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    जीएसटी की लाभदायी शुरुआत

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    जीएसटी बिल संसद में पास किए जाते वक्त विपक्षी दलों ने बहुत हायतौबा मचाई थी। लेकिन जैसे-जैसे कानून विशेषज्ञों, करदाताओं, अर्थशास्त्रियों को जीएसटी बिल की विशेषताओं का पता चलता गया, उसी अंदाज में जीएसटी का विरोध शांत होता गया। अब सभी राज्य एक जुलाई से इस नए कानून को लागू करने के लिए सहमत हो गए हैं। दिए गए भरोसे के अनुसार सरकार आवश्यक वस्तुओं पर से टैक्स घटा रही है, जिससे मंहगाई कम होने के भी अनुमान लग रहे हैं, बशर्ते उत्पादक कम्पनियां वस्तुओं के रेट बढ़ाने का लालच नहीं करे। सरकार की ओर से ट्रेक्टर के पार्ट्स सहित आवश्यक श्रेणी की 66 वस्तुओं पर 10 फीसदी तक टैक्स कटौती की है।

    स्कूली बैग, इंसुलिन, किताबों सहित बहुत सी वस्तुओं पर 10 फीसदी टैक्स कटौती की गई है। सरकार के इस निर्णय से किसानों व आम उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। हालांकि विद्यार्थियों को स्कूल बैग पर सात फीसदी कर छूट दी गई है, परंतु अच्छा होता यदि ये कर और कम कर दिए जाते। फिर भी यह भ्रम खत्म हो रहा है कि जीएसटी आर्थिक तूफान लाने वाला है। सरकार के कर ढांचे में बदलाव करने के उद्देश्य के पीछे समाजवादी विचारधारा नजर आ रही है, तभी विलासिता की वस्तुओं पर कर दर ज्यादा रखी गई है। जीएसटी पर पिछले एक दशक से पेश हो रहे आम बजट का काफी प्रभाव पड़ा है। इस कारण सरकार ने आमजन पर ज्यादा कर बोझ लादना ठीक नहीं समझा।

    सोने पर टैक्स बढ़ाया गया है। अर्थविशेषज्ञों के नजरिये से सोने का दिखावा इससे घटेगा। नतीजा, लोग सोने पर ज्यादा खर्च नहीं करेंगे। स्पष्ट है कि सोना खरीद करने में देश को जो विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है, उसमें बचत होगी। केन्द्रीय व राज्य स्तर पर एक समान कर प्रणाली से जहां देश की कर से आय बढ़ेगी, वहीं कर चोरी के रास्ते बंद होंगे। कर संग्रहण में फैला भ्रष्टाचार भी खत्म होगा। लोगों में बढ़ रही आर्थिक खाई रूकेगी। अभी देश में जीएसटी को लेकर सारे शक व विरोध मृतप्राय: हो गए हैं।

    जीएसटी बिल आज दुनिया के करीब 130 देशों में लागू हो चुका है। इतने बड़े स्तर पर इसकी स्वीकार्यता दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था को गति देने, आमजन में आर्थिक विषमता कम करने के लिए अभी इससे ज्यादा प्रभाव कर नीति नहीं है। भारत में जीएसटी को लाने, पास करने व लागू करने में देश के करीब 20 वर्ष बर्बाद हो गए, जोकि बेहद कष्टप्रद हैं। अभी राजग सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है, जिसने वोट नीति से ऊपर उठकर सबका विरोध होने के बाद भी जीएसटी को देश हित में लागू करवा लिया।

    आमजन को पूंजीवादी साम्राज्यवाद के शोषण से मुक्ति मिले, पूंजी का केन्द्रीकरण नहीं हो, आमजन को उसके जीवन-यापन की तमाम वस्तुएं, सेवाएं, सुविधाएं उसकी आमदनी में ही हासिल हों और कुछ वह भविष्य की चिंताओं के निवारण के लिए भी बचाकर रख सके, यही आर्थिक न्याय का सिद्धांत है, जोकि हर नागरिक का अधिकार भी है। उम्मीद है जीएसटी आर्थिक न्याय के सिद्धांतों पर भी खरा उतरेगा।

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