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    शतरंज में ग्रैंडमास्टर बनने वाली पहली भारतीय महिला

    Chess Grandmaster

    जब भी शतरंज की चर्चा होती है तो सबके दिमाग में कुछ चुनिन्दा पुरुषों के नाम आते हैं। भारत की महिलाओं में शतरंज का हुनर पुरुषों के अपेक्षाकृत बहुत कम आंका जाता है लेकिन इस प्रवृत्ति को पीछे छोड़ते हुए भाग्यश्री साठे शतरंज में ग्रैंडमास्टर बनने वाली पहली महिला थी। भाग्यश्री का जन्म 4 अगस्त 1961, मुम्बई में हुआ था। वह शुरू से ही बहुत होशियार थी और शतरंज में उनकी दिलचस्पी महज 12 वर्ष से ही उत्पन्न हो गयी थी और इसका श्रेय उनके पिता को जाता है। अपने बहन-भाईयों के साथ खेलते हुए व पिता को शतरंज में मात देते हुए उनके शतरंज खेलने का सफर शुरू हुआ। लेकिन पढ़ाई के कारण वह पूरा ध्यान शतरंज पर नहीं दे पाती थी इसलिए उन्होंने बाद में इसे अपना मुख्य शौक बनाया।

    सन 1979 में उन्होंने मद्रास नेशनल विमन्स चैस चैम्पियनशिप मे भाग लिया और आठवां स्थान प्राप्त किया पर छह साल बाद उसी प्रतियोगिता को जीतकर दिखाया। उन्होंने सन 1985 से 1994 के बीच पाँच बार (1985, 1986, 1988, 1991 और 1994) इन्डियन विमन्स चैम्पियनशिप जीता एवं सन 1991 में एशियाई विमन्स चैम्पियनशिप जीता। पर उनके इस सफर का सबसे गौरवशाली क्षण तब आया जब उन्होंने वाय.एम.सी.ए नेशनल विमन्स चैस चैम्पियनशिप जीता। उनकी इतनी सारी जीतों के बाद वह इन्टरनेशनल ग्रैन्डमास्टर का खिताब जीतने वाली पहली महिला बनी। आज ही के दिन सन 1986 में उनको पद्मश्री एवं सन 1987 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। वर्तमान में वह मुम्बई में आई.डी.बी.आई अफसर के पद पर कार्यरत हैं।

     

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