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     बिहार और उत्तराखंड में लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रश्न चिह्न?

    Question mark on democratic rights in Bihar and Uttarakhand

    दो राज्यों ने नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न लगा दिया है। लगता है बिहार और उत्तराखंड मे नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार खतरे में आ गए हैं। इन दो राज्यों में पुलिस प्राधिकारियों ने ऐसे आदेश जारी किए हैं जिनको लेकर नागरिक अधिकार संगठनों को खड़ा होना चाहिए। जद यू-भाजपा शासित बिहार ने पुलिस द्वारा नागरिकों को चेतावनी दी है कि कानून और व्यवस्था की घटनाओं के दौरान जो व्यक्ति आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त पाया गया और बाद में उनका नाम आरोप पत्र में भी पाया गया तो उन्हें पासपोर्ट, सरकारी नौकरी, राज्य से वित्तीय अनुदान या बैंक लोन लेने में कठिनाई होगी। नागरिकों को चेतावनी दी गयी है कि ऐसे कार्यों में संलिप्त लोगों को गंभीर परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि पुलिस सत्यापान के दौरान ये बातें दर्ज की जाएंगी।

    भाजपा शासित उत्तराखंड में पुलिस ने एक कदम और बढ़ाकर लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर की गयी टिप्पणियों पर निगरानी करने का निर्णय किया है। ऐसी टिप्पणियों को राष्ट्र विरोधी या समाज विरोधी घोषित किया जा सकता है और उनका रिकार्ड रखा जाएगा। इस संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्टों की संख्या बढ़ती जा रही है और नागरिकों को चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। इस संबंध में इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार लोकतांत्रिक समाजों में एक नियम है न कि एक अपवाद।

    राज्य की शक्ति बनाम किसान

    ऐसा माना जाता है कि राज्य की शक्ति का मुकाबला करना कठिन होता है किंतु विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है। क्या आंदोलनरत किसान इसे गलत साबित करेंगे? आंदोलनरत किसानों और शासन के बीच फिलहाल जो टकराव चल रहा है उसने गलत मोड़ ले लिया है। दिल्ली के गाजीपुर बार्डर पर पुलिस द्वारा कंटीली तारबाड़ लगाने से शिरोमणि अकाली दल, राकांपा, द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस, आरएसपी और आईयूएमएल सहित दस विपक्षी दलों के 15 सांसद हैरान हैं।

    इन सांसदों के दल को गाजीपुर बॉर्डर पहुंचने नहीं दिया गया और उन्हें पुलिस द्वारा रोक दिया गया। ये सांसद यह देखकर हैरान थे कि गाजीपुर बॉर्डर पर बड़े-बड़े कंक्रीट के बैरियर, तारबाड़ और नुकीली सरिया लगायी गयी हैं। उनका कहना है कि अन्नदाताओं को दुश्मनों की तरह माना जा रहा है और उन्हें पेयजल, शौचालय, स्वच्छता, बिजली, इंटरनेट सेवा जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। ऐसी स्थिति सिंघु और टीकरी के बॉर्डरों पर भी देखने को मिल रही है।

    इन किसानों की बातों को इन सांसदों ने संसद में भी उठाया और सरकार से मांग की कि वे इस मुद्दे को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं और तीनों कृषि कानूनों को वापिस लें। तथापि सरकार को आंदोलनरत किसानों को मनाने का प्रयास करना चाहिए। अब इस आंदोलन ने राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश में भी जड़े जमा ली हैं और यह इन राज्यों के विभिन्न भागों में फैल रहा है। राज्य शक्ति के दमन से किसानों के हौसले और बढ़ रहे हैं।

    क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय पार्टी

    असम में सत्तारूढ़ भाजपा और उसके सहयोगी दलों को चिंतित होना चाहिए तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को आशा की किरण दिखायी दे रही है। आगामी विधान सभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन की अगुवाई कर रही दो क्षेत्रीय पार्टियों असम जातीय परिषद्, जिसका नेतत्व आसू के पूर्व नेता कर रहे हैं, और रायजोर दल, जिसका गठन अखिल गोगोई के समर्थकों द्वारा किया गया है, इन दोनों दलों ने गुरूवार को निर्णय किया है कि वे मिलकर चुनाव लड़ेगे हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वे कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन में शामिल नहीं होंगे।

