Maha Paropkar Diwas: ‘ताया ने पा-पा कर बोलियां, कर दित्ता कमाल’

Maha Paropkar Diwas
Maha Paropkar Diwas: ‘ताया ने पा-पा कर बोलियां, कर दित्ता कमाल’ छाया: जसबीर सिंह

Maha Paropkar Diwas: पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां का 33वां पावन गुरुगद्दीनशीनी दिवस (महापरोपकार दिवस) आज एमएसजी डेरा सच्चा सौदा व मानवता भलाई केन्द्र शाह सतनाम जी धाम, सरसा में भण्डारे के रूप में मनाया जा रहा है। इस अवसर पर पावन भंडारे की नामचर्चा सत्संग का शुभारंभ ठीक 11 बजे हो जाएगा, जिसको लेकर भारी तादाद में साध-संगत का आना जारी है। इस पावन भंडारे को लेकर साध-संगत में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है।

सभी समितियों के सेवादार पावन भंडारे को लेकर अपनी-अपनी ड्यूटियों पर मुस्तैद हैं। पिछले दो दिनों सेवादार पावन भंडारे की तैयारियों में पूरी शिद्दत से जुटे हुए थे। इन तैयारियों के तहत साध-संगत की सुविधा के मद्देनजर सारी व्यवस्थाएं बनाई गई है। इस पावन अवसर पर डेरा अनुयायी नाच-गाकर व भंगड़े पाकर अपनी खुशी का इजहार करते नजर आए। पंजाब के नौजवान-बुजुर्ग बोलियां पा-पाकर, उछल-कूद करते हुए भंडारा स्थल पर पहुंच रहे हैं। पूरे जिला सिरसा में खुशी का आलम है। चहुं ओर का नजारा दर्शनीय है।

गौरतलब है कि 23 सितंबर 1990 को पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को पावन गुरुगद्दी की बख्शिश करके अपना रूप बनाया था। इस पूरे महीने को डेरा सच्चा सौदा की साध-संगत पर्व की भांति हर्षोल्लास से मानवता भलाई के 159 कार्य करके मनाती है।

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Maha Paropkar Diwas: ‘ताया ने पा-पा कर बोलियां, कर दित्ता कमाल’
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‘युगपुरुष’

समाज में अच्छे बदलाव तब आते हैं जब सोच बदलती है। सोचने का ढंग बदल देना ही सबसे बड़ी चुनौती होती है। सोचने का ढंग बदल देने वाले ही युग पुरूष कहलाते हैं और फिर शुरु होता है समाज में बदलाव का दौर। नई सोच रखने वाले लोग खोखले रस्म-रिवाजों की गिरफ्त से बाहर आकर समाज को ताजा और नई चेतना से भरपूर करते हैं। आम व्यक्ति किसी एक इन्सान की सोच को नहीं बदल सकता लेकिन युग पुुरूष करोड़ों लोगों की सोच को बदल देते हैं। समाज को इसी नवीनता और इन्सानियत की सोच से जोड़ने वाले युगपुरूष हैं सच्चे रूहानी रहबर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां।

23 सितंबर 1990 का दिन भारत सहित पूरी दुनिया के लिए एक नया संदेश लेकर आया कि इन्सानियत एक है और इन्सानियत की सेवा ही सच्चा धर्म है। इस पवित्र दिवस पर डेरा सच्चा सौदा के सच्चे दाता रहबर पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने पूज्य गुुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को पवित्र गुुरुगद्दी की बख्शिश की। पूज्य गुरु जी ने जब पवित्र गुरुगद्दी की जिम्मेवारी संभाली तो समाज स्वार्थ की गहरी खाई में डूबा हुआ था। आप जी ने इन्सानियत की ऐसी मुहिम चलाई कि जो लोग अपने सगे भाई-बहन को खून देने से झिझकते थे, वह अनजान लोगों की जिंदगी बचाने के लिए भाग-भागकर रक्तदान करने लगे।

रक्तदान की ऐसी लहर चली कि डेरा सच्चा सौदा के नाम विश्व रिकॉर्ड बनने लगे। ब्लड बैकों के लक्ष्य पूरे होते चले गए लेकिन रक्तदानियों की लाईनें, भीड़ बढ़ती ही गई। विचारों का यह बदलाव इस कदर छा गया कि लोग अपनी हर खुशी-गम जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ, मकान का मुहूर्त, बुजुर्गों की बरसी के मौके पर रक्तदान करने लगे। पूज्य गुरु जी ने मेडिकल विज्ञान की महत्ता पर जोर देते आदि-युगादि से चल रही मौत को लेकर मृतक देह का अंतिम संस्कार करने या दफनाने की रीत को बदला। मरणोपरांत शरीरदान की मुहिम चलाई और गांव-गांव, शहर-शहर नारे गूंजते सुनाई देते हैं, शरीरदानी अमर रहे। यह बदलाव समाज की पुरातन सोच का किला ढ़हा कर नये समाज का सृजन कर रहा है।

बेटी कभी भी अपने माता-पिता की अर्थी को कंधा नहीं दे सकती, इस परपंरा को बदलते हुए पूज्य गुरु जी ने बेटी को बराबरी का हक दिलाया। बेटी के जन्म लेने पर परिवार में मातम पसर जाता था लेकिन आज पूज्य गुरु जी की पावन प्रेरणाओं से बेटी के जन्मदिन पर दरवाजे पर नीम बांधा जाता है, ढ़ोल बजते हैं, खुशी मनाई जाती है, मिठाई बांटी जाती है। वेश्याओं को देखना तक भी अच्छा नहीं माना जाता लेकिन वेश्यावृत्ति छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटी बेटी को अपना लेना बहुत बड़ी बहादुरी है, लेकिन बहादुरी का यह जज्बा लाखों लोगों में पैदा करने वाले युगपुरुष, सच्चा समाज सुधारक व इंकलाबी योद्धा होते हैं।

