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    अलगाववादियों की सुरक्षा वापिस

    Security of separatists back

    केन्द्र सरकार ने पुलवामा हमले के बाद कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापिस लेने का अहम निर्णय लिया है। यह तर्क भी सही नहीं कि जो लोग देश के खिलाफ साजिशें रच रहे हों, उनके लिए विशेष सुरक्षा के प्रबंध किए जाएं। इनकी सुरक्षा पर 100 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक खर्च हो रहा था। यूं भी सुरक्षा वापिस लेने के बाद अलगाववादियों ने जो प्रतिक्रिया दी है उससे यह बात सामने आती है कि जिन्होंने सुरक्षा कभी मांगी ही नहीं उन्हें सुरक्षा क्यों दी जाए। आम तौर पर नियम यही है कि जिसकी जान को खतरा हो वही सरकार को सुरक्षा देने की अपील करता है और सरकार ऐसे लोगों को सुरक्षा मुहैया भी करवाती है। इस हालात में अलगाववादियों को सुरक्षा देने का कोई तुक ही नहीं बनता, मीरवाईज ने स्पष्ट कहा है कि उन्होंने कभी सुरक्षा मांगी ही नहीं। आम नागरिकों की तरह अलगाववादी नेता भी नागरिक हैं और उनके पास विशेष सुरक्षा का कोई अधिकार भी नहीं है।

    कई बार यही लोग कानून व व्यवस्था के लिए चुनौती बनते हैं। अनगिनत बार इन नेताओं को नजरबंद करना पड़ा है। इन नेताओं पर पाकिस्तान से सीधी बात करने का भी आरोप है। भारत लोकतंत्र में विश्वास रखता है, लेकिन लोकतंत्र के नाम पर देश के खिलाफ हो रही साजिशों को बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए। यह तथ्य है कि अलगाववादी कश्मीरी युवाओं की भीड़ को सुरक्षा बलों के खिलाफ भड़काते आ रहे हैं। केंद्र के बातचीत के न्यौते को भी अलगाववादियों ने कभी स्वीकार नहीं किया। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यदि लोकतंत्र के नाम अलगाववादियों को देश विरोधी कार्रवाईयों से समय रहते रोका जाता तब बड़ी संख्या में कश्मीरी युवा भटकने से बच सकते थे। कई नेताओं को आतंकवादी संगठनों द्वारा फंडिंग देने के मामले भी चर्चा में रह चुके हैं।

    राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस मामले में गिरफ्तारियां भी कर चुकी है। दरअसल जनता के विरोध के डर के कारण सरकार इन नेताओं पर हाथ डालने से झिझकती रही है जिस कारण अलगाववादियों के पाक में बैठे लोगों से संबंध मजबूत होते गए। केंद्र सरकार को इस बात पर जोर देने की आवश्यकता है कि अलगाववादियों के लोगों में बने आधार को खत्म किया जाए। अलगाववादियों की सच्चाई सबके सामने लाई जाए। आतंकवाद के साथ केवल ताकत से नहीं लड़ा जा सकता बल्कि विचारधारा की लड़ाई भी लड़नी होगी। अलगाववादी नेता कश्मीरियों को गुमराह करने की कोशिश में लगे हुए हैं। कश्मीरियों को सच्चाई से अवगत करवाना सरकार का काम है। विधान सभा व लोक सभा चुनाव में कश्मीरी वोटरों ने वोट के अधिकार का प्रयोग कर अलगाववादियों को हाशिये पर कर दिया है। इन हालातों में सरकार को ठोस रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।

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