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    विदेशी एप्स पर प्रतिबंध देशहित में

    Ban on foreign apps is in national interest
    भारत सरकार ने चीनी एप टिकटॉक सहित 59 के करीब एप्स पर रोक लगा दी है। चीनी एप्स पर रोक से भारतीय वर्जनस ‘चिंगारी’ को लोग हाथोंहाथ ले रहे हैं। भारत के सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स पूरी दुनिया में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन भारत में हमारे विशेषज्ञ सुस्त चल रहे हैं, शायद भारतीय एप्स के इन्वेस्टमेंट नहीं मिलने की समस्या आती है, इसी समस्या के चलते चीनी व अन्य बाहरी एप्स हम सवा सौ करोड़ भारतीयों की मजबूरी बन जाते हैं।
    2019 के आँकड़ों के मुताबिक भारत में टिकटॉक (म्यूजिकली के साथ) के तकरीबन 30 करोड़, लाइकी के तकरीबन 18 करोड़, हेलो के 13 करोड़, शेयर-इट, यूसी ब्राउजर के 12 करोड़ के आसपास यूजर्स हैं, इसके अलावा व्हाट्सएप व फेसबुक मैसेंजर, ट्वीटर, इंस्टाग्राम, लिंकडिन जैसे सोशल एप्स हैं जो दुनिया के साथ-साथ भारत में भी प्रसिद्ध हैं, भारत ने टेलीग्राम नाम से देशी वर्जन बनाया है पर वह ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो रहा इसी तरह पेटीएम बैंक, गूगल-पे की ही तरह भारत के भीम एप, फोन-पे हैं। भारतीयों को ज्यादा से ज्यादा अपने देशी वर्जन ही उपयोग में लाने चाहिए जिससे कि देश का पैसा देश में ही रहे। देशी एप्स की सेवाएं भी तभी बेहतरीन होंगी अगर ज्यादा ग्राहक आएंगे व ज्यादा निवेश आएगा। विदेशी खासकर चीनी एप्स पर देश में यहां खुफिया तौर पर भारतीयों की निजी जानकारियां इक्ट्ठी कर लेने का आरोप है वहीं ये एप्स देश में अश्लीलता को भी फैला रहे हैं। देश विरोधी तत्व भी अगर इन विदेशी एप्स के माध्यम से देश के खिलाफ कोई दुष्प्रचार या साजिश का प्रसार करते हैं तब उन्हें भी नियंत्रित करने में काफी समस्याएं हैं ऐसे में अगर सरकार ने चीनी एप्स को प्रतिबंधित किया है तब यह सामाजिक-आर्थिक व सुरक्षा की दृष्टि से देशहित में लिया गया सराहनीय निर्णय है।
    माना कि चीनी एप्स के यूजर्स को काफी तकलीफ होगी चूंकि सोशल मीडिया में जरूरत से ज्यादा वक्त गुजारने की लोगों को लत लगी हुई है लेकिन इससे देश का अरबों रुपया बचेगा व करोड़ों घंटे काम के भी बचेंगे। विदेशी एप्स पर प्रतिबंधों के साथ-साथ सरकार को सोशल मीडिया पर स्वनियंत्रण की एक सुझाव या कहें जागरूकता सामग्री का भी प्रचार-प्रसार करना चाहिए। क्योंकि देश में जैसे-जैसे सस्ता इंटरनेट दायरा बढ़ रहा है एवं स्मार्टफोन सस्ते हुए हैं देश में कामकाज के घंटे प्रभावित हो रहे हैं। एक बड़ी आबादी अपने काम के घंटों में सोशल एप्स पर बिना जरूरत अपना वक्त बर्बाद कर रही है। सोशल मीडिया पर गुजारे गए वक्त को देश के उत्पादक समय में अगर बदला जाए तब यह राष्टÑ की प्रगति, शांति, सुरक्षा सबमें बहुमूल्य साबित होगा।

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