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    सरकारी जन औषधि केंद्रों को स्वस्थ बनाने की जरूरत

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    अक्सर ही देखा जाता है कि एक बार तो भलाई योजनाओं की शुरूआत कर दी जाती है, लेकिन बाद में यह दम तोड़ जाती हैं। इसी तरह ही मंझधार में लटक रहे हैं केंद्र सरकार द्वारा खोले गए सस्ती दवाइयों वाले जन औषधि जैनरिक ड्रग स्टोर। यह स्टोर केंद्र में दो बार सत्ता पर काबिज रही पूर्व प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी योजना के तहत देश के जिला सरकारी अस्पतालों में खोले थे।

    उन्होंने जब दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाई थी, तो उन्हें चुनाव से पहले अपने चुनावी घोषणापत्र में लोगों को सस्ती दवाएं प्रदान करवाने का वादा किया था। इसी के तहत यह स्टोर खोले गए थे, लेकिन यह स्टोर खुलने के बाद लोगों को कोई खास सहुलियत नहीं मिली। वर्तमान की भाजपा सरकार में यह केन्द्र अधिक तीव्र गति से खोले जा रहे हैं, लेकिन इन केन्द्रों पर दवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।

    इन स्टोरों को 2008 में शुरू किया गया था। अब पूरे भारत में इन स्टोरों की संख्या 1289 है। पंजाब में कुल 39 हैं। एक बार तो यह स्टोर खोल दिए, लेकिन सरकार ने इस तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।

    इन केंद्रों में सस्ते भाव पर जेनेरिक दवाइयां भेजी गई थीं, जिनकी कीमत तो सचमुच ही बहुत कम है। लेकिन प्रतिदिन 24 घंटे खुलने वाले यह स्टोर कभी भी लोगों के न बन सके, क्योंकि पहली बात, यहां पर दवाइयों की संख्या बहुत कम ही रही है। दूसरी बात, जो दवाइयां इन स्टोरों पर उपलब्ध करवाई जाती हैं, उनको सरकारी अस्पतालों में मौजूद डाक्टरों द्वारा कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया।

    इसलिए लोगों को पहले की तरह निजी दुकानों से महंगे भाव पर ही दवाएं लेनी पड़ती हैं। डाक्टरों द्वारा ज्यादातर बड़ी निजी कंपनियों की दवाइयों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। जन औषधि स्टोर बी.पी.पी.आई. (ब्यूरो फारमा आफ इंडिया) के तहत चलते हैं। यहां पर जो कम भाव पर दवाइयां उपलब्ध करवाई जाती हैं।

    वो पांच कंपनियां इंडियन ड्रग फार्मास्युटिकल लिमिटेड, हिंदुस्तान एंटीबायोटिक, बंगाल कैमीकल लिमिटेड, राजस्थान ड्रग फार्मास्युटिकल लिमिटेड, कर्नाटक एंटीबायोटिक की दवाइयां उपलब्ध करवाई जाती हैं। पहले तो सीधे ही आदेश देने पर यह कंपनियां दवाइयां भेज दिया करती थीं, लेकिन अब राज्य स्तर पर दवाइयां सप्लाई करने वाले बड़े स्टोर बना दिए गए हैं।

    लेकिन दवाइयों की कमी फिर पूरी नहीं हो सकी है। बी.पी.पी.आई. की तरफ से 757 दवाइयों की सूची जारी की हुई है, लेकिन स्टोरों में 150 से 200 तक दवाइयां ही मुश्किल से पहुंच पाती हैं। जिन दवाइयों की सूची जारी की हुई है, यदि वो सभी दवाई इन स्टोरों पर भेजी जाएं, तो लोगों को आसानी से सभी दवाइयाँ पाप्त हो सकती हैं।

    ये स्टोर शुरू में तो जिला रेडक्रॉस सोसाइटी के अंतर्गत कर दिए गए थे। बाद में कई स्टोरों की हालत ज्यादा बुरी होने की वजह से उन्हें बंद कर दिया गया। इसके बाद इन केन्द्रकों को रोगी कल्याण समिति के अंतर्गत कर दिया गया। सस्ती दवाइयां उपरोक्त कंपनियों द्वारा भेजी जाती थीं, उनकी संख्या कम होने के कारण दवाइयों की कमी पूरी करने के लिए जिला स्तर पर समितियां बनाकर निजी दवाइयों की खरीद करके गुजारा किया जाने लगा। लेकिन डाक्टरों की सिफारिशों पर निजी कंपनियों की दवाइयां इन स्टोरों पर ब्रिकी की जाने लगी।

    अब इन स्टोरों में काम कर रहे कर्मचारियों की बात की जाए, तो उनकी स्थिति सांप के मुंह में छिपकली जैसी है। यानि इन कर्मियों का वेतन बहुत ही कम है। इनकी नौकरी भी पक्की नहीं है। सरकार के पास इनके लिए कोई एजेंडा नहीं है। दरअसल राज्य सरकारें इस योजना को प्रभावी ढंग से चलाने के लिए सोचना अपना फर्ज नहीं मानती।

    सरकारों को ऐसा कोई फंड यां ग्रांट जारी नहीं किया जाता, जिससे इनका निर्माण हो सके। जो भी इन स्टोरों का खर्च होता है, वो भी दवाइयों की ब्रिकी करके पूरे किए जाते हैं। इसलिए केंद्र सरकार को इन स्टोरों को स्वस्थ बनाने के लिए विशेष फंड जारी करने चाहिए, ताकि उनका निर्माण अच्छे से हो सके। सभी दवाइयों का इन स्टोरों पर भेजने का प्रबंध किया जाए, ताकि हर जरूरतमंद को सस्ती दवा आसानी से मिल सके और जिस प्रयोजन से यह जन औषधि स्टोर खोले गए थे, वह पूरा हो सके।

    – सुखराज चहल धनौला

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