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    नये आरक्षण कोटे से क्या प्राप्त होगा?

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    सरकार द्वारा हाल ही में अगड़ी जातियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत का आरक्षण देने का निर्णय वास्तव में एक दिखावा है। इस संबंध में विधेयक का कांग्रेस ने राज्य सभा और लोक सभा में विरोध नहीं किया जिससे यह पारित हो गया। विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने यह कदम तीन हिन्दी भाषी क्षेत्रों में विधान सभा चुनावों में हार के मद्देनजर उठाया कि कहीं उसका अगड़ी जातियों का मुख्य वोट बैंक नाराज न हो जाए। इस आरक्षण के लिए शर्त रखी गयी है कि परिवार की आय 8 लाख रूपए तक हो या परिवार के पास पांच एकड़ से कम कृषि भूमि हो। वास्तव में यह विधेयक मध्यम आय वर्ग के लिए लाया गया न कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए। आय के नए मानदंड से 90 प्रतिशत भारतीय इस नए आरक्षण के पात्र हो जाएंगे। अन्य पिछड़े वर्गों में क्रीमीलेयर के लिए 8 लाख की आय की सीमा रखी गयी है। तीसरा मानदंड एक हजार वर्ग फुट तक का घर रखा गया है। जबकि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 20 धनी लोगों के पास भी 45.99 वर्ग मीटर औसत फ्लोर एरिया है जो लगभग 500 वर्ग फुट बैठता है। इसका तात्पर्य है कि देश की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या नया आरक्षण कोटा के लिए पात्र हो जाएगी।

    जैसा कि सभी जानते हैं कि भारत में नियोजन में शहरी क्षेत्रों तथा मध्य और उच्च आय वर्ग पर बल दिया गया है। सरकार समाज के किसी भी वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान कर सकती है किंतु उसके लिए उसे ठोस प्रमाण देनें होंगे कि उस वर्ग का सरकारी नौकरी या शिक्षा में उचित प्रतिनिधित्व नहीं है। 1991 में इंदिरा साहनी मामले से लेकर अनेक मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी वर्ग को आरक्षण देने के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में उस वर्ग के संबंध में विशिष्ट आंकडे होने चाहिए। इसलिए यह नया आरक्षण कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध जाता है और इस बात की संभावना है कि न्यायालय इसके पक्ष में निर्णय न दे। नरसिम्हा सरकार ने 1991 में कार्यकारी आदेश के माध्यम से उच्च जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था किंतु उच्चतम न्यायालय ने इसे अवैध घोषित कर दिया था।

    इसलिए मोदी सरकार अब संविधान संशोधन लेकर आयी और इस तत्थ को ध्यान में रखते हुए संविधान के बुनियादी ढांचे में सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण देने की गुंजाइश है किंतु लगता है न्यायालय इसे भी स्वीकार नहीं करेगा। इस संविधान संशोधन के बाद आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक हो गयी है जबकि न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित कर रखी है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अलग वर्ग नहीं माना गया है और इसीलिए सरकार को अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करना पड़ा और जब उच्चतम न्यायालय इसकी जांच करेगा तो शायद यह कानूनी कसौटी पर खरा न उतरे क्योंकि न्यायालय ने बार बार कहा है कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।

    हालांकि तमिलनाडू और महाराष्ट्र में क्रमश: 69 ओर 68 प्रतिशत आरक्षण है। कुछ अन्य राज्यों जैसे हरियाणा ने 67 प्रतिशत, तेलंगाना ने 62 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश ने 55 प्रतिशत और राजस्थान ने 54 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रस्ताव किया है। अब तक आरक्षण सामाजिक और शैक्षिक पिछडेÞपन के आधार पर दिया जाता रहा है और संविधान के अनुचछेद 16 ;4द्ध में सामाजिक पिछडेÞपन का उल्लेख है। शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन सामाजिक पिछड़ेपन को बढ़ावा दे सकता है किंतु यह अलग है। अगड़ी जातियों के लिए आरक्षण देने की यह नीति वह भी विशेषकर मध्यम आय वर्ग को आरक्षण देने का यह प्रावधान वास्तव में गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को समान अवसर देने के उद्देश्य को पूरा नहीं करता है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तथा बाद में अन्य पिछडेÞ वर्गों को आरक्षण देने का मूल उद्देश्य उनकी दशा में सुधार करना था। कुछ लोगों का मानना है कि ब्राहमण, क्षत्रिय, खत्री, कायस्थ और बनिया आदि वर्गों को ऐसा लाभ देना सामाजिक न्याय की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। तथापि अगड़ी जातियों में मराठा, जाट, गुज्जर, और पटेल जैसी अन्य जातियों को आरक्षण के लाभों के लिए चुना जा सकता है।

    वर्तमान आरक्षण से कुछ सामाजिक समूहों को लाभ मिलेगा। जो आरक्षण प्रणाली का एक वोट बैंक की राजनीति के रूप में उपहास करता है। विडंबना यह है कि तथाकथित आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों द्वारा आरक्षण के पात्र होने के लिए दावे प्रतिदावे करने का मंच तैयार हो गया है और इससे सामाजिक और राजनीतिक तनाव पैदा हो सकता है। वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह घोषणा चुनावों से मात्र 100 दिन पूर्व की गयी है। अत: यह राजनीति प्रेरित है। यह राजग सरकार की उस हताशा को भी दशार्ता है कि वह रोजगार के अवसर सृजित नहीं कर पायी तथा बेरोजगारी और अर्ध बेरोजगारी बढ़ी है। अब पिछड़ी जातियां मांग कर सकती हैं कि उनके आरक्षण कोटे को उनकी जनसंख्या के अनुसार बढ़ाया जाए। कैथोलिक बिशप कांफ्रेस आॅफ इंडिया ने इस बात पर खेद व्यक्त किया है कि शिक्षा और रोजगार में अनुसूचित जाति मूल के ईसाइयों और मुसलमानों को आरक्षण नहीं दिया गया है।

    उसने संविधान 124वां संशोधन विधेयक 2019 को जल्दबाजी में पारित करने पर चिंता व्यक्त की और प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि अनुसूचित जातियों ओर जनजातियों के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में बढ़ाया जाए। समाजशास्त्रियों के एक वर्ग का कहना है कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए और इसका लक्ष्य गरीब तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की दशा में सुधार करना होना चाहिए। वर्तमान प्रावधान के संबंध में बेहतर होता कि आय की सीमा दो या ढ़ाई लाख रखी जाती जिससे आरक्षण का लाभ आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों या निम्न आय वर्गों को मिलता। वर्तमान प्रावधान का कोई आर्थिक औचित्य नहीं है और शायद उच्चतम न्यायालय इसे स्वीकार न करे। इससे स्पष्ट होता है कि हमारे देश के नेता और योजनाकार वास्तव में गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की कोई चिंता नहीं करते जो वास्तव में अपनी दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कृषि तथा ग्रामीण संकट बताता है कि इन लोगों की आय को रोजगार अवसर सृजित कर और ग्रामीण क्षेत्र की दशाओं में सुधार कर बढ़ाया जा सकता है।

    धुर्जति मुखर्जी

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