाए। ये भी एक सख्त नियम था और ऐसा होना भी चाहिए। क्योंकि वो दोनों गृहस्थी होते थे। गुरुकुल में माइंड की भी शिक्षा दी जाती थी। बहुत से पजल को हल कराया जाता था। आज जो विज्ञान कहती है कि पहेलियां या लिखा हुआ हल करते हैं तो माइंड पॉवर बढ़ती है। गुरुकुल में ऐसी शिक्षा दी जाती थी। जिसमें माइंड पॉवर बढ़ाने के साथ-साथ बॉडी पॉवर बढ़ाई जाती थी। दोनों में परफेक्ट बनाया जाता था।

    बच्चों को ज्ञान योगी के साथ बनाया जाता कर्म योगी

    पूज्य गुरू जी ने कहा कि गुरुकुल में घुड़सवारी कराई जाती थी, जिसे हम आज के समय में ड्राइवरी मान सकते हैं। परफेक्ट घुड़सवार सभी होते थे। गुरुकुल में सभी को एक साल एक साथ रखा जाता था। फिर देखते थे कि ये तो शूरवीर बनने के लायक है, ये एक सैनिक बनने के लायक है, ये महान योद्धा बनेगा, उनकी फिर उसी मुताबिक शिक्षा होती थी। गुरुकुल में बच्चों को ज्ञान के साथ-साथ कर्मयोगी भी बनाया जाता था। दोनों साथ-साथ चलते थे कि ये किस कर्म में सफल होगा यानी कौन सा बच्चा किस काम में निपुण है,

    उसे उसी प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। इसके अलावा बेसिक शिक्षा सभी को दी जाती थी। गुरुकुल में छोटी-मोटी बीमारियों को कैसे कंट्रोल करना है वो भी सिखाया जाता था। गुरुकुल में ब्रह्मचर्य के दौरान बच्चों को अभ्यास कराया जाता था जीवन में आने वाली परेशानियों से लड़ने का, उन्हें अभ्यास कराया जाता था जीवन में आने वाले गम, दुख, दर्द, परेशानियों, चिंता को दूर करने का, उन्हें टैंशन देकर टैंशन से लड़ना कैसे है, सिखाया जाता था। वहीं गुरुकुल में भेदभाव न करने और सभी से बेगर्ज प्यार करने की शिक्षा दी जाती थी।

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