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    नई खेती, नई नीतियों की हो बात

    New Farming

    इसी साल 22 जनवरी को सरकार व किसानों के बीच 11वें दौर की बातचीत के बाद संवाद ऐसा टूटा कि आज एक महीना तीन दिन गुजर जाने के बाद भी सरकार एवं किसानों में ठहराव बरकरार है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 30 जनवरी को सर्वदलीय बैठक में किसान मुद्दों पर कह चुके हैं कि सरकार महज एक फोन कॉल ही दूर है। प्रधानमंत्री व किसानों के बीच अभी तक भी वह कॉल नहीं जुड़ सकी। इस दौरान सरकार 26 जनवरी को लाल किले पर फहराये गए धार्मिक झंडे, ग्रेटा थनबर्ग द्वारा किसान हित में किए गए ट्वीट व उस ट्वीट से पहले बनी किसान आंदोलन की टूलकिट के मामले में दिशा रवि पर्यावरण कार्यकर्ता, निकिता जैकब एडवोकेट, शांतनु, एस धालीवाल आदि लोगों को आपराधिक धाराओं में आरोपी बना चुकी है। अंतराष्टÑीय स्तर पर इस आंदोलन को किसान की आवाज दबाने के तौर पर देखा जा रहा है।

    भारत सरकार अब भी इस प्रयास में है कि किसान, सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि बिलों से सहमत हो जाएं एवं उन लोगों को दंडित किया जाए जो इस किसान आंदोलन की आड़ में हिंसा, अलगाववाद या देश को बदनाम करने में लगे हुए हैं। इधर किसान नेता दिल्ली बॉर्डर से दूर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्टÑ में किसान महापंचायत कर रहे हैं ताकि किसान आंदोलन की गतिविधियां मंद न पड़ें। किसान नेता राकेश टिकैत के सुर अब तल्ख हो चले हैं, वह किसानों को कह चुके हैं कि भले ही उन्हें अपनी फसलें नष्ट करनी पड़ें लेकिन वह अपनी फसलें नए कानूनों के अंतर्गत पंूजीपतियों को नहीं बेचेंगे। इतना ही नहीं टिकैत अब किसानों को ट्रैक्टर लेकर संसद पहुंचने व इंडिया गेट के पार्कों में खेती करने का आह्वान कर भारत की केंद्रीय सत्ता को हलकान करने की और कदम बढ़ा रहे हैं।

    किसान पहले दिन से ही कह रहे हैं कि कितना भी वक्त लगे वह पीछे हटने वाले नहीं हैं जब तक कि सरकार कानूनों को वापिस नहीं ले लेती, उधर सरकार अभी भी किसानों की मांग का दम टूटने के इंतजार में है। यहां किसानों की जिद्द एवं उनकी शंकाए भले ही जायज हों परन्तु किसानों की मांग वर्तमान समय में पिछड़ गए दौर की हो गई है। सरकार अगर किसानों की मांग मान भी लेती है तब भी किसानों को उसका कोई लाभ नहीं होने वाला। चूंकि खेत छोटे हो रहे हैं, किसान पुत्र खुद खेती छोड़ शहरों एवं विदेशों की राह पकड़ रहे हैं। जिन्हें कृषि का जुनून है वह बिना किसी कानून के इंतजार के नए तरीके से, नई फसलों की खेती शुरू कर चुके हैं। कृषि नवाचारों से आज बहुत से किसान मालामाल हो रहे हैं और वह इन धरना-प्रदर्शनों से दूर भी हैं।

    नई कृषि में फल-सब्जी, आर्गेनिक फसलें, फसलों के प्रसंस्करण उत्पाद बनाने के व्यवसायों को नए किसान वाणिज्यिक तौर पर अपना रहे हैं, बाजार भी ऐसे किसानों को उनकी उपज का मुंह मांगा दाम दे रहा है। नए किसानों को समर्थन मूल्य की इच्छा ही नहीं है, कृषि उपज मंडी में ये किसान नहीं जा रहा, नया किसान यह भी चाहता है कि कांट्रेक्ट फार्मिंग से ही मिले पर उसे बड़ा खेत मिले ताकि वह और ज्यादा मुनाफा कमा सके। परम्परागत कृषि करने वालों को चाहिए कि वह कृषि नवाचारों को अपनाएं, धरना-प्रदर्शन से अब कृषि का भला नहीं हो सकेगा। सरकार को चाहिए कि वह किसानों को नई कृषि के लिए और ज्यादा प्रशिक्षण, बीज, औजार, ऋण, उपलब्ध करवाए ताकि देश के कृषि क्षेत्र में राजनीतिक तनाव की जगह उत्पादन की बात हो।

     

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