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    बाल अपराध: राज्यों को जवाबदेह ठहराया जाए

    Child crime: States should be held accountable

    बिहार और उत्तर प्रदेश के आश्रय गृहों में बच्चों के साथ दुव्यर्वहार की घटनाओं पर उच्चतम न्यायालय सहित विभिन्न क्षेत्रों द्वारा कडी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है और इसमें राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की संलिप्तता की बात भी कही गयी है। केवल कुछ लोगों को गिरफ्तार करने से काम नही चलेगा और न ही यह बुराई समाप्त होगी। मुजफ्फरपुर के आश्रय गृहों में बाल कल्याण समिति सदस्य और जिला बाल संरक्षण अधिकारी भी छोटी लडकियों के साथ बलात्कार के आरोपी हैं। अत: राज्य को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने इसी दिशा में कदम उठाया। जब केन्द्र ने न्यायालय को सूचित किया कि देश में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा संचालित आश्रय गृहों में 1575 यौन पीड़ित बच्चे रह रहे हैं यह कोई मोटा आकलन नहीं था अपितु राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण की रिपोर्ट पर आधारित था। उसके बाद पूरे देश में आश्रय गृहों का सर्वेक्षण कराया गया। इन 1575 बच्चों में से 1289 बालिकाएं और 286 बालक थे और 189 बच्चे पोर्नोग्राफी के शिकार थे। आंकडेÞ बताते हैं कि हमारे देश में 30 से 50 प्रतिशत लोग यौन उत्पीड़न का शिकार हैं। जिनमें से लगभग 5 लाख बच्चे वेश्यावृति में संलिप्त हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकलन के अनुसार 150 मिलियन बालिकाएं और 73 मिलियन बालकों के साथ किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न किया जाता है। ऐसे अनेक मामलों की रिपोर्ट नहीं की जाती है। लाखों बच्चे गायब होते हैं जिनमें से 25 प्रतिशत का पता ही नहीं चलता है। दुर्व्यवहार और उपेक्षा को बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार, यौन शोषण, उपेक्षित व्यवहार व दुर्व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है।

    मादक द्रव्यों और हथियारों के अवैध व्यपार के बाद बच्चों, बालिकाओं और युवतियों की खरीद-फरोख्त तीसरा सबसे बडा संगठित अपराध है। पाकिस्तान, मलेशिया, नेपाल और इंडोनेशिया ऐसे अपराधों के लिए कुख्यात हैं। दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी इसका मुख्य कारण गरीबी है। बच्चों की खरीद-फरोख्त को रोकने के लिए कानूनी उपाय कठोर नहीं हैं तथा राज्य सरकारें भी इन उपायों को लागू करने के बारे में गंभीर नहीं है। उदाहरण के लिए बलात्कार के मामलों को ही लें। बलात्कार के बारे में कठोर कानून हैं किंतु लगता है जांच एजेंसियों, पुलिस और राज्य प्रशासन के बीच सांठगांठ के चलते इनकी ठीक से जांच नहीं हो पाती है।

    हाल ही में एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन ने भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश घोषित किया है। सरकार ने इस रिपोर्ट का खंडन किया है। किंतु साथ ही उसे बाल दुर्व्यवहार के अनेक मामलों से जूझना पड रहा है। महिलाओं और बच्चों के संरक्षण के लिए देश के कानून कितने कठोर हैं। इस संबंध में मुख्य कानूनी प्रावधान भारतीय दंड संहिता 1960 की धारा 354, 366, 366क, 366ख, 373 और 375 में हैं। किंतु जब तक इन कानूनी प्रावधानों को कडाई से लागू नहीं किया जाता इनका कोई महत्व नहीं रह जाता है। इसलिए देश में मांग की जा रही है कि ऐसे अपराधों से निपटने के लिए प्रत्येक थाने में कम से कम एक महिला अधिकारी हो। किशोर न्याय अधिनियम 2000 भी अधिक प्रभावी नहीं रहा। आर्थिक परिस्थितियां, धन का लालच, भौतिकवादी संस्कृति आदि के चलते बच्चों का आर्थिक शोषण होता है। साथ ही शहरों की उदार संस्कृति, धन के लिए सेक्स जैसी प्रवृतियां बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार बलात्कार के पीडितों और आरोपियों के बीच संबंध पाए गए हैं।

    दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों के अनुसार सरकारी सहायता प्राप्त या जनता से सरोकार रखने वाले संगठनों और संस्थाओं की सामाजिक लेखा परीक्षा अनिवार्य है। इसमें मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसका आदेश केवल कागजों पर न रहे और यह सामाजिक लेखा परीक्षा स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा की जाए और उन पर किसी तरह का राजनीतिक दबाव न रहे। इसके साथ ही यौन दुव्वहार के मामलों के त्वरित निपटान के लिए अलग अधिकरण और फास्ट टैÑक कोर्ट की स्थापना की जानी चाहिए और अपराधियों को कठोर दंड दिया जाना चाहिए। मीडिया के माध्यम से यौन उत्पीडन के बारे में जनजागरूकता पैदा की जाए। ऐसे अपराध करने वालों का मनोवैज्ञानिक इलाज किया जाए तथा बच्चों में यौन अपराध के लक्षणों का पता लगाने के लिए अध्यापकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। घरों तथा परिवार के सदस्यों द्वारा यौन उतपीडन का पता लगाने के प्रयास किए जाएं। साथ ही राज्यों द्वारा संचालित संस्थाओं में बाल श्रम वेश्यावृति और किसी अन्य तरह के दुर्व्यवहार पर भी ध्यान दिया जाए।

    सामाजिक बुरुाइयोंं की जड गरीबी, कुपोषण अशिक्षा खराब स्वास्थ्य, उपेक्षा आदि हैं और इनका निराकरण किया जाना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक दशाएं एक दूसरे से जुडी हुई हैं। इसलिए बाल दुर्व्यवहार और निवारण कार्यक्रमों के बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। सामाजिक नेटवर्क और सुदृढ़ पारिवारिक प्रणाली से बालकों में दुर्व्यवहार के प्रति जागरूकता पैदा की जा सकती है। समाज में सुधार के अलावा उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार बाल सरंक्षण नीति बनायी जाए।

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