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    आजादी, पर कैसी

    आज भारत की आजादी को 70 वर्ष हो रहे हैं। यह आजादी हमें वर्षों के संघर्ष और बलिदान देने की बाद ही मिली है। उस दिन को भी हम नहीं भुला सकते जब 9 अगस्त 1942 को ’अंग्रेजो भारत छोड़ो‘ का नारा दिया गया और अंग्रेजों के पैर उखाड़ने हेतु हमारे आजादी के दीवानों ने अपनी जान की बाजी लगाई और खूनी खेल खेले और जमकर संघर्ष किया और अंग्रेजों को खदेड़ दिया और हमें 15 अगस्त 1947 को आजादी दिलाई। न जाने कितने वीरों ने अपने घर परिवार छोड़ दिये थे और देश की स्वतंत्राता के लिए स्वतंत्राता संग्राम में कूद पड़े थे।

    कुछ शीर्ष नेताओं महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र, चन्द्रशेखर, भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल, गेंदालाल आदि को तो हम सहज ही याद कर लेते हैं मगर न जाने कितने हजारों वीर थे जिन्हें हम नहीं जानते। वह समय उस धारा का था जब हर व्यक्ति के मन में राष्ट्र प्रेम की भावना थी, लेकिन आज हमारी आजादी धूमिल-सी प्रतीत हो रही है। हर तरफ आतंक का राज फैल रहा है। सारे नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये हैं। नित नये घोटाले हो रहे हैं। आज प्रकृति से हमें मुफ्त में मिलने वाली घास-फूस भी नहीं बची है। क्या हमारे स्वतंत्राता सेनानियों ने ऐसा सोचा होगा कि आने वाली हमारी पीढ़ी स्वतंत्र होते हुये भी परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ जायेगी। आज स्थिति यह हो गयी है कि जनता के नेता बने लोग अपने फायदे हेतु अपने ही देश को लूट रहे हैं। आजादी के समय हिंदू-मुस्लिम एकता थी। दोनों ही मिलजुल कर रहते थे।

    आज हिंदू-मुस्लिम दंगे व तनाव हर शहर की कहानी है। इसके जिम्मेवार और कोई नहीं, हम ही हैं। आज बुराई इतनी फैल चुकी है कि संसद और विधान सभाएं, जिन्हें सच्ची राहों पर चलने वाला कहा जाता है, भी नहीं बची हैं। वहां भी आपसी कलह, तोड़-फोड़ एवं गाली-गलौज चलती रहती है। क्या कोई बता सकता है कि भगत और राजगुरू ने ऐसा ही सोचा होगा, बिलकुल नहीं। आज पूरे समाज में भ्रष्टाचार, भुखमरी, बेरोजगारी, आतंक, कुप्रवृत्ति, बेईमानी और अराजकता, नशा, तस्करी की बेड़ियों ने अपना घना जाल फैला दिया है। अगर आज देश से बुराइयों का जाल नहीं काटा गया तो 70 वर्ष क्या, सैंकड़ों वर्ष में भी हम सही मायने में आजाद नहीं हो सकते। आजादी पर्व पर हमें उन वीरों को याद कर उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देनी होगी और शपथ लेनी होगी कि हम अपनी आजादी को हर कीमत पर बचाकर रखेंगे।

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