अपने घर को हर कोई चमकाता है और अपने घर का कूड़ा किसी दूसरे के घर के सामने या गली में बिखेर कर निश्चिंत हो जाता है। गली की सफाई, शहर की सफाई की चिंता किसी को नहीं होती, लेकिन हमने तो हर गांव, हर शहर, हर देश को साफ रखना है, यह कर्तव्य, भावना दिलों में पैदा की है तो पूज्य गुरु जी ने। आप जी की पावन प्रेरणाओं से एक शहर को साफ करने की मुहिम शुरू हुई। इसी मुहिम के तहत 33 शहर साफ किए गए और अब तक एक दिन में पूरे के पूरे राज्य (हरियाणा व राजस्थान) को चमका दिया गया। आज के व्यस्ततम समय में किसके पास इतना समय है कि वह अपने घर व गलियों में सफाई करने के बारे में सोचे, लेकिन अनजान शहर में जाकर उस शहर की साफ-सफाई करना किसी चमत्कार से कम नहीं।

यह चमत्कार कोई आम इन्सान तो कर नहीं सकता और कोई युगपुरुष या रूहानी रहबर जो पूरी खलकत को अपनी औलाद मानता है वही कर सकता है, इन्सान रौद्र रूप धारण कर चुकी नदियों के आगे क्या चीज है, लेकिन जज्बे के सामने रौद्र रूप धारण कर चुकी नदियां भी क्या चीज हैं, यह भी करिश्मा भी भौतिक आँखों के साथ ही देखा गया। पंजाब-हरियाणा में जब रौद्र रूप धारण कर चुकी घग्गर नदी का मुंह तक मोड़ दिया गया तो सरकारें भी देखती की देखती रह गर्इं कि डेरा सच्चा सौदा वाले ही इन बांधों को बांध सकते हैं, कोई और नहीं। सच्चे रूहानी रहबर ने पहले करोड़ों लोगों के दिलों में इन्सानियत का ऐसा बांध बांधा हुआ है कि उन्हें बड़ी नदी भी नाले की तरह लगती है। नदी व नाले का अंतर मिटा देने वाला इन्सानियत का समुद्र ही हो सकता है। संत कभी अपने परोपकारी स्वभाव से अलग नहीं हो सकते, परोपकार उनके खून में, उनके दिलों-दिमाग में समाया हुआ होता है। भले ही दुनिया के लोग उनके साथ कैसा भी व्यवहार करें, उनका हाथ हमेशा ही दुआओं व परोपकारों के लिए ही उठता है। संत कही भी रहें, वह परोपकार का पल्ला कभी भी नहीं छोड़ते,

यही अंतर है उनमें और आम इन्सान में। संतों का देशभक्ति का ज़ज्बा बेमिसाल होता है। उनको देश के भविष्य यानि युवा पीढ़ी की चिंता हमेशा रहती है। पिछले सालों में पंजाब सहित पूरे देश में नशों की ऐसी बाढ़ आई कि युवा चिट्टे की भेंट चढ़ने लगे। बुजुर्ग माता-पिता युवा औलाद को अपनी आंखों के सामने तड़पते मरते देखने लगे। इस दौर में पूज्य गुरु जी नशे की रोकथाम के लिए जमीनी स्तर पर मुहिम चलाई। लाखों लोगों का नशा छुड़वाया, उनके लिए पौष्टिक आहार का भी प्रबंध किया। ऐसे गाने भी तैयार किए जिसने युवाओं की सोच ही बदल दी।

नशों के दरिया का मुंह मोड़ने वाले युग पुरुष होते हैं। संत, समाज के लिए दिल से संदेश देते हैं, उनकी आवाज में समाज के लिए दर्द भरा होता है, जो हर किसी को झकझोरता है, बदलता है और जगाता है। आप जी ने ‘जागो दुनिया दे लोको’ द्वारा संदेश दिया, ठीकरी पहरे लगाने का संदेश दिया तो पंजाब जागा है, हरियाणा जागा है, ठीकरी पहरे लगने लगे हैं और नशा तस्कर भागने लगे हैं। पंचायतें नशों के खिलाफ प्रस्ताव डालने लगी है, इस सोच को बदलने का सामर्थ्य युगपुरुष में ही होता है।

पूज्य गुरु जी ने संस्कृति को बचाने के लिए अभियान चलाए हैं, जो बच्चों को नशों के प्रति, माता-पिता को बच्चों प्रति अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत करते हैं। हम सिर्फ हाड़-मांस के पुतले नहीं बल्कि भावनाओं, रिश्तों वाले प्राणी हैं, जिन्हें अपने परिवार के बारे में, पड़ोसियों के बारे में, समाज के बारे में, देश के बारे में व पूरी इन्सानियत के बारे में सोचना है। इस महान परोपकारी, ब्रह्मण्डी कार्य को हमारा लाख-लाख सजदा, पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को करोड़ों बार सजदा। आप जी इसी तरह सदा इन्सानियत का झंडा बुलंद किए, सदा सलामत स्वस्थ रहें। आप जी की दया-मेहर, रहमत, इन्सानियत पर इसी तरह सदा बनी रहे।