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    राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बारीकी से समझें!

    Understand Supreme Court's decision on Raphael!

    राफेल विमानों की कीमत को लेकर क्या मोदी सरकार ने शपथ-पत्र देकर (Understand Supreme Court’s decision on Raphael!)  सुप्रीम कोर्ट में झूठा बोला? आखिर इस मामले की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच कराने से क्यों बच रही है मोदी सरकार? ये वह मुख्य सवाल हैं जो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों राफेल मामले में अपना फैसला सुनाते हुए उन सारी याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें इस सौदे की जांच कराने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने राफेल विमानों की कीमत के बारे में जो फैसला सुनाया है उसका आधार सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह दिया गया है कि चूंकि विमानों की कीमत सीएजी यानी महालेखा नियंत्रक के पास हैं और सीएजी ने कीमत की रिपोर्ट संसद की लोकलेखा समिति यानी पीएसी को सौंपी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यही सवाल उठाया कि सीएजी ने तो राफेल की कीमतों के लेकर कोई रिपोर्ट पीएसी को दी ही नहीं है, तो मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आखिर ऐसा क्यों कहा? सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद राहुल गांधी ने सरकार पर जिस तरह हमला बोला है उससे यह प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं राफेल मामले में कुछ गड़बड़ है। यही वजह है कि सरकार इस मामले में जेपीसी से जांच कराने से भाग रही है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कुछ आरोपों से बरी कर दिया है। प्रकारांतर से आरोप लगाने वाले अब आरोपों के घेरे में आ जाएंगे। उल्टे राष्ट्रीय सुरक्षा के राजनीतिकरण के आरोप भी लगेंगे। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने राफेल को ‘घोटाला-घोटाला’ कहने के साथ ‘चौकीदार चोर है’ भी गढ़ लिया। इससे शंका का पर्याप्त माहौल बन गया था।

    पार्टी की योजना इसे देर तक खींचने की थी। अदालत में जाने और फैसला आने से ये मामला बहुत जल्दी तार्किक परिणति तक पहुंच गया। कांग्रेस इस मसले को चुनाव तक खींचना चाहती थी, जो अब सम्भव नहीं दिखता। बेशक रिलायंस परिवार को मिले आॅफसेट अधिकार और क्रोनी कैपिटलिज्म जैसे आरोप बदस्तूर रहेंगे पर आरोपों की हवा अब निकल चुकी है। उनमें अब वह दम नहीं बचा, जितनी हवा बाँधी गई थी। राफेल मामले में मनोहर लाल शर्मा अपनी याचिका में एफआईआर दर्ज कर जांच की मांग कर रहे थे। उनकी मांग भारत और फ्रांस के बीच 36 राफेल विमानों की खरीद रद्द करने की भी थी। विनीत ढांडा ने अपनी याचिका में कहा है कि अखबारों में छप रही खबरों के कारण रिट याचिका दायर कर दी है।

    तीसरे याचिकाकर्ता सांसद संजय सिंह की मांग थी कि इस डील में खरीद की प्रक्रिया अवैध है और पारदर्शिता नहीं बरती गई। कोर्ट जांच करे कि विमान की कीमत में कैसे बदलाव आया, कोर्ट इसकी जांच करे। चौथे याचिकाकर्ता यशवंत सिन्हा, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी की मांग थी कि उनकी शिकायत पर सीबीआई ने एफआईआर दर्ज नहीं की है। उनका मानना था कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है। इसलिए कोर्ट एफआईआर दर्ज करने और जांच का आदेश दे। अब अदालत इस सवाल को लेकर आगे बढ़ती है कि क्या वह टेंडर और कांट्रेक्ट से संबंधित प्रशासनिक फैसलों की न्यायिक समीक्षा कर सकती है। तीन फैसलों का उदाहरण देते हुए फैसले में लिखा गया है कि यह सड़क या पुल बनाने के टेंडर का मामला नहीं है, रक्षा से संबंधित खरीद की प्रक्रिया का मामला है। इसलिए न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित हो जाता है।

