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    दलाईलामा का जिन्ना प्रेम क्यों?

    Dalai Lama, Jinnah

    पुणे में तिब्बती बौद्ध गुरू दलाईलामा ने एक कार्यक्रम में कहा कि अगर जिन्ना भारत के प्रधानमंत्री बनते तब पाकिस्तान नहीं बनता। दलाईलामा अंतर्राष्टÑीय स्तर के नेता व विचारक हैं। उनकी बात को काफी गौर से सुना जाता है। परन्तु यहां एक प्रश्न चूक गया जो उस कार्यक्रम में दलाईलामा से पूछा जाना चाहिए था कि क्यों उन्होंने शरण के लिए नेहरू का भारत चुना? लामा जिन्ना के पाकिस्तान में शरण लेने क्यों नहीं गए? भारत का विभाजन कोई ऐसी घटना नहीं है, जिसे दो या तीन लोग मिलकर टाल सकते।

    यदि नेहरू या जिन्ना ही भारत का विभाजन टाल सकते तब वह इसे पुन: जोड़ भी लेते। चूंकि जिन्ना ने अपने पहले ही दिन पाकिस्तान पहुंचकर देख लिया था कि जिस मुल्क के वह कायदे आजम बन रहे हैं, जिन लोगों के लिए उन्होंने पाकिस्तान बनाया उन लोगों ने भारत से पाकिस्तान पहली बार जिन्ना के पहुंचने पर एक गाड़ी तक उन्हें मुहैया नहीं करवाई, जबकि वह घोर टीबी से पीड़ित थे।

    यहां दलाईलामा ने महात्मा गांधी का हवाला दिया था कि वह जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन नेहरू इस पर सहमत नहीं हुए, अगर महात्मा गांधी अधिक प्रभाव रख रहे थे तब वह जिन्ना एवं नेहरू को छोड़ किसी का भी नाम चुन देते ताकि देश एक रहता, जबकि ऐसा नहीं है। देश में नेता एक व्यक्ति द्वारा या रातोंरात नहीं बनते, पब्लिक उन्हें समर्थन देती है वही पब्लिक जो महात्मा गांधी के जिन्ना को प्रधानमंत्री नहीं बनने देती।

    यहां सबसे कौतुहल का विषय यह है कि जिस दलाईलामा को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक राष्टÑ प्रमुख का सम्मान दिया। उसकी पूरी सरकार को रहने की छत ही मुहैया नहीं करवाई उसका दुनिया में हर कदम पर साथ दिया और 1962 में चीन ने जिसका बदला नेहरू के भारत से चुकता किया वह लामा भारत की जमीन पर जिन्ना को भारत एकता का श्रेय दे रहा है यह हो क्या रहा है? भारत में नेता तो आज भी रूठ जाते हैं। क्या वह देश बांट लेते हैं? देश को चलाने के लिए अलग पार्टी तो नेता बना लेते हैं।

    अलग राज्य भी बना लेते हैं लेकिन देश बांटने की बात तो कोई नहीं करता। रेडक्लिफ या माउंटबेटन ने इस देश को नहीं बांटा। उन्होंने तो महज एक लकीर खींची है कि ईधर पाकिस्तान वाले रह लो बाकी का भारत है ही। जिन्ना प्रधानमंत्री पद के काबिल होते तो भारत का पूरा मुस्लिम समुदाय तब पाकिस्तान चला गया होता, लेकिन उन्होंने नेहरू की सरकार को ठीक समझा व भारत में ही रहे।

    जवाहर लाल नेहरू का भारत आज जिन्ना के पाकिस्तान से बहुत आगे है। दलाई लामा को अगर लगता है कि जिन्ना भारत को एक रख सकते थे तब अब किसने रोका है, जिन्ना के पिछलग्गूआें को, एक बार कह दें, हम भारत के हैं भारत हमारा है, फूंक दे उस किताब को, जिसे वह कायदे आजम का पाकिस्तान कहते हैं।

     

     

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