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    लंगर खिलाकर सतगुरू जी ने रोग किया खत्म

    Shah Satnam Singh Ji

    सन् 1981 की बात है कि मेरी भाभी सुखविन्द्र कौर बहुत ज्यादा बीमार हो गई। उसे कुछ भी नहीं पचता था। यहां तक कि 23 दिन बीत जाने पर भी उसने कुछ नहीं खाया। उसकी हालत को देखकर सभी कह रहे थे कि अब यह नहीं बचेगी। उन दिनों पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज डेरा सच्चा सौदा, मलोट (पंजाब) में पधारे हुए थे। सारे परिवार ने विचार किया कि इसकी तंदरूस्ती के लिए पूजनीय परम पिता जी के पावन चरण कमलों में अर्ज की जाए।

    सारा परिवार इसे मलोट ले जाने के लिए तैयार हो गया। हम इसे एक कार में डेरा सच्चा सौदा आश्रम, मलोट (पंजाब) में ले गए। पूजनीय परम पिता जी शाम की मजलिस फरमाकर तेरावास में जा रहे थे। मैंने उसी समय पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के पावन चरण कमलों में अर्ज की कि पिता जी, इस समय हमारा पूरा परिवार चिंताग्रस्त है। मेरी भाभी के सात लड़कियां हैं। इसे अन्न पानी भी नहीं पच रहा।

    दया करो जी। पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘रामजीत सिंह, इसे लंगर खिलाओ।’’ हमनें उसी समय हुक्म मानकर उसे खाने के लिए लंगर दिया। उसने उस समय एक लंगर खा लिया और उसे लंगर हजम हो गया। हम रात के बारह बजे तक बैठे रहे तथा पूजनीय परम पिता जी का गुणगान करते रहे। वह सुबह खाने के लिए और लंगर मांगने लगी। हमनें उसे दो लंगर दिए और वह खा गई। हम सभी हैरान और खुश थे। जहां उसे पानी तक नहीं पच रहा था, अब वह दो-दो लंगर खाने लग गई। पूजनीय परम पिता जी की दया मेहर रहमत से वह स्वस्थ हो गई। जब हम पूजनीय परम पिता जी से आज्ञा लेकर वापिस मानसा लौटे तो सभी रिश्तेदार उसे देखकर दंग रह गए। सतगुरू के अहसानों का बदला कभी भी चुकाया नहीं जा सकता।
    श्री रामजीत सिंह, मानसा (पंजाब)

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