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    Education: जब संवेदना ने शिक्षा को जीता

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    Education: जब संवेदना ने शिक्षा को जीता

    Education: जिस युवक ने बचपन में मवेशियों को चराया, खेतों में पसीना बहाया, उसे जब पढ़ाने की सरकारी नौकरी मिली, तो यह केवल एक पद नहीं था- यह उसकी तपस्या का फल था। मेहनत उसकी आदत थी, और विद्वान शिक्षकों की संगत ने उसके भीतर विचारों की गहराई भर दी थी। पढ़ाने के बाद जब भी समय मिलता, वह फूलों की क्यारियों में खुरपी लेकर चला जाता। सुबह की सभा में विद्यार्थियों से किसी न किसी विषय पर संवाद करना उसका स्वभाव बन गया था। बच्चे उसकी बातों को ध्यान से सुनते, जैसे शब्दों में कोई जादू हो।

    सेवा में उसे अभी दो ही महीने हुए थे। स्कूल का चौकीदार, जिसकी ड्यूटी सुबह स्कूल खुलने तक ही होती थी, सभा के अंत तक एक कोने में खड़ा रहता और पूरी सभा को सुनता। सभा समाप्त होते ही वह चुपचाप घर चला जाता। एक दिन छुट्टी से कुछ मिनट पहले वह मेरे पास आया, संकोच से भरा हुआ। बोला, साहब जी, मेरी एक अर्जी लिख देंगे? मैंने कहा, हां-हां, जरूर। किस नाम से लिखवानी है? उसने बताया कि उसने एक छोटा-सा घर बनाया है और बिजली का मीटर लगवाना चाहता है।

    मैं उसी समय अर्जी लिखने बैठ गया। जब तक अर्जी पूरी हुई, स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी। सारा स्टाफ अपनी हाजिरी लगाकर जा चुका था। मैंने भी हाजिरी लगाई, बैग उठाया और बस अड्डे की ओर चल पड़ा। रोजाना मिलने वाली बस निकल चुकी थी। अगली बस चालीस मिनट बाद आई। मैं पीपल के नीचे बैठा, एक किताब पढ़ने लगा। समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला।

    अगले दिन जब मैं चाय पीने अपने साथियों के पास गया, तो उनकी निगाहें बदली-बदली सी लगीं। मैंने चाय का कप उठाया और बाहर निकलने लगा, तभी एक मास्टर ने आवाज दी, सर, कल आप अर्जी लिखने बैठ गए थे, आपकी तो बस निकल गई होगी? मैंने मुस्कराकर कहा, हां जी, बस तो निकल गई थी, लेकिन अगली बस तक मैं किताब पढ़ता रहा, पता ही नहीं चला।

    उसने कहा, डॉक्टर साहब, बात ये नहीं कि आपको समय का पता नहीं चला। बात ये है कि आपने उसकी अर्जी क्यों लिखी? उसने हमसे भी कहा था, लेकिन हमने नहीं लिखी। आप तो यूनिवर्सिटी पढ़े-लिखे हैं, गांव की चाल-ढाल आपको नहीं मालूम। ऐसे लोगों को ज्यादा मुंह नहीं लगाते हम। आप भी थोड़ा फासला रखें।

    उसकी बात सुनकर मुझे क्रोध तो बहुत आया, लेकिन फिर मन में विचार आया- जिस व्यक्ति पर मैं क्रोध करना चाहता हूं, क्या वह मेरे स्तर का है? मैंने चाय का कप वहीं रख दिया और बाहर निकलते हुए केवल एक वाक्य कहा, यदि इन पवित्र शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने वालों की सोच इतनी छोटी है, तो विद्यार्थी अच्छी सोच के लिए कहां जाएंगे? उस दिन के बाद मैंने उस समूह के साथ बैठना और चाय पीना छोड़ दिया। शिक्षा केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं, बल्कि संवेदना का विस्तार है। यदि हम किसी जरूरतमंद की मदद करने में संकोच करें, तो हमारे शिक्षित होने का क्या अर्थ रह जाता है?
    —डॉ. इकबाल सिंह सकरोदी