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    …कभी अस्त नहीं हो सकता ‘सच’ का सूरज

    The sun of 'truth

    12 महीने, 365 दिन या एक बरस।

    मुमकिन है, आप सबके लिए इन तीनों ही संज्ञाओं का एक ही रटा-रटाया (The sun of ‘truth)  अर्थ हो यानि महज ‘कलेंडर’ में बदलाव। लेकिन, हर गुजरते पल के साथ एक अनकही-अनसुनी-अंजानी सी ‘पीर’ सहने वाले किसी भी शख्स से चंद पल बतियाएंगे तो बखूबी मालूम चल जाएगा कि, वक्त की ‘धार’ और ‘मार’, दोनों ही कितनी भयावह होती हैं? भारतवर्ष ही नहीं, वरन् समूचे विश्व में आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति का अलौकिक प्रकाश बिखेरने वाली विशाल सेवाशील संस्था ‘डेरा सच्चा सौदा’ से जुड़े हर अनुयायी ने ऐसी परिस्थितियों को झेला है।

    यह बात और है कि, अपने पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अनन्य प्रेरणा और मार्गदर्शन की बदौलत ऐसे किसी भी व्यक्ति के मन में कभी किसी के प्रति द्वेष या निंदा का भाव उत्पन्न नहीं हुआ। हर संकट, हर मुश्किल, हर चुनौती से विचलित हुए बिना वे आज भी पूर्ण मनोयोग से मानवता मात्र की सेवा में जुटे हैं और नित प्रतिदिन ईश्वर से बस यही प्रार्थना करते हैं कि, परमपिता परमेश्वर सर्वजगत का कल्याण करें और राह से भटकने वालों को सदा के लिए सत्यता के प्रकाश से आलोकित कर दें।

    पूरी दुनिया में डेरा सच्चा सौदा की ख्याति और लोकप्रियता की मिसाल यूं ही नहीं दी जाती। यह अपनी ही अनुकरणीय कार्य शैली से जन-जन की सेवा का आदर्श उदाहरण पेश करने वाली ऐसा आदर्श संस्था है, जिसके सेवादारों की संख्या स्वयं किसी विश्व कीर्तिमान से कम नहीं। आप महज क्षण भर के लिए सेवा के किसी भी प्रारूप की परिकल्पना भर करिए, डेरे के अनगिनत अनुयायियों की ओर से पूर्ण नि:स्वार्थ भाव से की गई सेवा के अनेक उदाहरण देखते ही देखते आपकी आँखों के आगे नुमायां हो जाएंगे।

    यकीनन, मानव कल्याण के प्रति सत्त समर्पित इस संस्था के मार्गदर्शक परम पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां से हासिल सकारात्मक दृष्टिकोण और आदर्श शिक्षाओं का ही काबिल-ए-तारीफ प्रतिफल है कि, तमाम चुनौतियों के बावजूद आज भी अनुयायियों का यह विशाल समूह पूरी लगन एवं निष्ठाभाव से अपने दायित्व निर्वहन में जुटा है।

    वह भी तब, जब गत वर्ष कमोबेश इन्हीं दिनों में, समाज विरोधियों की पूज्य गुरु जी के खिलाफ रची गई साजिश का घिनौना रूप सामने आया था, ताकि उनके अनगिनत सेवादारों का मनोबल पूरी तरह समाप्त हो जाए और वे ‘व्रजआघात’ सरीखे इस असहनीय कष्ट को सहने योग्य तक न रह सकें।
    बाकायदा, गहन ‘रिसर्च’ और सुनियोजित ‘पटकथा’ का सहारा लेते हुए ऐसे तमाम शर्मनाक तथा मनमाने अनर्गल आरोप पूज्य गुरुजी पर लगाए गए, जिनकी रंगत पूरी तरह ‘स्याह’ होने के बावजूद यह कांच की मानिंद बखूबी साफ हो गया कि, इस देश में अब ‘सच’ का साथ देने वालों का कोई खैरख्वाह नहीं। इतना ही नहीं, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले मीडिया के एक बड़े वर्ग की भूमिका भी इस पूरे प्रकरण से सवालों में घिर गई, जब महज ‘सुर्खियां’ बटोरने या ‘टीआरपी’ में खुद को सबसे आगे बनाए रखने की होड़ में हर किस्म की नैतिकता से लेकर सदाचार, परोपकार, सेवाभाव, जन कल्याण और सत्यता सरीखे समस्त आदर्श मानवीय मूल्यों को सिरे से दरकिनार कर दिया गया।

    न कोई ठोस प्रामाणिक तथ्य और न ही किसी प्रकार की मान-मर्यादा। ऐसे हर पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए मीडिया का एक बड़ा वर्ग बाकायदा किसी तयशुदा ‘टीवी श्रृंखला’ की तर्ज पर समाज में चौतरफा दुष्प्रचार का जहर घोलता रहा। मीडिया के इसी रवैये के कारण न केवल डेरे के अनुयायियों की आस्था बुरी तरह आहत हुई बल्कि, देश के आम जनमानस को गुमराह करने में भी तकरीबन तमाम टीवी चैनलों से लेकर प्रिंट मीडिया तक का एक बड़ा वर्ग कतई पीछे नहीं रहा।

