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    विपक्षी एकता का नाटक और कुमारस्वामी के आंसू

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    पिछले दिनों कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी एक सभा में रो पड़े। यह भी माना जा सकता है कि गठबंधन सरकार का प्रमुख बनने के बाद की परिस्थितियों ने उनके आंसू निकाल दिए। कुमारस्वामी के आंसू जेडीएस और कांग्रेस के खट्टे और तल्ख रिश्तों की पोल तो उजागर करते ही हैं, वहीं देश में विपक्ष एकता की सच्चाई का बयान भी करते हैं। ये वहीं कुमारस्वामी हैं जिनके शपथ ग्रहण समारोह के मंच पर विपक्षी दलों ने अपनी ताकत और मित्रता को संदेश पूरे देश को दिया था। अभी तो कर्नाटक की सरकार को बने चंद महीने ही हुए हैं और गठबंधन की सरकार के प्रमुख कुमारस्वामी के आंसू पूरा देश देख रहा है।

    मुख्यमं़त्री कुमारस्वामी के सहयोगी दल कांग्रेस ने उनके दुखी होने पर तंज कसा है कि मुख्यमंत्री को खुश रहना चाहिए वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल भाजपा ने कुमारस्वामी के आंसुओं को अवार्ड मिलने लायक बताकर उनका मजाक उड़ाया है। मुख्यमंत्री वाकई रोये या उन्होंने इसका अभिनय किया ये तो वही बेहतर बता सकते हैं लेकिन जिस तरह जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी का गठबंधन बेमेल विवाह जैसा था ठीक वैसे ही कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा फेंके दाने को जिसे कुमार ने लपका उसमें कोई सैद्धांतिक सोच तो थी नहीं।

    फिलहाल दोनों ही पार्टियां आगामी चुनाव के मद्देनजर अपनी ताकत बढ़ाने में जुटी हुई हैं। गठबंधन कब तक चलेगा ये भी नहीं कहा जा सकता। ऐसे में शुरूवाती दौर में ही कुमार स्वामी ने आंसू पोछते हुए जो सन्देश दिया वह बेहद साफ है। इससे यह तो साफ हो गया है कि कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के बीच कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। वैसे देखा जाए तो नेता आंसुओं की ताकत जानते हैं। कई ने इसके जरिए अपना भविष्य ही संवार लिया। नेताओं के लिए आंसू बहुत सी चीजों का इंश्योरेंस होते हैं। एचडी कुमारस्वामी भी बहुत मंझे हुए नेता है।

    तभी उन्होंने हिंदू मान्यता की याद दिलाते हुए आंसू बहाए कि वह भी शिवजी की तरह विषपान कर रहे हैं। कुमारस्वामी का ये बयान पूरी मीडिया में हेडलाइन बना। इससे सहयोगी दल कांग्रेस चिंतित भी है और उसकी किरकिरी भी हुई, विपक्षी बीजेपी ने इसे डरामा करार दिया और कहा कि उन्हें बेस्ट एक्टर का अवार्ड दिया जाना चाहिए। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने तो इसे गठबंधन की समाप्ति की शुरूआत तक कह दिया। राजनीति के कुछ जानकार कह रहे हैं कि यह गठबंधन के कमजोर होने का संकेत है। आगे चल कर सरकार भी गिर सकती है।

    लेकिन कुछ मान रहे हैं कि ये सोची समझी रणनीति है। इस रणनीति का अपना एक मकसद भी है। जेडीएस कार्यकतार्ओं के सामने आंसू बहा कर कुमारस्वामी ने एक चतुराई भरा कदम उठाया है। गौड़ा के सुपुत्र इस ताकतवर सेंटीमेंटल कार्ड को खेल कर एक तरह से कांग्रेस को चेतावनी दी है कि अगर वे टांग खिंचना जारी रखेगी तो दिक्कत होगी। वह अपने को सताया हुआ साबित कर देंगे। साथ ही उन्होंने बीजेपी को भी संकेत दे दिए कि 11 साल पहले उनके सहयोगी रहे बीएस येदुरप्पा ने जैसे उनके साथ ह्यविश्वासघातह्ण किया था वैसा वह भी कर सकते हैं।

    उनके पिता, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगैड़ा ने भी कर्नाटक के हुबली जिले में एक तरह से अपने बेटे के इस रुख का समर्थन किया। साथ ही कांग्रेस और बीजेपी दोनों पर हमला भी किया. मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि कुमारस्वामी को खुल कर काम करने नहीं दिया जा रहा है। उन पर बहुत अधिक दबाव है। दो महीने पहले जब यह कांग्रेस जेडीएस की साझा सरकार बनी तभी से पिता-पुत्र दोनों सताए जाने का कार्ड खेल रहे हैं ताकि कुछ सहानुभूति पैदा की जा सके। कुमारस्वामी अक्सर अपनी बेचारगी के बयान करते रहे हैं कि वे तो कांग्रेस के रहम पर हैं।

    जबकि 104 सदस्यों वाला विपक्ष उन्हें हटाने में लगा है। गठबंधन के कोआर्डिनेशन कमेटी के चेयरमैन और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सार्वजनिक तौर पर सरकार के स्थिरता को लेकर विवादास्पद बयान दे चुके हैं। उन्हें कभी गौड़ा का प्रतिद्वंदी माना जाता रहा। बीजेपी इसमें लगी है कि सरकार को उत्तर कर्नाटक के विरोधी के रूप में स्थापित किया जाय। बीजेपी के मुताबिक सरकार वहीं विकास के काम कर रही है जहां उसकी पकड़ मजबूत है। वैसे कर्नाटक की राजनीति को करीब से जानने वाले यह कहते हैं कि पिता-पुत्र दोनों बहुत चतुर हैं। अांसू बहाकर उन्होंने सरकार को सुरक्षित किया है।

