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    पारिस्थितिकी तंत्र और जीवन श्रृंखला की कहानी

    Dodo-Bird

    Editorial

    नरपत दान चरण, पर्यावरण विशेषज्ञ

    पर्यावरण (Environment) में हर जीव-जंतु, पेड़-पौधे का जीवन एक दूसरे पर आश्रित (Dependent) है। सभी से जुड़ी हुई एक जीवन श्रंखला है। लेकिन जब यह श्रंखला टूट जाती है, तो किस कदर जीवन संकट में पड़ जाता है। इसे एक कहानी से समझते हैं। यह डोडो पक्षी की कहानी है। मारीशस में पाया जाने वाला डोडो दुनिया के सबसे विशालकाय पक्षियों में से था। एक जमाने में इस द्वीप पर स्तनपायी जानवर नहीं थे।

    पक्षियों की कई प्रजातियां (Species) यहां रहती थीं। डोडो उनमें से एक था। डोडो पक्षी काल्वेरिया मेजर नामक पेड़ के फल, बीज और फलियां खाता था और खूब मोटा होता था। बीस किलो तक उसका वजन होता था। वह उड़ता नहीं था और जमीन पर ही घोसला बनाकर अंडे भी दे देता था। भारत और श्रीलंका (Sri Lanka) से मसाले का कारोबार करने के लिए निकला एक पुर्तगाली जहाज 1504 में पहली बार इस द्वीप में पहुंचा। ताजे मांस के लिए पुर्तगाली इनका शिकार करने लगे। मॉरीशस मसाले के कारोबार के रास्ते में पड़ता था।

    कुछ ही दिनों में जहाजियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया। इधर से गुजरने वाले जहाज यहां पर रुकने लगे। बड़े पैमाने पर डोडो का शिकार किया जाने लगा। एक तथ्य यह भी है कि,जब डच लोगों ने अपने कैदियों को निर्वासित करने के लिए इस द्वीप (Island) का इस्तेमाल (Use) शुरू कर दिया। इस तरह मनुष्य पहले पहल मॉरिशस पहुंचे, तो वे अपने साथ उन जानवरों को भी लाए जो पहले इस द्वीप पर नहीं पाए जाते थे, जैसे कुत्ते, सूअर, बिल्लियां, चूहे और  मकॉक बंदर। इन पशुओं ने डोडो के घोंसलों (Nests) को नष्ट कर दिया, जबकि मनुष्यो ने यहां के जंगलों का नाश किया जहां पक्षी रहते थे। इन तमाम कारणों से लगभग दो सालों में ही डोडो की समूची आबादी नष्ट हो गई।

    डोडो पूरी तरह विलुप्त हो गई। डोडो यह नाम पुर्तगाली भाषा के ‘दाऊदो’ से पड़ा है, जिसका अर्थ मूर्ख होता है। शायद शिकारियों के पास खुद चल कर आ जाने की उनकी आदत के कारण ही उन्हें पुर्तगालियों ने डोडो ( मूर्ख) नाम दिया था। हालांकि इस पक्षी के सही फोटोग्राफ उपलब्ध नहीं है। न ही कोई नमूना सुरक्षित बचा। लेकिन आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय ने पुरानी जानकारी के आधार पर कुछ चित्र बनाए हैं। अब जब डोडो का नामोनिशान मिट गया। पर अचानक कुछ ऐसा हुआ जिससे लोगों को डोडो की याद आ गई।

    कुछ सालों पहले वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि मॉरीशस पाया जाने वाला एक खास तरह का काल्वेरिया मेजर पेड़ अब नहीं उग रहा है। इन पेड़ों का पूरा जंगल था। कलांतर में उस प्रजाति के दरख्तों की संख्या केवल 13 ही रह गई है। सभी पेड़ों की उम्र 300 साल के लगभग हो चुकी थी। इन पेड़ों की आयु भी 300 साल के लगभग ही होती है। इसलिए जल्द ही वे 13 पेड़ भी मरने वाले थे। वर्ष 1600 के बाद से उस प्रजाति के नए पेड़ नहीं उगे हैं। उस समय हुए प्राकृतिक और जैविक परिवर्तनों पर गौर करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि यह वही समय था जब डोडो पक्षी भी विलुप्त होता गया था। होता दरअसल यह था कि डोडो इस पेड़ के फलों को खाता था। उसके बीजों को वह अपनी बीट के जरिए निकाल देता था। फलों के बीज पर एक खास तरह की परत चढ़ी रहती थी।

    डोडो का पाचन तंत्र इस परत को पचा लेता था। इसके चलते उसकी बीट से निकलने वाले बीजों में से पौधे के अंकुर निकल आते थे। लेकिन, डोडो के समाप्त होने के बाद बीज के ऊपर चढ़ी इस परत को हटाने वाला कोई तंत्र नहीं रहा। इसके चलते उसमें से अंकुर नहीं निकल पाते थे और धीरे-धीरे नए पौधे ही उगना बंद हो गए। इसके चलते उन पेड़ों के भी समाप्त होने का पूरा खतरा पैदा हो गया। उसी समय इन पेड़ों को बचाने की मुहिम नए सिरे से शुरू हुई। कुछ विशेषज्ञों ने डोडो वाली भूमिका के लिए टर्की मुर्गे का चुनाव किया। इस मुर्गे को इस पेड़ के फलों को खिलाया गया। इसके बाद बीट में निकले बीजों को रोपा गया तो उनमें अंकुर निकलने लगे।

    इस तरह से पेड़ों की आबादी को बचाने में विशेषज्ञों को काफी हद तक कामयाबी मिली है। इस पेड़ को अब डोडो ट्री भी कहा जाता है। बहरहाल, इससे यह पता चलता है कि प्रकृति (Nature) में कुछ भी अकेले नहीं है। सभी का जीवन संबंध दूसरे से जुड़ा हुआ है। एक के समाप्त होते ही, दूसरे के अस्तित्व पर भी संकट छा जाता है। हमें अपने जीवन को बचाने के लिए सभी जीव जंतुओं का संरक्षण करना ही होगा।

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