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    रक्षा मोर्चे पर आत्मनिर्भरता की पहल

    Defense Front

    आत्मनिर्भर भारत के तहत सरकार ने 101 आइटमों की एक लिस्ट तैयार की है, जिनके आयात पर प्रतिबंध (एम्बार्गो) होगा। यह रक्षा के मोर्चे पर आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा व ऐतिहासिक कदम है। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 78वीं सालगिरह के मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वदेशी हथियार और रक्षा उपकरण खुद ही बनाने की घोषणा की है। इसकी शुरूआत दिसंबर, 2020 से शुरू होकर दिसंबर, 2025 में समाप्त होगी। यानी रक्षामंत्री चाहते हैं कि इन पांच सालों में रक्षा उद्योग की भारतीय कंपनियां पूरी तरह सक्षम हो जाएं, ताकि आयात पर पूरी तरह रोक लगायी जा सके। इस कदम का मूल उद्देश्य रक्षा क्षेत्र को ज्यादा से ज्यादा स्वदेशी बनाना है। देश में रक्षा उपकरणों के निर्माण नहीं कर पाने के कारण भारतीय सेना को सैन्य उपकरणों और हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ा है।

    वास्तव में कई-कई मामलों में विकास और आत्मनिर्भरता का दावा ठोंकते रहने के बावजूद अपनी रक्षा जरूरतों की आपूर्ति में दूसरों पर आश्रित रहना क्या हमारी अब तक की संपूर्ण विकास यात्रा पर कुछ अधिक अनिवार्य और एक भारी-भरकम प्रश्नचिन्ह नहीं है? सुरक्षा जरूरतों की आपूर्ति में आत्मनिर्भरता की बजाए दूसरे देशों पर निर्भर हो जाने से क्या हमें कुछ भी नुकसान नहीं उठाना पड़ता है? आखिर यह कैसे संभव किया जा सकता है, कि हथियार निर्माता देश हमें पुरानी रक्षा प्रौद्योगिकी का निर्यात नहीं करें? हथियार सौदों में शर्तों का एकतरफा निर्धारण कैसे उचित ठहराया जा सकता है?

    अभी भी अधिकतर रक्षा सौदों के मामलों में यही होता आया है, कि हथियार निर्माता देश हमें अपनी मनमानी शर्तों पर पुरानी रक्षा प्रौद्योगिकी पकड़ा देते हैं, जिसका कि हमें बाद में भारी खामियाजा भुगतना पड़ता अब भारत सरकार चाहती है कि डीआरडीओ सरीखे रक्षा संस्थानों ने जो तकनीक और क्षमताएं हासिल की हैं, उनके आधार पर ही ‘स्वदेशी अस्त्र’ बनाने की शुरूआत की जाए। धीरे-धीरे उत्पादन स्वदेशी होगा, तो प्रौद्योगिकी भी विकसित होती रहेगी। कमोबेश रक्षा उपकरणों के स्वदेशीकरण से हमारे अरबों रुपए बचेंगे, क्योंकि भारत हथियारों के बाजार में दुनिया के पहले तीन बड़े आयातक देशों में शामिल रहा है। बीते पांच सालों में ही 16 अरब डॉलर से अधिक का आयात किया जा चुका है।

    जमीनी हकीकत यह है कि अपनी रक्षा जरूरतों के लिए भारत दुनिया के दूसरे देशों पर निर्भर है। कभी रूस से हथियार खरीदने वाला भारत अब दुनिया के दूसरे मुल्कों से भी हथियार खरीदने में पीछे नहीं है। फिर वह इजरायल हो या फिर अमेरिका। मेक इन इंडिया के नारे के बावजूद अब भी बड़ी रक्षा जरूरतें आयात पर निर्भर है और यही भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा हथियार आयातक देश बनाता है। 2014 से 2018 के मध्य भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था। इस अवधि के दौरान सऊदी अरब दुनिया का सबसे ज्यादा हथियार आयात करने वाला देश था। हथियारों के आयात में उसकी वैश्विक स्तर पर हिस्सेदारी 12 फीसद है।

    स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2014 से 2018 के मध्य प्रमुख हथियारों का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक था और वैश्विक स्तर पर उसकी हिस्सेदारी 9.5 फीसद थी। हालांकि, 2009 से 2013 और 2014 से 2018 के बीच भारतीय आयात में 24 फीसद की कमी आई है। रिपोर्ट के अनुसार, आंशिक रूप से ऐसा विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से लाइसेंस के तहत उत्पादित हथियारों की डिलीवरी में देरी के कारण हुआ है। जैसे 2001 में रूस को लड़ाकू विमान का और 2008 में फ्रांस से पनडुब्बियों का आदेश दिया गया था।

    मोदी सरकार की इस घोषणा से देश को अर्थव्यवस्था के स्तर पर बड़ा मुनाफा होगा। वहीं नए निर्माण, उत्पादन शुरू होंगे, तो रोजगार के नये क्षेत्र भी खुलेंगे। अर्थात अर्थव्यवस्था व रोजगार के दो मोर्चों पर एक साथ लाभ मिलेगा। केंद्र सरकार ने इसके लिए 52,000 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया है। रक्षा मंत्री ने आश्वस्त किया है कि आने वाले 5-7 सालों में चार लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के आॅर्डर भारतीय कंपनियों को दिए जाएंगे।