    जन कल्याण में जुटे डेरा सच्चा सौदा के समूचे सांगठनिक ढांचे को पूरी तरह छिन्न-भिन्न करने की मंशा के साथ इतनी तेजी से इस षड्यंत्र का ताना-बाना बुना गया कि, दिन-रात समाजसेवा में लीन साध-संगत को कानोंकान कोई खबर न हो सकी। बची-खुची कसर, पर्दे के पीछे से ही पूरे खेल को अंजाम तक पहुंचाने में जुटी उन ‘सफेदपोश’ ताकतों ने पूरी कर दी, जो महज अपनी ‘स्वार्थपूर्ति’ की खातिर इतने खतरनाक ढंग से एक-एक चाल चलते चले जा रहे थे। तकरीबन, समूचे उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में आम पाठकों से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग को पूरी तरह भ्रमित करते हुए डेरा सच्चा सौदा और पूज्य गुरु जी पर तमाम किस्म के मिथ्या आरोप लगाने का यह सिलसिला बदस्तूर महीनों तक जारी रहा।

    निष्ठुरता और अमानवीयता की हद तो तब हो गई, जब इस पूरी काली साजिश के कारण अंततोगत्वा पूज्य गुरु जी के सुनारियां जाने के बाद भी मीडिया के तथाकथित मठाधीशों ने एक क्षण के लिए भी उफ न करते हुए झूठे आरोपों और तथ्यों का पुलिंदा अपने-अपने मंचों पर परोसने का क्रम थमने नहीं दिया।
    लेकिन, यह भी निस्संदेह, पूज्य गुरु जी से ही हासिल आत्मबल और प्रेरणा का ही सशक्त प्रभाव रहा कि, न जाने कितने ही प्रकार के पूर्वाग्रहों और कुंठित मनोदशाओं से ग्रस्त मीडिया के इस बड़े तबके से मिलने वाली नित नई चुनौती का सामना करने में आपके प्रिय समाचार पत्र ‘सच कहूँ’ ने कहीं कोई कमी नहीं रख छोड़ी। हर रोज पूरी ताकत के साथ, ‘सच कहूँ’ अपने शीर्षक के अनुरूप और यथा नाम तथा गुण की तर्ज पर सत्य की मशाल लगातार रोशन किए रहा। मिथ्या आरोपों का मजबूती से जवाब देते हुए ‘सच कहूँ’ ने अपने मार्गदर्शक की प्रेरणा के सहारे डेरा सच्चा सौदा से जुड़े एक-एक अनुयायी तक बखूबी संदेश पहुंचाया कि, उन्हें मीडिया के एक बड़े वर्ग में दर्शाए गए झूठ से जरा भी घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि, वे पूरे आत्मविश्वास के साथ इस संकट का सामना करें और पूज्य गुरु जी से मिली सीख के सहारे जन-जन की सेवा में पहले की भांति स्वयं को क्षण प्रतिक्षण तल्लीन रखें।

    अब तक 79 विश्व कीर्तिमान अपने नाम कर चुके डेरे का यह गौरवशाली सफर पूरी आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ सतत् चलायमान है। मुश्किलें चाहें कितनी भी हों, राह में बाधाएं कितनी भी क्यों न आएं, ‘सत्य’ का सूरज कभी अस्त नहीं होगा…! वस्तुत: अपने कर्तव्य पथ से एक पल के लिए विमुख न होने वाले ये तमाम सेवाशील प्राणी हर रोज परमपिता से यही प्रार्थना करते हैं कि, वे अनर्गल और मिथ्या आरोप लगाने वालों को क्षमा करें क्योंकि, वे नहीं जानते कि, वे क्या कह रहे हैं ? वे अज्ञानी हैं, पतित हैं, अंध हैं, अश्रद्ध हैं, अविवेकी हैं, नश्वर हैं, वे धर्म-अधर्म नहीं जानते, दर्शन नहीं जानते, परोपकार नहीं जानते, वे पुण्य नहीं समझते और दान या सेवा की महिमा से पूरी तरह अंजान हैं। उनका केवल इतना उद्देश्य है कि, किसी भी तरह हमारी प्राचीन-अवार्चीन आध्यात्मिक संपन्नता और सेवाशीलता को समर्पित भावना तहस-नहस हो जाए। लेकिन, वे यह नहीं जानते कि, आध्यात्मिक संपन्नता ही तो हमारा वास्तविक बल है। न जाने कब से इसे तोड़ने के कुत्सित प्रयास किए जा रहे हैं।

    हमारी आस्थाओं, श्रद्धाओं, सेवाशीलता को अंधश्रद्धा साबित करने की साजिश रची जा रही है। इसी के तहत, हमारे मार्गदर्शकों पर मुकदमे किए गए, उन्हें जेल में डालकर यातनाएं दी जा रही हैं लेकिन, याद रखना चाहिए कि, सांच को आंच नहीं होती। युग कोई भी हो, चुनौतियों का पहाड़ कितना ही विशालकाय क्यों न हो, हमारे आदर्श हमेशा बेदाग साबित होते रहे हैं, क्योंकि चाहे शासन-प्रशासन हो या फिर न्याय व्यवस्था ही क्यों न हो, हर व्यवस्था में आध्यात्मिक तत्व अवश्य विद्यमान रहता है और इस मूल सार्वभौमिक तत्व में विश्वास रखने वाले किसी भी परिस्थिति में अध्यात्म की गहराई में झांककर सत्य खंगालने से एक क्षण के लिए पीछे नहीं हटते। वे अध्यात्म की विराट परिधि से पूरी तरह परिचित होते हैं, साथ ही डेरा सच्चा सौदा सरीखे मानव कल्याण के प्रति सत्त समर्पित आध्यात्मिक केंद्रों तथा उनके साधकों की महिमा भी जानते हैं और हमारी आध्यात्मिक संपन्नता को हर हाल में अक्षुण्ण बनाए रखने का अपना सबसे परम दायित्व भी…! पवन शर्मा

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