फलीदार मटर की खेती किसान के लिए फायदे का सौदा

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Green-Peas

जलवायु-

तापमान-15-30 डिग्री सेल्सियस
वर्षा- 400-500 एमएम
कटाई के समय तापमान – 15-20 डिग्री सेल्सियस
बिजाई के समय तापमान- 25-30 डिग्री सेल्सियस

मिट्टी-

इसे मिट्टी की विभिन्न किस्मों, रेतली दोमट से चिकनी मिट्टी में उगाया जा सकता है। यह अच्छे निकास वाली मिट्टी में उगाने पर अच्छे परिणाम देती है। मिट्टी की पी एच 6 से 7.5 होनी चाहिए। यह फसल जल जमाव वाले हालातों में खड़ी नहीं रह सकती। अम्लीय मिट्टी के लिए, कली (चूना) डालें।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार-

पीजी3: यह छोटे कद वाली अगेती किस्म है जो 135 दिनों में तैयार हो जाती है। इसके फूल सफेद और दाने क्रीमी सफेद होते हैं। यह सब्जी बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है। इस पर सफेद रोग कम आता है और फली छेदक का हमला कम होता है।
पंजाब 88: यह पीएयू लुधियाणा की किस्म है। फलियां गहरी हरी और मुड़ी हुई होती हैं। यह 100 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी हरी फलियों की औसतन पैदावार 62 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
एपी 3: यह जल्दी पकने वाली किस्म है। यदि इसे अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में बोया जाए तो यह किस्म बिजाई के 70 दिन बाद पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन उपज 31.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
पंजाब 89: इस किस्म की फलियां जोड़े में उगती हैं। यह किस्म बिजाई के 90 दिना के बाद पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके बीज स्वाद में मीठे होते हैं और इसकी फलियां 55 प्रतिशत बीज देती हैं। इसकी औसतन उपज 60 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
मीठी फली: यह किस्म बिजाई के 90 दिनों के बाद पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म प्रोटीन और मीठे से भरपूर होती है। इसकी औसतन उपज 47 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

जमीन की तैयारी-

खरीफ ऋतु की फसल की कटाई के बाद सीड बैड तैयार करने के लिए हल से 1-2 जोताई करें। हल से जोतने के बाद 2 या 3 बार तवियों से जोताई करें। जल जमाव से रोकने के लिए खेत को अच्छी तरह समतल कर लेना चाहिए। बिजाई से पहले खेत की एक बार सिंचाई करें यह फसल के अच्छे अंकुरन में सहायक होती है।

बिजाई का समय

अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए अंत अक्तूबर से मध्य नवंबर के बीच बिजाई पूरी कर लें। इसके आगे बिजाई में देरी करने से उपज में कमी होगी। अगेती मंडीकरन के लिए मटरों को अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े में उगाएं।

फासला-

अगेती किस्मों के लिए 30 सैं.मी. गुणा 50 सैं.मी. और पिछेती किस्मों के लिए 45-60 सैं.मी. गुणा 10 सैं.मी.फासले का प्रयोग करें।

बीज की गहराई-

बीज को मिट्टी में 2-3 सैं.मी. गहरा बोयें।

बिजाई का ढंग-

इसकी बिजाई मशीन से मेढ़ बनाकर करें जोकि 60 सैं.मी. चौड़ी होती हैं।

बीज की मात्रा-

बिजाई के लिए 35-40 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।

बीज का उपचार-

बिजाई से पहले बीजों को कप्तान या थीरम 3 ग्राम या कार्बेनडाजिम 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। रासायनिक तरीके से उपचार के बाद बीजों से अच्छी पैदावार लेने के लिए उन्हें एक बार राइजोबियम लैगूमीनोसोरम से उपचार करें। इसमें 10 प्रतिशत चीनी या गुड़ का घोल होता है। इस घोल को बीजों पर लगाएं और फिर बीज को छांव में सुखाएं। इससे 8-10 प्रतिशत पैदावार में वृद्धि होती है।

खाद-

बिजाई के समय नाइट्रोजन 20 किलो (50 किलो यूरिया), फासफोरस 25 किलो (150 किलो सिंगल सुपर फासफेट) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। खादों की पूरी मात्रा कतारों के साथ डाल दें।

खरपतवार नियंत्रण-

किस्म के आधार पर एक या दो गोड़ाई की आवश्यकता होती है। पहली गोड़ाई 2-3 पत्ते आने की अवस्था पर या बिजाई के 3-4 सप्ताह बाद की जाती है और दूसरी गोड़ाई फूल निकलने से पहले की जाती है। मटर की खेती में नदीनों की रोकथाम के लिए नदीननाशक का प्रयोग करना सबसे प्रभावी ढंग है। नदीनों के नियंत्रण के लिए पैंडीमैथालीन 1 लीटर या बसालिन 1 लीटर प्रति एकड़ में डालें। बिजाई के 48 घंटे में नदीननाशक का प्रयोग करें।

