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    ई-सिगरेट पर पाबंदी सराहनीय

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    केंद्र सरकार ने ई-सिगरेट पर पाबंदी लगाकर सराहनीय निर्णय लिया है। इस निर्णय से उन ई-सिगरेट कंपनियों के झूठे प्रचार को झटका लगेगा जो ई-सिगरेट के नुक्सान रहित होने का प्रचार कर रही थीं। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसी वर्ष जारी अपनी रिपोर्ट में विश्व भर को चेतावनी दी थी कि ई-सिगरेट कंपनियों के प्रचार पर विश्वास न करें। संगठन ने यह भी खुलासा किया था कि सिगरेट उद्योग तम्बाकू विरोधी अंतरराष्ट्रीय मुहिम को नाकाम बनाने में लगा हुआ है। दरअसल ई-सिगरेट भी खतरे से खाली नहीं, इसमें भी घातक रसायन है जो सांस के रोग पैदा करते हैं। यह मनोविज्ञान है कि नकली सिगरेट पीने वाला फिर असली सिगरेट पीने की भी इच्छा बढ़ाता है। तम्बाकू समाज के माथे पर कलंक है जिसे मिटाने के लिए ई-सिगरेट का सहारा लेना ही गलत है।

    नि:संदेह इससे सरकार को वित्तीय नुक्सान तो होगा लेकिन देश के नागरिकों के स्वास्थ्य से बड़ा कोई धन नहीं। अमेरिकी प्रशासन भी ई-सिगरेट के दुप्रभावों के प्रति चिंतित है और इस पर नियंत्रण पाने के लिए प्रयत्नशील है। ई-सिगरेट का एक घातक पहलू यह भी है कि नई पीढ़ी इसे ‘स्टेटस सिंबल’ के तौर पर प्रयोग करने लगी है, जिसे रोकना और भी मुश्किल हो रहा है। इन हालातों में किसी वस्तु को कानूनी अनुमति न होना बेहद आवश्यक है। बेहतर होगा यदि सरकार इसी तरह शराब पर भी पाबंदी लगाए। नशा किसी भी देश के विकास में बड़ी रुकावट है। विशेष तौर पर भारतीय समाज में इसके बेहद बुरे परिणाम सामने आ चुके हैं। स्वास्थ्य की बर्बादी से लेकर आर्थिक और सामाजिक बर्बादी शराब के कारण आई है।

    समाज में रोजाना के लड़ाई-झगड़े, सड़क हादसे शराब के कारण हो रहे हैं। देश की हजारों पंचायतें अपने गांवों से शराब के ठेके हटाने के लिए तैयार हैं लेकिन दुख की बात यह है कि शराब सरकारों की कमाई का बड़ा स्त्रोत बन गई है और कई राज्य सरकारें इस कमाई को अपनी उपलब्धि में गिनाती हैं। ऐसी राज्य सरकारों को समझना चाहिए कि कुछ राज्यों ने शराबबन्दी लागू कर भी विकास किया है और पंजाब जैसा राज्य शराब से 6000 करोड़ रुपए कमाकर भी ढाई लाख करोड़ के करीब ऋणी है। शराब व्यक्ति के साथ-साथ राज्यों व देश को भी बर्बाद करती है।

     

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