    अदालत ने बार-बार साफ किया है कि इस मामले में उसकी सीमा है। अरुण जेटली ने अदालत की सीमा की बात कही है। क्या इस फैसले से जवाब मिलता है कि हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को डील से क्यों बाहर किया गया? इस पर फैसले में लिखा है कि 126 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट जिनमें से 18 तैयार अवस्था में आने थे और बाकी 108 हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड द्वारा बनाए जाने थे? जिन्हें साइन करने की तारीख के बाद से 11 साल के भीतर तैयार करना था। सरकारी कागजात के अनुसार 126 विमानों की खरीद का अनुरोध प्रस्ताव मार्च 2015 में वापस लिया गया। 10 अप्रैल 2015 को 36 राफेल विमान खरीदने का भारत और फ्रांस के साझा घोषणा-पत्र में एलान होता है।

    इसे डीएसी, रक्षा खरीद कमेटी ने मंजरी दी थी। जून 2015 में 126 विमान खरीदने का अनुरोध प्रस्ताव वापस ले लिया जाता है। क्या उस साझा घोषणा-पत्र में लिखा है कि 126 विमानों वाला प्रस्ताव वापस लिया जाएगा? मार्च 2015 में 126 विमानों की खरीद का अनुरोध प्रस्ताव वापस लेने की बात अदालत के फैसले में है। अब जरा याद कीजिए। डील होती है 10 अप्रैल 2015 को। इसके दो दिन पहले यानी 8 अप्रैल को विदेश सचिव जयशंकर कहते हैं कि एचएएल डील में शामिल है। 10 अप्रैल के 14 दिन पहले यानी मार्च 2015 में ही राफेल के सीईओ एचएएल के डील में होने की बात पर खुशी जाहिर करते हैं। क्या उन्हें पता नहीं था, क्या उनकी जानकारी के बगैर कुछ बदल रहा था। इसका जवाब अदालत के फैसले से नहीं मिलता है।

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल मामले में जांच की मांग वाली याचिकाओं को खारिज करने के बाद वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कोर्ट का फैसला एकदम गलत है। उन्होंने कहा कि एयरफोर्स से बिना पूछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस में जाकर समझौता कर लिया और इसके बाद तय कीमत से ज्यादा पैसा दे दिया। भूषण ने ये भी कहा कि सरकार ने राफेल मामले में कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट दी है जिसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है। इसके अलावा कोर्ट ने आॅफसेट पार्टनर चुनने के मामले में भी गलत नहीं माना है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि दासो एविएशन को अपना आॅफसेट पार्टनर चुनना था हालांकि रक्षा सौदे में लिखा है कि बिना सरकार की सहमति के कोई फैसला नहीं लिया जा सकता है। इस मामले में पिछली सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने फ्रांस की कंपनी दासो के साथ साजिश करने का भी आरोप लगाया जिसने आफसेट अधिकार रिलायंस को दिए हैं।

    उन्होंने कहा था कि यह भ्रष्टाचार के समान है और यह अपने आप में एक अपराध है। उन्होंने कहा कि रिलायंस के पास आफसेट करार को क्रियान्वित करने की दक्षता नहीं है। मालूम हो कि सितंबर 2017 में भारत ने करीब 58,000 करोड़ रुपये की लागत से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए फ्रांस के साथ अंतर-सरकारी समझौते पर दस्तखत किए थे। इससे करीब डेढ़ साल पहले 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पेरिस यात्रा के दौरान इस प्रस्ताव की घोषणा की थी। आरोप लगे हैं कि साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस सौदे में किए हुए बदलावों के लिए ढेरों सरकारी नियमों को ताक पर भी रखा गया।इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई टिप्पणी नहीं की है। देखना है कि फैसला आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा आरोपों पर अड़े रहना क्या गुल खिलाता है?

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