सिंचाई-

अच्छे अंकुरण के लिए बिजाई से पहले सिंचाई जरूर करनी चाहिए। यदि इसकी खेती धान फसल के बाद की जाती है तो मिट्टी में पर्याप्त नमी होने पर, इसे सिंचाई के बिना भी बोया जा सकता है। बिजाई के बाद एक या दो सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई फूल निकलने से पहले और दूसरी फलियां भरने की अवस्था में करें। भारी सिंचाई से पौधों में पीलापन बढ़ जाता है और उपज में कमी आती है।

हानिकारक कीट और रोकथाम-

मटर के पत्तों का सुरंगी कीट: लार्वा पत्तों में सुरंग बनाकर पत्ते को खाता है। जिस कारण 10 से 15 प्रतिशत तक फसल का नुक्सान होता है। यदि इसका हमला दिखे तो डाइमैथोएट 30 ई सी 300 मि.ली. को 80-100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। जरूरत पड़ने पर 15 दिनों के बाद दोबारा स्प्रे करें।

मटर का थ्रिप और चेपा:

यह पत्तों का रस चुसते हैं, जिस कारण पत्ता पीला हो जाता है और पैदावार कम हो जाती है।
इसकी रोकथाम के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 400 मि.ली. को 80-100 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। जरूरत पड़ने पर 15 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव करें।

फली छेदक-

यह मटरों की फसल का खतरनाक कीड़ा है। यदि इस कीड़े की रोकथाम जल्दी ना की जाये तो यह फूलों और फलियों को 10 से 90 प्रतिशत नुक्सान पहुंचाता है। शुरूआती नुक्सान के समय कार्बरिल 900 ग्राम को प्रति 100 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें। जरूरत के अनुसार 15 दिनों के फासले पर दोबारा स्प्रे करें। ज्यादा नुक्सान के समय 1 लीटर क्लोरपाइरीफॉस या एसीफेट 800 ग्राम को 100 लीटर पानी में डालकर स्प्रे वाले पंप से प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

बीमारियां और रोकथाम-

सूखा: इस बीमारी के कारण जड़ें काली हो जाती हैं और बाद में सूख जाती हैं। पौधा छोटा और रंग बिरंगा हो जाता है। पत्ते पीले होकर किनारों से मुड़ जाते हैं। सारा पौधा मुरझा जाता है। इसकी रोकथाम के लिए बीज का उपचार कर लेना जरूरी है। बिजाई से पहले बीज को थीरम 3 ग्राम या कार्बेनडाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी से उपचार कर लेना चाहिए और बुरी तरह से प्रभावित क्षेत्रों में अगेती बिजाई ना करें। तीन साल का फसली चक्र अपनायें। ज्यादा नुक्सान होने की हालत में कार्बेनडाजिम 5 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर पौधे की जड़ों के साथ-साथ छिड़काव करें। लैथीरस वीसिया जैसे नदीनों को नष्ट कर दें।

कुंगी- इससे पौधे के पत्ते, टहनियां, फलियों और पीले भूरे रंग के उभरे हुए धब्बे पड़ जाते हैं। मैनकोजेब 25 ग्राम या इंडोफिल 400 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें और 10-15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें। पत्तों पर सफेद धब्बे- पत्तों के निचली तरफ, शाखाओं और फलियों पर सफेद रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इसके कीट पौधे को अपने भोजन के रूप में लेते हैं। ये फसल की किसी भी अवस्था में विकसित हो सकते हैं। ज्यादा हमले के कारण पत्ते गिर भी जाते हैं। यदि इसका हमला दिखे तो कैराथेन 40 ई सी 80 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर कैराथेन की तीन स्प्रे करें।

फसल की कटाई- हरी फलियों की उचित अवस्था पर तुड़ाई करनी चाहिए। मटर का रंग गहरे हरे से हरा होने पर जितनी जल्दी हो सके तुड़ाई कर लेनी चाहिए। 6 से 10 दिनों के अंतराल पर 4 से 5 तुड़ाइयां की जा सकती हैं। उपज किस्म, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और खेत में इसके प्रबंधन पर निर्भर करती है।

कटाई के बाद-

हरी फलियों की लंबे समय तक उपलब्धता बढ़ाने के लिए उन्हें कम तापमान पर स्टोर किया जाता है। पैकिंग जूट की बोरियों, प्लास्टिक के कंटेनर और बांस की टोकरियों में की जाती है।

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