हमसे जुड़े

Follow us

15.6 C
Chandigarh
Friday, February 27, 2026
More
    Home फीचर्स साहित्य कबीर दास जी क...

    कबीर दास जी के दोहे

    Kabir Das

    निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय,
    बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

    बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
    जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

    पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

    माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
    कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

    जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही।
    सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।।

    आछे/पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत।
    अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत।।

    साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय।
    मैं भी भूखा न रहूँ साधु ना भूखा जाया।।

    माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
    माँगन ते मरना भला, यह सतगुरु की सीख।।

    माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
    एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय।।

    गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय।
    बलिहारी गुरु आपनों, गोविंद दियो मिलाय।।

    बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
    पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।

    तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय।
    कबहूँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होया।।

    अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।