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    1947 के विभाजन का दर्द-बुजुर्गों की जुबानी: बंटवारे के समय बहुत से यादों को वहीं छोड़ आए विस्थापित हुए लोग

    partition of 1947 sachkahoon

    तब कपास की खेती व गेहूं पिसवाने को मशहूर था मंगूतारू क्षेत्र

    सच कहूँ/संजय मेहरा, गुरुग्राम। भारत-पाकिस्तान बंटवाने के समय हुई दंगों से इतर बात करें वहां के रहन-सहन की। वहां लोगों में बहुत कम ही मतभेद होते थे। हालांकि समाज में हर तरह के लोग थे। लोग ठगी भी करते थे। लेकिन प्रेमभाव भी बहुत था। बंटवारे के समय विस्थापित होकर गुरुग्राम में आकर स्थापित हुए पीएन मोंगिया ने उस समय के खट्ठे-मीठे अनुभव सांझा किये।

    पीएन मोंगिया के पिता मास्टर प्रेमदत्त मूलरूप से दाजल गांव, तहसील जामपुर जिला डेरा गाजी खान के निवासी थी। उनके पिता मास्टर प्रेमदत्त ने लाहौर ननकाना साहिब, शेखूपरा आदि स्थानों पर स्कूलों में नौकरी की थी। विभाजन के समय वह मंगूतारू तहसील ननकाना साहिब जिला लाहौर में एक सरकारी स्कूल में हेड मास्टर थे। मंगूतारू दो चीजों के लिए मशहूर था। पहला तो गेहूं पिसाई की मशीन के लिए और दूसरा कपास की खेती के लिए।

    एक ही बाड़े में डलती थी सबकी लकड़ियां

    पीएन मोंगिया के मुताबिक करीब 25 मील के क्षेत्र में एक मात्र मंगूतारू के सेठ इंद्र की ही गेहूं पिसाई की मशीन थी। सेठ इंद्र इस बात के लिए भी मशहूर थे कि वे कम तोलते थे। वहीं मंगूतारू में कपास की खेती भी बहुत होती थी। मोंगिया के मुताबिक सरकारी स्कूल के सामने सड़क के पास एक बहुत बड़ा बाड़ा था। जिसमें कपास की लकड़ियां भरी होती थी। कस्बे के किसी भी वर्ग का कोई घर वहां से लकड़ियां (बालन) ले सकता था। सभी किसान उसी बाड़े में कपास का बालन डालते थे। पीएन मोंगिया बताते हैं कि विभाजन के समय मंगूतारू से निकलना पड़ा था। रमजान जुलाहे ने उन्हें बैलगाड़ी दी। काफिले में कई और भी बैलगाड़ियां थी। उन्होंने लाहौर पहुंचने में पांच रातें लगी।

    दाजल क्षेत्र में कई चीजें थी मशहूर

    उन्होंने यह भी बताया कि दाजल गांव में वहां अंग्रेजों से भी गौरे चाचा विसंदाराम के खीर पेड़े बहुत मशहूर थे। दूर-दूर से लोग खाने के लिए वहां आते थे। हुकमी की दाल भी बहुत मशहूर थी। जब घर में कोई सब्जी नहीं बनती थी तो वहां से सब्जी लेकर आते थे। वहां पर तोलाराम मोंगिया सूद पर पैसे देते थे। लोग सूद पर मिले पैसों को भी अनुकम्पा मानते थे। पीने के पानी की वहां किल्लत थी। बड़ी दूर से एक तालाब से पानी लेकर आना पड़ता था। एक ही जगह से इंसान और पशु-पक्षी पानी पीते थे। पीएन मोंगिया के मुताबिक रिझू दी हवेली का भी वहां बड़ा नाम था। सबसे बड़ा मकान और उसका ऊंचा गेट था। रिझू राम आहुजा घोड़े पर सवार होकर निकलते थे। क्षेत्र में दो महान हस्तियां महाशय चांदन राम और जैलदार मुखी नारायण दास थे।

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