    किंतु कांग्रेस को इससे निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि इन दोनों दलों के गठबंधन से भाजपानीत गठबंधन के वोट कटेंगे और इसका लाभ कांग्रेस नीत महागठबंधन को मिलेगा। असम जातीय परिषद् और रायजोर दल ने दावा किया है कि यह चुनाव दो मोर्चों पर लड़ा जाएगा। क्षेत्रीय दल बनाम राष्ट्रीय दल। जबकि पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह चुनाव त्रिकोणीय होगा जिसमें एक ओर भाजपा और उसके सहयोगी दल जैसे एजीपी और यूपीपीएल तथा कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन जो असम गण परिषद् के मतों में सेंध लगा सकता है। एआईयूडीएफ के महागठबंधन में शामिल होने से भाजपा विरोधी मतों का विभाजन नहीं होगा। देखना यह है कि क्या भाजपानीत गठबंधन सत्ता में वापसी कर पाएगा?

    केरल में चुनावों की तैयारी

    केरल में भी चुनावी बुखार चढ़ने लगा है। इसके लिए विभिन्न राजनीतिक दल युद्धस्तर पर तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस के वोट बैंक को प्रभावित करने के लिए माकपानीत केरल सरकार ने बुधवार को नागर ईसाई समुदाय को अन्य पिछड़े वर्गों की श्रेणी में आरक्षण देने का निर्णय किया है। इसकी सिफारिश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने की थी। इस नए आरक्षण से हिन्दू नागर और एसआईयूसी इसाई नागर प्रभावित नहीं होंगे क्योंकि उन्हें पहले से सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों की श्रेणी में आरक्षण दिया जा चुका है किंतु इससे कांग्रेस समर्थक तिरूवनन्तपुरम जिला प्रभावित हो सकता है।

    राजग के एक घटक दल भारत दल जन सेना में विभाजन हुआ है और इसके एक धड़े ने भारतीय जन सेना का गठन किया है और उसने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फंट के साथ काम करने का निर्णय किया है। इस धड़े ने आरोप लगाया है कि भाजपा सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ मिलकर काम कर रहा है जिसने सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देकर हिन्दू भावनाओं को आहत किया है। आईयूएमएल नेता कुन्हालीकुट्टी ने लोक सभा से त्यागपत्र दे दिया है और वे राज्य में अपनी पार्टी के साथ अभियान की अगुवाई करेंगे तथा यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के राज्यव्यापी ऐश्वर्य यात्रा में शामिल होंगे। अभी चुनावी तैयारियों में कई कदम उठाए जाएंगे। देखना यह है कि अप्रैल-मई में होने वाले इस चुनावी समर में किसको लाभ मिलता है।

    कर्नाटक में संख्या खेल

    कर्नाटक में फिर से संख्या खेल खेला जा रहा है। गुरूवार को विधान परिषद् अध्यक्ष केपी शेट्टी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने यह कदम भाजपा और जद एस के बीच सभापति पद के लिए संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने के निर्णय के बाद लिया है। भाजपा ने कांग्रेस विधान परिषद् सदस्य के विरुद्ध जनता दल एस के समर्थन से अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है। जनता दल एस ने भाजपा को मुद्दों पर आधारित समर्थन दिया है। जद एस के रूख में दोगलापन है। एक ओर वह किसानों के मुद्दे पर भाजपा का विरोध करती है तो दूसरी ओर इस मामले में वह भाजपा का साथ देती है। दोनों पार्टियों के बीच इस संबंध में कुछ लेन-देन हुआ है। विधान परिषद सदस्य बासवराज चुनावों के बाद सभापति बनेंगे।

    जद एस ने यह सुनिश्चित किया है कि भाजपा उसके सदस्य को उपसभापति निर्वाचित करने में मदद करेगी। जद एस ने इस बात की परवाह नहीं कि 2018 में जब उपसभापित का चुनाव किया गया तो शेट्टी जद एस और कांग्रेस के उम्मीदवार थे। अब सभापति-उपसभापति से कांग्रेस सदस्यों के बाहर हो जाने से भाजपा महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवा सकेगी। यह गठबंधन कब तक चलेगा इस बारे में केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं क्योंकि कर्नाटक संख्या खेल खेलने के लिए कुख्यात है।

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