हमसे जुड़े

Follow us

17.4 C
Chandigarh
Wednesday, March 4, 2026
More
    Home विचार सम्पादकीय शराब और ‘सरका...

    शराब और ‘सरकारी’ अर्थ शास्त्र

    57 dead from poisonous drinking

    उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड से खबरें आ रही हैं कि जहरीली शराब पीने से 57 मौतें हो गई हैं। शराब के साथ ‘जहरीली’ शब्द जोड़ कर पुलिस व सरकार बिना सरकारी मंजूरी वाले ठेकों पर मिलने वाली शराब को जहरीली शराब का नाम दे रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या ठेके पर बिकने वाली शराब दूध घी जैसी है। जब सरकार की शराब संबंधी नीतियां ही ऐसीं बनेंगी तब उक्त घटनाएं तो घटित होंगी ही। शराब सरकार की कमाई बन गई है। कोई भी राजनैतिक पार्टी शराब का उत्पादन और बिक्री रोकने के लिए तैयार नहीं। असली व नकली शराब दोनों ही घातक हैं जब असली शराब बिकेगी तो पीने वाले फिर शराब ढूंढेंगे ही।

    चाहे उनको सरकारी भाषा में नकली शराब ही मिले। सरकारें और विपक्ष पार्टियां धर्म, संस्कृति की बातें करते समय बड़े बड़े -बड़े दावे करती हैं परंतु जब शराब की बात आती है तो सब चुप्पी साध लेती हैं। शराब और आर्थिकता एक -दूसरे के साथ इस तरह जुड़ गए हैं कि राज करने वाली पार्टियों को लगता है कि शराब की बिक्री बंद हुई तो आर्थिकता जीरो ही हो जायेगी। डिस्टलरियों की चमक -दमक बढ़ रही है शराब के व्यापारियों के पास कितनी माया है इसका कोई अनुमान ही नहीं। शराब के व्यापारियों असीमित पैसा होने के कारण उनके परिवारों में क्लेष का कारण बन रही हैं ।

    ये व्यापारी राजनीति में भी हाथ आजमा रहे हैं और कई व्यापारी विधान सभा व संसद की सीढ़ियां तक चढ़ चुके हैं। पंजाब में एक व्यापारी को बिना मांगे विधान सभा चुनाव में टिकट दी गई हालांकि वह चुनाव लड़ने से इन्कार करता रहा। सरकारों की नीति कमाल की है कि बाद में पंजाब सरकार ने उसी शराब के व्यापारी से नशा विरोधी मुहिम का उद्घाटन भी करवाया। हमारे देश के शराब व्यापारी दुनिया के अमीरों में गिने जाने लगे हैं। अमीरी आए भी कैसे न, शराब के ठेकों की संख्या सरकारी स्कूलों, कॉलेजों व अस्पतालों से कई गुणा अधिक है।

    साथ ही शराब को नेता कैसे भुला दें? पंचायती चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक शराब ही काम निकालती है। स्वास्थ्य के लिए हजारों करोड़ों का बजट रखने वाली सरकार नशा छुड़ाओ केन्द्र चला रही है वहीं दूसरी तरफ शराब के ठेकों पर बढ़ रही भीड़ को नजर अंदाज कर दिया है। वैसे एक मौजूदा लोक सभा मैंबर ने शराब न पीने का ऐलान किया है। यदि शराब पीने वाला सांसद गलत है तो ठेके पर शराब खरीद रहे करोड़ों भारतीय कौनसे रास्ता जा रहे हैं? इसका दर्द भी किसी को होना ही चाहिए।

    सरकार की भाषा में शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है व सरकार ही अरबों रूपये कमा रही है। शराब पीने वाले सांसद की तो सभी पार्टियों की निंदा करते हैं परंतु ठेके पर 100 -200 रुपये कमाने वाले मजदूरों की किसी को चिंता नहीं। उत्तर प्रदेश /उत्तराखंड के दर्जनों लोग एक ही दिन शराब पीकर मर गए परंतु करोड़ों लोग जो धीमी गति के साथ मर रहे हैं, वह भी बर्बादी ही है अंतर समय व ढंग का है।

    Hindi News से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।