Ayurveda Tips in Falgun Month: नई दिल्ली। ऋतु परिवर्तन के साथ केवल तापमान ही नहीं बदलता, बल्कि शरीर की आंतरिक प्रवृत्तियों में भी परिवर्तन होता है। 2 फरवरी से आरंभ हुआ फाल्गुन मास उल्लास, उत्सव और प्रकृति के नवोन्मेष का प्रतीक माना जाता है। चारों ओर पीली सरसों की लहराती फसल और मध्यम तापमान वातावरण को सुखद बनाते हैं, किंतु यही समय स्वास्थ्य की दृष्टि से सावधानी का भी है। Ayurveda Health Tips
दिन में हल्की गर्मी और रात्रि में शीतलता रहने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है। सर्दी, जुकाम और मौसमी संक्रमण इस अवधि में तीव्र गति से फैलते हैं। आयुर्वेद के अनुसार इस काल में पित्त का प्रभाव बढ़ता है तथा कफ का क्षय होने लगता है, जिससे पाचन शक्ति अपेक्षाकृत मंद पड़ सकती है। अतः आहार में संतुलन अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
फाल्गुन मास में किन पदार्थों से परहेज करें? | Ayurveda Health Tips
चना का सीमित या त्यागयुक्त सेवन – परंपरानुसार होली के समय भुने हुए चने और गेहूं की बालियों का सेवन किया जाता है, किंतु आयुर्वेद में चने को गुरु (भारी) माना गया है। इस ऋतु में पाचन अग्नि मंद होने से चना गैस, कब्ज या अपच उत्पन्न कर सकता है।
बासी एवं तामसिक भोजन – आध्यात्मिक दृष्टि से भी फाल्गुन मास महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस अवधि में Maha Shivaratri का पर्व आता है। अतः ताजे, सात्विक और सुपाच्य भोजन को वरीयता देना हितकारी माना गया है। अत्यधिक तले-भुने एवं मसालेदार पदार्थों से बचना चाहिए, क्योंकि वे पित्त वृद्धि को और बढ़ा सकते हैं।
फाल्गुन में क्या खाएं? Ayurveda Health Tips
- बेर – यह फल शरीर को शीतलता प्रदान करता है और पाचन में सहायक है।
- अंगूर – अंगूर रक्त शुद्धि और ऊर्जा वृद्धि में उपयोगी माने जाते हैं।
- हल्के, सुपाच्य एवं मौसमी फल-सब्जियां।
- प्रातःकाल शीघ्र उठकर व्यायाम तथा सूर्यप्रकाश का सेवन शरीर को सुदृढ़ बनाता है।
- ऋतु के अनुरूप आहार अपनाने से बिना औषधि के भी स्वास्थ्य संतुलित रखा जा सकता है। जीवनशैली में साधारण परिवर्तन—जैसे समय पर भोजन, पर्याप्त जल सेवन और नियमित व्यायाम—शरीर को आंतरिक शक्ति प्रदान करते हैं।















