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    ब्लैक होल्स : ये है ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य, इसमें है प्रकाश को भी निगलने की अद्भुत शक्ति

    NASA News

    नई दिल्ली। ब्रह्मांड के गहनतम रहस्यों में यदि किसी एक पिंड का नाम सबसे पहले लिया जाता है, तो वह है ब्लैक होल। नाम से भले ही यह किसी छिद्र का आभास कराए, किंतु वास्तव में यह अत्यंत सघन द्रव्यमान वाला खगोलीय पिंड होता है, जिसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी प्रबल होती है कि प्रकाश तक उससे बाहर नहीं निकल पाता। इसी कारण यह प्रत्यक्षतः काला दिखाई देता है। NASA News

    ब्लैक होल के चारों ओर गैस और धूल का एक तीव्र गति से घूमता हुआ चक्र बनता है, जिसे ‘एक्रीशन डिस्क’ कहा जाता है। यह क्षेत्र अत्यधिक तापमान के कारण एक्स-रे तथा अन्य उच्च ऊर्जा विकिरण उत्सर्जित करता है। वैज्ञानिक इन्हीं संकेतों के माध्यम से ब्लैक होल की उपस्थिति और व्यवहार का अध्ययन करते हैं। इसके केंद्र में एक सीमा-रेखा होती है, जिसे ‘इवेंट होराइजन’ कहा जाता है। यह वह बिंदु है जिसके भीतर प्रवेश करने के बाद कोई भी वस्तु—यहां तक कि प्रकाश भी—वापस नहीं लौट सकती।

    ब्लैक होल अपने प्रबल गुरुत्वाकर्षण से पास से गुजरने वाले प्रकाश को मोड़ देते हैं

    ब्लैक होल अपने प्रबल गुरुत्वाकर्षण से पास से गुजरने वाले प्रकाश को मोड़ देते हैं। यह प्रभाव किसी लेंस की भांति कार्य करता है और दूर स्थित तारों या आकाशगंगाओं की छवि को विकृत या बहुगुणित कर सकता है। इस घटना को ‘गुरुत्वीय लेंसिंग’ कहा जाता है। इसी तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक उन ब्लैक होल्स का पता लगाते हैं, जो प्रत्यक्षतः दिखाई नहीं देते। NASA News

    हमारी आकाशगंगा मिल्की वे के केंद्र में एक अतिविशाल ब्लैक होल स्थित है, जिसे सैजिटेरियस ए* कहा जाता है। इसका द्रव्यमान सूर्य से लगभग 40 लाख गुना अधिक है। यह पृथ्वी से हजारों प्रकाश वर्ष दूर स्थित होते हुए भी खगोलशास्त्रियों के लिए अध्ययन का प्रमुख विषय बना हुआ है।

    अब तक ज्ञात सबसे विशाल ब्लैक होल टीओएन 618 है, जिसका द्रव्यमान सूर्य से सैकड़ों अरब गुना अधिक माना जाता है। वहीं, कुछ ब्लैक होल अपेक्षाकृत छोटे भी पाए गए हैं, जिनका द्रव्यमान सूर्य के कुछ गुणा के बराबर है। यदि कोई वस्तु ब्लैक होल के अत्यंत समीप पहुंच जाए, तो तीव्र गुरुत्वाकर्षण के कारण वह लंबी और पतली हो जाती है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक ‘स्पेगेटीफिकेशन’ कहते हैं।

    कैसे बनता है ब्लैक होल? | NASA News

    ब्लैक होल सामान्यतः तब बनते हैं जब अत्यंत विशाल तारे अपने जीवन के अंतिम चरण में सुपरनोवा विस्फोट के साथ ध्वस्त हो जाते हैं। उनके अवशेष इतने सघन हो जाते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का संतुलन टूट जाता है और ब्लैक होल का निर्माण होता है।

    यह धारणा गलत है कि ब्लैक होल सब कुछ निगल लेने वाले ‘वैक्यूम क्लीनर’ होते हैं या किसी अन्य ब्रह्मांड का द्वार हैं। दूर से इनका प्रभाव अन्य तारों की भांति ही गुरुत्वीय नियमों के अधीन होता है। ब्लैक होल आज भी वैज्ञानिकों के लिए गहन शोध का विषय हैं और ब्रह्मांड की संरचना तथा समय-स्थान के सिद्धांतों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।