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    संकट के मुहाने पर मध्य-पूर्व

    सीरिया में शांति बहाली के निमित रुस के शहर मास्को में रुस-तुर्की-ईरान के बीच होने वाली त्रिपक्षीय बैठक से ठीक पहले तुर्की की राजधानी अंकारा में रुसी राजदूत आंदे्र कार्लोव की हत्या न केवल रुस-तुर्की टकराव को बढ़ाने वाला है, बल्कि इसने मध्य-पूर्व क्षेत्र को संकट के मुहाने पर ला दिया है। रुसी राजदूत का हत्यारा तुर्की स्पेशल फोर्स का जवान मेवलुत एडिन्टास उस तबके का हिस्सा है जो रुस की सीरिया में हो रही कार्रवाई से नाराज है। देखा भी गया कि उसने राजदूत पर गोलियां बरसाते वक्त ‘अले΄पो को मत भूलो’ और ‘अल्लाह हो अकबर’ जैसा धार्मिक नारा लगाया। यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि रुसी राजदूत की हत्या की क्या वजहें थी। पर कूटनीतिक तौर पर इस हत्या को मध्य-पूर्व में रुस को कमजोर करने की साजिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। किसी से छिपा नहीं है कि मध्य-पूर्व में रुस की मजबूत पकड़ में राजदूत आंद्रे कार्लाेव की अहम भूमिका रही है। ऐसा माना जा रहा है कि अब रुस की ओर से सैनिक कार्रवाई तेज होगी और इससे अमेरिका और उसके समर्थक देश भड़क सकते हैं।
    यहां ध्यान देना होगा कि सीरिया संकट के लिए केवल आतंकी गुट ही नहीं बल्कि वैश्विक शक्तियां भी जिम्मेदार हैं। यह तथ्य है कि अमेरिका ने सीरियाई प्रेसिडेंट बशर-अल-असद को सत्ता से हटाने के लिए ही इस्लामिक स्टेट को खड़ा किया और उसे हथियार-बारुद मुहैया कराया। सच यह भी है कि तुर्की इस्लामिक स्टेट से सीरिया और इराक से चुराए गए तेल को खरीदकर उसके बदले में उसे लाखों डॉलर की मदद कर रहा है। हालांकि तुर्की आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट से तेल खरीदने के रुस के आरोप को खारिज कर चुका है, लेकिन किसी से छिपा नहीं है कि वह अब भी सीरियाई विद्रोहियों के साथ है।
    दुर्भाग्यपूर्ण यह कि इस गोलबंदी का सर्वाधिक फायदा इस्लामिक स्टेट को मिला और वह सीरिया और इराक को लहूलुहान करने में कामयाब हुआ। लेकिन सच यह भी है कि रुस ने इस्लामिक स्टेट की कमर तोड़ दी है और उसका साम्राज्य अब अले΄पो तक सिमटकर रह गया है। रुस द्वारा अले΄पो को निशाना बनाया जाना जारी है। गौर करें तो यह रुस की मजबूरी भी है। यहां समझना होगा कि सीरिया रुस का पश्चिम एशिया में एकमात्र सहयोगी देश है और वह सीरिया सरकार को अरबों डॉलर का हथियार बेचता है। रुस अपने हितों की सुरक्षा के लिए ही इस्लामिक स्टेट को कुचल रहा है। गत वर्ष जिस तरह वह अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के विरोध के बावजूद भी क्रीमिया में सफल हस्तक्षेप करने में कामयाब रहा उससे उसका हौसला बढ़ा है। अब उसकी कोशिश सीरिया के मसले पर बढ़त बनाकर अमेरिका के एकाधिकार को चुनौती देना और वैश्विक मंच पर अपना दबदबा कायम करना है। अमेरिका रुस की मंशा को भलीभांति समझ रहा है।
    यही वजह है कि वह सीरिया के मसले पर तुर्की के साथ खड़ा होकर मध्य-पूर्व में रुस की ताकत को रोकने में लगा है। याद होगा पिछले वर्ष रुस द्वारा तुर्की के एयरस्पेस के वॉयलेशन से अमेरिका भड़क गया था और चेतावनी भी दी थी। लेकिन चूंकि रुस के साथ सीरिया, ईरान और इराक जैसे देश खुलकर खड़े नजर आए जिससे वह रुस के विरुद्घ कार्रवाई से पीछे हट गया। फिलहाल रुस, तुर्की और ईरान, सीरिया संकट से उबरने के लिए हर प्रयास कर रहे हैं लेकिन इसमें सफलता मिलेगी कहना मुश्किल है। सीरिया संकट के समाधान का प्रयास पहले भी हो चुका है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।
    उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ और अरब लीग द्वारा नियुक्त शांतिदूत कोफी अन्नान के प्रयासों से 12 अप्रैल, 2012 को सीरिया में संघर्ष विराम लागू हुआ। मोटे तौर पर छ: बिंदुओं पर सहमति बनी। मसलन हिंसा के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करना, उन स्थानों की सूची जारी करना जहां लोग बंदी बनाए गए हैं, बगैर भेदभाव वाली वीजा नीति सुनिश्चित करना, जनसंख्या वाले क्षेत्रों में हथियारों की आवाजाही पर रोक तथा पत्रकारों की स्वतंत्रता की बहाली इत्यादि प्रमुख था। लेकिन जून, 2012 में यह समझौता असफल हो गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति दूत लएदर ब्राहीमी भी सीरिया के समाधान का हल नहीं ढूंढ सके।
    संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सीरिया में हिंसा को रोकने और राजनैतिक परिवर्तन करने वाले प्रस्ताव को भारी बहुमत से अगस्त 2012 में स्वीकार किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद पद छोड़ दें तथा संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की तरफ से राजनयिक संबंधों को बनाए रखा जाए। इस प्रस्ताव में यह भी मांग की गयी कि सीरिया अपने रासायनिक तथा जैविक हथियारों को नष्ट करे। लेकिन इस प्रस्ताव का कोई ठोस फलीतार्थ देखने को नहीं मिला।
    आज स्थिति यह है कि सीरिया के मसले पर संपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पूरी तरह विभाजित हो चुका है। अमेरिका एवं उसके समर्थक पश्चिमी एवं खाड़ी देश समेत तुर्की इस मत के हैं कि सीरिया में असद सरकार को हटाकर दूसरी सरकार की स्थापना की जाए। वहीं रुस, चीन और ईरान इस मत के खिलाफ हैं। हां, पश्चिमी देश जरुर चाहते हैं कि सीरिया में तख्तापलट हो लेकिन वे रुस के विरोध के कारण सैन्य हस्तक्षेप से बच रहे हैं।
    इज्ररायल भी अपने हितों को देखते हुए असद सरकार को मिटते हुए देखना नहीं चाहता। इसलिए कि असद सरकार जाने के बाद वहां कोई लोकतांत्रिक सरकार आने वाली नहीं है। सत्ता उन इस्लामिक कट्टपंथियों के हाथ ही जाएगी जो इज्ररायल को नापंसद करते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि रुसी राजदूत आंद्रे कारालोव की हत्या अंतर्राष्ट्रीय कुटनीति को किस मोड़ पर खड़ा करती है।
    अरविंद जयतिलक

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