    अगर कांग्रेस उनके लिए परेशानी पैदा करती है, तो लोगों की भावना कांग्रेस के विरोध में और जेडीएस के पक्ष में ही होगी. अगर बीजेपी उनके खिलाफ जाती है तो वो भगवा-दल को पुराने मैसूर और वोकालिंगा समुदाय के विरुद्ध बता सकते हैं। हाल में किसानों के कर्जमाफी के बाद कांग्रेस और बीजेपी दोनों को मजबूर कर दिया। सहयोगी कांग्रेस भी कर्जमाफी नहीं चाह रही थी, क्योंकि पूरा के्रडिट जेडीएस को मिल जाएगी। राहुल गांधी को इसे मुद्दा न बनाने के लिए कांग्रेसियों को मनाना पड़ा। बीजेपी को डर है कि आने वाले लोक सभा चुनाव में यह मुद्दा उनके खिलाफ जा सकता है।

    कुमारस्वामी के इस भावुक भाषण की तात्कालिक वजह सोशल मीडिया पोस्ट हैं। मीडिया में आयी रिपोर्टों के मुताबिक, मुख्यमंत्री के भावुक भाषण के पीछे सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ चल रहा वह अभियान है जिसमें ‘कुमारस्वामी हमारे सीएम नहीं हैं।’ बताया गया है। इसके अलावे एक वीडियो में कोडागू के एक लड़के को यह कहते सुना जा रहा है कि जिले में भारी बारिश के बाद सड़कें बह गई हैं लेकिन मुख्यमंत्री को इसकी फिक्र नहीं है।

    कुमारस्वामी ने गठबंधन की मजबूरियां बताते हुए कहा कि बिना बहुमत के सरकार चलाना काफी मुश्किल है। स्पष्ट जनादेश नहीं मिलने से सरकार चलाने में मुझे ज्यादा खुशी नहीं हो रही है। विपक्षी पार्टियां अगले लोकसभा चुनाव से पहले एकजुटता दिखाने के तरीके खोज रही हैं। इस बीच कुमारस्वामी का बयान विपक्षी एकता के झूठे नाटक को शीशा दिखाने का काम कर रहा है। असल में सत्ता पाने और मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिए जो देश भर में परस्पर विरोधी और विचारधारा से विपरीत दल आपस में गले मिल रहे हैं, उसकी जमीनी सच्चाई यही है, जो इन दिनों कर्नाटक में दिख रहा है। कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस की सरकार के शपथ लेने के मौके पर देश भर के विपक्षी नेता बेंगलुरू में जुटे थे।

    उसके बाद अभी ऐसी जुटान का दूसरा मौका नहीं मिला है। बताया जा रहा है कि चेन्नई में विपक्षी पार्टियों के नेताओं का जमावड़ा होगा। डीएमके नेता एमके स्टालिन तमाम विपक्षी नेताओं की मेजबानी करेंगी। यह भी कहा जा रहा है कि विपक्षी पार्टियां भारत बंद की योजना भी बना रही हैं। किसानों के मसले पर और रोजगार व आर्थिक गड़बड़ियों को लेकर विपक्ष मानसून सत्र के दौरान भारत बंद का ऐलान कर सकता है। कुमारस्वामी के बयान के बाद विपक्षी एकता को धक्का लगना तय है।

    गठबंधन की सरकार बनने के बाद कुमारस्वामी ने भगवान शंकर जी की तरह विषपान करने की जो बात कही वह सरासर गलत है क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें किसी ने मजबूर नहीं किया था। स?ाा की लालच में जिसे वे अमृत समझकर गटक गए अब यदि वह उन्हें विष लग रहा है तो उसके लिए कोई दूसरा कसूरवार नहीं है। हालांकि रोने और आंसू पोछने की विवशता के बावजूद कुमारस्वामी ने अब तक पद से इस्तीफा नहीं दिया है। यह भी लगभग निश्चित है कि वह इस्तीफा तब तक नहीं देंगे जब तक उसके लिए मजबूर नहीं कर दिए जाएंगे।

    ये पहला अवसर नहीं जब देवेगौड़ा परिवार स?ाा के लालच में कांग्रेस के शिकंजे में फंसा हो लेकिन दूसरी तरफ ये भी सच है कि कुमार यदि स?ाा में न आते तो वे कर्नाटक की राजनीति में हांशिये पर सिमटने की स्थिति में आ चुके थे। उस लिहाज से तो ये स?ाा उनके लिए अमृत जैसी हो गई। वे खुद भी जानते हैं ये ज्यादा दिन रहेगी नहीं इसीलिए वे इस तरह का नाटक दिखाकर सहानुभूति बटोरना चाह रहे हैं। फिलवक्त कर्नाटक के नाटक से कांग्रेस और भाजपा दोनों की मुसीबतें तो बढ़ी ही हैं, वहीं विपक्षी एकता की गाड़ी में भी फिलवक्त ब्रेक लगता दिख रहा है।

     

    राजेश महेश्वरी

     

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