कोमल सांखला
अवनी एक प्यारी-सी छह साल की बच्ची थी। उसके पापा ट्रक ड्राइवर थे। हर रोज सुबह-सुबह वे शहर से गांवों तक सामान ले जाते थे। अवनी को पापा की गाड़ी से बहुत प्यार था। कभी-कभी छुट्टी के दिन वह पापा के साथ बैठती और लंबी यात्रा पर निकल पड़ती। खासकर नाना-नानी के घर जाने पर तो अवनी हमेशा साथ होती। रास्ते में हरी-भरी फसलें, बहते नाले और दूर पहाड़ियां देखकर उसकी आंखें चमक उठतीं। एक दिन नाना के घर जाते समय अवनी ने अपनी पसंदीदा चूड़ियां निकालीं। वे रंग-बिरंगी थीं- लाल, हरी, पीली। चमकदार काँच की बनी हुई, जो धूप में जगमगा उठती थीं।
‘पापा, इन्हें स्टेयरिंग पर टांग दो न!’ अवनी ने कहा।
पापा मुस्कुराए, ‘अच्छा, लेकिन सावधानी से।’
अवनी ने चूड़ियों को स्टेयरिंग के ऊपर एक डोर से बांध दिया। गाड़ी स्टार्ट हुई तो चूड़ियां हिलने लगीं- खन-खन, टन-टन! उनकी मधुर आवाज पूरे केबिन में गूंजने लगी।
‘वाह! कितनी अच्छी आवाज आ रही है!’ अवनी ने ताली बजाई।
गाड़ी जैसे जादू की तरह चल पड़ी। रास्ते में हर मोड़ पर चूड़ियां झूलतीं, नाचतीं- कभी तेज खनक, कभी धीमी। अवनी को लगा जैसे चूड़ियां गा रही हों।
‘पापा, ये तो मेरी दोस्त हैं! ये गाड़ी को और तेज चला रही हैं,’ वह हंसते हुए बोली।
पापा ने कहा, ‘हां बेटी, तेरी खुशी ही तो हमारी ताकत है।’
रास्ता लंबा था। बीच में एक बड़ा जंगल आया। अचानक गाड़ी से आवाज आना बंद हो गई। पापा ने देखा कि इंजन में कुछ खराबी आ गई है। गाड़ी रुक गई। आसपास घना जंगल था, कोई इंसान नजर नहीं आ रहा था। पापा परेशान हो गए, ‘अब क्या करें? अवनी के नाना का घर अभी दूर है।’ अवनी थोड़ी डर गई, लेकिन उसने चूड़ियों की ओर देखा। वे अभी भी हल्के-हल्के हिल रही थीं- खन-खन! अवनी ने सोचा, ‘मेरी चूड़ियां तो हमेशा खुश रहती हैं, मैं भी खुश रहूंगी।’
उसने गाना गाना शुरू किया-
‘खनकती चूड़ियां, नाचो-नाचो!
गाड़ी को ले चलो, नाना के पास!’
उसकी मासूम आवाज के साथ चूड़ियां जैसे और जोर से खनकने लगीं। तभी दूर से एक चाचा जी की मोटरसाइकिल की आवाज आई। वे पास आकर रुके।
‘क्या हुआ, भाई?’ उन्होंने पूछा।
पापा ने सारी बात बताई। चाचा जी ने टूल बॉक्स निकाला और गाड़ी ठीक कर दी। वे हंसते हुए बोले, ‘लगता है बेटी की चूड़ियों की आवाज ने हमें बुला लिया!’ गाड़ी फिर चल पड़ी। चूड़ियां अब और तेज खनक रही थीं। नाना-नानी के घर पहुंचते ही सबने अवनी की कहानी सुनी। नानी ने मुस्कुराकर कहा, ‘बेटी, खुशी की आवाज कभी व्यर्थ नहीं जाती। वह मुश्किलों को दूर भगा देती है।’ अवनी ने चूड़ियां सबको दिखाईं। उस दिन से वह हर यात्रा में चूड़ियां साथ ले जाती। वे सिर्फ सजावट नहीं थीं, बल्कि खुशी की घंटी थीं। और अवनी समझ गई- सच्ची खुशी छोटी-छोटी चीजों में बसती है, बस उसे पहचानना आना चाहिए।















