डॉ. प्रियंका सौरभ। कोटा में एक और छात्रा की आत्महत्या होना शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक सोच और उस तथाकथित ‘सफलता मॉडल’ पर गहरी चोट है, जिसे हमने वर्षों से बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लिया। आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति का सुसाइड नोट पूरे समाज के सामने एक आईना है। यह आईना माता-पिता, कोचिंग संस्थानों, स्कूलों और नीति-निर्माताओं तक को अपनी जिम्मेदारी देखने के लिए मजबूर करता है। कृति ने अपने सुसाइड नोट में सरकार से अपील की कि यदि वास्तव में बच्चों की जान बचानी है, तो कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण जरूरी है। उसका कहना था कि ऐसे संस्थान बच्चों को भीतर से तोड़ देते हैं। यह वाक्य किसी क्षणिक भावनात्मक आवेग का परिणाम नहीं था। यह उस मानसिक दबाव की आवाज थी, जिसे आज लाखों छात्र रोज महसूस करते हैं।
आज भारत में कोचिंग संस्थान शिक्षा के सहायक माध्यम नहीं रह गए हैं। वे एक बड़े व्यावसायिक उद्योग का रूप ले चुके हैं। कोटा, सीकर, हैदराबाद, दिल्ली और पटना जैसे शहर अब ‘एजुकेशन हब’ कहलाते हैं, जहां हर साल हजारों किशोर अपने माता-पिता की उम्मीदों का बोझ लेकर पहुंचते हैं। इन उम्मीदों का केंद्र कुछ सीमित शब्दों में सिमट गया है- आईआईटी, नीट, एम्स, रैंक और सेलेक्शन। इस व्यवस्था में छात्र को लगातार यह महसूस कराया जाता है कि चयन नहीं हुआ तो वह जीवन में असफल है। सफलता की यह परिभाषा इतनी संकीर्ण हो चुकी है कि औसत छात्र के लिए उसमें सम्मानजनक स्थान ही नहीं बचता।
कृति का यह कथन कि ‘90 से अधिक अंक लाने वाली लड़की भी आत्महत्या कर सकती है’ हमारे समाज की उस गलत धारणा को तोड़ता है, जिसमें हम मानते हैं कि मानसिक संकट केवल कमजोर छात्रों को होता है। आज दबाव केवल परीक्षा पास करने का नहीं, बल्कि हर समय श्रेष्ठ साबित होने का बन गया है। बच्चा अपने भीतर एक आदर्श छात्र की छवि ढोता रहता है, जिसमें वह रोज हारता है। अच्छे अंक भी अब मानसिक शांति नहीं दे पा रहे, क्योंकि समस्या पढ़ाई की नहीं, उस वातावरण की है जो पढ़ाई के नाम पर तैयार किया गया है। कृति द्वारा अपनी मां के लिए लिखी पंक्तियों में कहा कि उसे विज्ञान पढ़ने के लिए मजबूर किया गया, जबकि उसकी रुचि अंग्रेजी साहित्य और इतिहास में थी। माता-पिता कई बार यह भूल जाते हैं कि बच्चा उनकी अधूरी महत्वाकांक्षाओं का विस्तार नहीं, एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है।
आज स्कूल और कोचिंग संस्थान बच्चों को गणित के सूत्र और परीक्षा की रणनीतियां तो सिखा रहे हैं, पर जीवन जीने की समझ नहीं दे पा रहे। वे बच्चों को यह नहीं सिखा रहे कि असफलता से कैसे उबरें, तनाव को कैसे पहचानें और मदद मांगना कमजोरी नहीं है। रैंक लिस्ट, मॉक टेस्ट और लगातार तुलना बच्चों के मन में हीनभावना भर देती है। वे खुद को केवल अंकों और चयन के चश्मे से देखने लगते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि हम सफलता को किस रूप में परिभाषित करते हैं। क्या मानसिक रूप से स्वस्थ रहना, संतोष के साथ जीवन जीना और अच्छा इंसान बनना सफलता नहीं है? यदि हमने अब भी नहीं सोचा, तो हम ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो योग्य तो होगी, पर भीतर से टूटी हुई होगी। कृति का सुसाइड नोट एक सामाजिक चेतावनी है। अब भी नहीं बदले, तो सवाल यह नहीं रहेगा कि अगला बच्चा कौन होगा, सवाल यह होगा कि क्या हम किसी बच्चे को बचा भी पाएंगे।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)