    यह भी स्पष्ट किया गया है कि अब हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर, मालवाहक विमान, पारंपरिक पनडुब्बी, क्रूज मिसाइल के साथ-साथ रडार, आॅर्टिलरी गन, अपतटीय गश्ती जहाज, इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली, अगली पीढ़ी के मिसाइल पोत, फ्लोटिंग डॉक, कम दूरी के समुद्री टोही विमान, असॉल्ट राइफल आदि अस्त्र और युद्धक उपकरण देश में ही बनाए जाएंगे। अत्याधुनिक हथियारों, विमानों और युद्धक प्रणाली आदि के लिए हम रूस, अमरीका, फ्रांस और इजरायल आदि देशों के भरोसे रहे हैं।

    दुनिया के कुल 58 देश ऐसे हैं, जो अपने हथियार दुनियाभर में निर्यात करते हैं, लेकिन थोड़ी पड़ताल करने पर पता चलता है कि इनमें से 74 फीसदी हथियार अकेले पांच देश (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और जर्मनी) मिलकर करते हैं। इन पांचों हथियार निर्माता-निर्यातक देशों का यह हथियार कारोबार लगातार दिन-दोगुना, रात-चैगुना की रफ्तार से फल-फूल रहा है। भारत हथियारों, अत्याधुनिक विमानों और उनके छोटे-छोटे उपकरणों तथा तकनीकों के लिए विदेशों का मोहताज रहा है। भारत रक्षा सामानों का आयातक ही नहीं, महत्त्वपूर्ण निर्यातक भी है। हम अमरीका, फ्रांस, जर्मनी और फिनलैंड, आॅस्टेÑलिया, इजरायल और साउथ अफ्रीका समेत कुल 42 देशों को रक्षा उपकरण निर्यात भी करते हैं। बेशक ये उपकरण और मिसाइलें आदि अपेक्षाकृत छोटे होते हैं, लेकिन सेनाओं के लिए एक छोटा-सा हेलमेट भी ‘कवच’ के समान है। अब इस निर्यात को पांच अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है।

    रक्षा सेक्टर में विनिर्माण मामले में पीएम मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘मेक इन इंडिया’ परवान चढ़ रहा है। इसी योजना के तहत भारत में अपाचे जैसा हेलिकॉप्टर के विनिर्माण का रास्ता खुला है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने भारतीय सेना के लिए युद्धक हेलिकॉप्टर बनाने के मेगा प्रॉजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। एचएएल के मुताबिक 10 से 12 टन के ये हेलिकॉप्टर दुनिया के कुछ बेहतरीन हेलिकॉप्टर्स जैसे बोइंग के अपाचे की तरह आधुनिक और शक्तिशाली होंगे। एचएएल के प्रमुख आर माधवन ने कहा है कि जमीनी स्तर पर काम शुरू किया जा चुका है और 2027 तक इन्हें तैयार किया जाएगा।

    मेक इन इंडिया के तहत नौसेना के लिए भारत में ही करीब 45 हजार करोड़ रुपये की लागत से छह पी-75 (आई) पनडुब्बियां बनाई जाएंगी। पनडुब्बियों के निर्माण की दिशा में स्वदेशी डिजाइन और निर्माण की क्षमता विकसित करने के लिए नौसेना ने संभावित रणनीतिक भागीदारों को छांटने के लिए कॉन्ट्रैक्ट जारी कर दिया है। मेक इन इंडिया के तहत अब दुनिया के सबसे घातक हथियारों में से एक क्लाश्निकोव राइफल एके 103 भारत में बनाए जाएंगे। सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसे भारत में बनाया जाएगा। इसे भारत से निर्यात भी किया जा सकता है।

    अगर डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेन्ट आॅगेर्नाइजेशन (डी.आर.डी.ओ.) के वैज्ञानिक ठान लें, तो बहुत कुछ संभव करते हुए सैन्य उपकरणों की आत्मनिर्भरता का सपना साकार किया जा सकता है। अगर इसरो के वैज्ञानिक, अंतरिक्ष-तकनीक में भारत को किसी एक हद तक आत्मनिर्भर बना सकते हैं, तो डीआरडीओ के वैज्ञानिक रक्षा क्षेत्र में काम आने वाले सैन्य-उपकरण बनाने वाली तकनीक में भारत को क्यों नहीं स्वावलंबी बना सकते हैं? वैसे देखा जाए तो सैन्य-उपकरणों की निर्भरता से अधिक कारगर उपकरण कुशल सुरक्षा-कूटनीति का होता है। बेहतर है कि युद्ध, अशांति और तनाव की स्थितियां ही पैदा न हो, ये कैसे संभव हो? फिलवक्त हम 70 फीसदी से अधिक हाईटेक रक्षा हार्डवेयर-विमान, समुद्री जहाज, पनडुब्बी और मिसाइल आदि-तो रूस, जापान, अमरीका और इजरायल आदि देशों से आयात करते हैं। कमोबेश आत्मनिर्भरता की कोई ठोस शुरूआत तो की जाए। रक्षा मंत्रालय का यह फैसला बेहद खास और दिशा बदलने वाला हो सकता है।

                                                                                                                   -राजेश माहेश्वरी

     

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