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    शासन, सुशासन और सिटिजन चार्टर

    Governance

    भारत में कई वर्षों से आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। इसके साथ ही साक्षरता दर में पर्याप्त वृद्धि हुई और लोगों में अधिकारों के प्रति जागरूकता आयी। नागरिक और अधिकार और अधिक मुखर हो गये तथा प्रशासन को जवाबदेह बनाने में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित की। अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में देखें तो विश्व का नागरिक पत्र के सम्बंध में पहला अभिनव प्रयोग 1991 में ब्रिटेन में किया गया जिसमें गुणवत्ता, विकल्प, मापदण्ड, मूल्य, जवाबदेही और पारदर्शिता मुख्य सिद्धांत निहित हैं।

    साल 2020 जीवन के लिए एक चुनौती रहा ऐसे में नागरिक अधिकार पत्र की उपयोगिता और शिद्दत से महसूस की गयी। कोरोना के काल चक्र में सुशासन का दम भरने वाली सरकारों को ठीक से शासन करने लायक भी नहीं छोड़ा। ऐसे में नागरिक अधिकार पत्र भले ही महत्वपूर्ण हो पर और दरकिनार होना लाजमी है। फिलहाल सुशासन प्रत्येक राष्ट्र के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है। सुशासन के लिए यह जरूरी है कि प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही दोनों तत्व अनिवार्य रूप से विद्यमान हों। सिटिजन चार्टर (नागरिक अधिकार पत्र) एक ऐसा हथियार है जो कि प्रशासन की जवाबदेहिता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है।

    जिसके चलते प्रशासन का व्यवहार आम जनता (उपभोक्ताओं) के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील रहता है। दूसरे अर्थों में प्रशासनिक तंत्र को अधिक जवाबदेह और जनकेन्द्रित बनाने की दिशा में किये गये प्रयासों में सिटिजन चार्टर एक महत्वपूर्ण नवाचार है। नई सरकार की पुरानी नीतियों पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सुशासन को जिस तरह महत्व देने का काम किया पर सफलता मन माफिक नहीं मिली है। इसके पीछे सिटिजन चार्टर का सही तरीके से लागू न हो पाना भी मुख्य कारण रहा है। जनता के वे कार्य जो समय सीमा के भीतर पूर्ण हो जाने चाहिए उसके प्रति भी दोहरा रवैया जिम्मेदार रहा है। दो टूक कहें तो इस अधिकार के मामले में कथनी और करनी में काफी हद तक अंतर रहा है।

    देश भर में विभिन्न सेवाओं के लिए सिटिजन चार्टर लागू करने के मामले में अगस्त 2018 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर सुनवाई करने से ही इंकार कर दिया। शीर्ष अदालत का तर्क था कि संसद को इसे लागू करने के निर्देश दे सकते हैं। इस मामले को लेकर न्यायालय ने याचिकाकत्र्ता के लिए बोला कि वे सरकार के पास जायें जबकि सरकारों का हाल यह है कि इस मामले में सफल नहीं हो पा रहीं हैं। सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है ऐसे में शासन और प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि जनता की मजबूती के लिए हर सम्भव प्रयास करें साथ ही व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह के साथ मूल्यपरक बनाये रखें।

    इसी तर्ज पर आॅस्ट्रेलिया में सेवा चार्टर 1997 में, बेल्जियम में 1992, कनाडा 1995 जबकि भारत में यह 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में इसे मूर्त रूप देने का प्रयास किया गया। पुर्तगाल, स्पेन समेत दुनिया के तमाम देश नागरिक अधिकार पत्र को अपनाकर सुशासन की राह को समतल करने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री मोदी सुशासन के मामले में कहीं अधिक गम्भीर दिखाई देते हैं परन्तु सर्विस फर्स्ट के आभाव में यह व्यवस्था कुछ हद तक आशातीत नहीं रही। भारत सरकार द्वारा इसे लेकर एक व्यापक वेबसाइट भी तैयार की गयी जिसका प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा 31 मार्च 2002 को लांच की गयी।

    वैसे सुशासन को निर्धारित करने वाले तत्वों में राजनीतिक उत्तरदायित्व सबसे बड़ा है। यही राजनीतिक उत्तरदायित्व सिटिजन चार्टर को भी नियम संगत लागू कराने के प्रति जिम्मेदार है। सुशासन के निर्धारक तत्व मसलन नौकरशाही की जवाबदेहिता, मानव अधिकारों का संरक्षण, सरकार और सिविल सेवा सोसायटी के मध्य सहयोग, कानून का शासन आदि तभी लागू हो पायेंगे जब प्रशासन और जनता के अर्न्तसम्बंध पारदर्शी और संवेदनशील होंगे जिसमें सिटिजन चार्टर महत्वपूर्ण पहलू है।

    प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग ने नागरिक चार्टर का आंतरिक व बाहरी मूल्यांकन अधिक प्रभावी, परिणामपरक और वास्तविक तरीके से करने के लिए मानकीकृत मॉडल हेतु पेशेवर एजेंसी की नियुक्ति दशकों पहले की थी। इस एजेंसी ने केन्द्र सरकार के पांच संगठनों और आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश राज्य सरकारों के एक दर्जन से अधिक विभागों के चार्टरों के कार्यान्वयन का मूल्यांकन भी किया। रिपोर्ट में कहा कि अधिकांश मामलों में चार्टर परामर्श प्रक्रिया के जरिये नहीं बनाये गये। इनका पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। नागरिक चार्टर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए किसी प्रकार की कोई धनराशि निर्धारित नहीं की गयी। उक्त मुख्य सिफारिशें यह परिलक्षित करती हैं कि सिटिजन चार्टर को लेकर जितनी बयानबाजी की गयी उतना किया नहीं गया। स्थानीय भाषा में इसे लेकर बढ़ावा न देना, इस मामले में उचित प्रशिक्षण का अभाव तथा जिसके लिए सिटिजन चार्टर बना वही नागरिक समाज भागीदारी के मामले में वंचित रहा।

    प्रधानमंत्री मोदी की पुरानी सरकार सबका साथ, सबका विकास की अवधारणा से युक्त थी तब भी सिटिजन चार्टर को लेकर समस्यायें कम नहीं हुईं। अब वह नई पारी खेल रहे हैं और इस स्लोगन में सबका विश्वास भी जोड़ दिया है पर यह तभी सफल करार दी जायेगी जब सर्विस फर्स्ट की थ्योरी देखने को मिलेगी। उल्लेखनीय है कि भारत में नागरिक चार्टर की पहल 1997 में की गयी जो कई समस्याओं के कारण बाधा बनी रही। नागरिक चार्टर की पहल के कार्यान्वयन से आज तक के अनुभव यह बताते हैं कि इसकी कमियां भी बहुत कुछ सिखा रही हैं। जिन देशों ने इसे एक सतत प्रक्रिया के तौर पर अपना लिया है वे सघन रूप से निरंतर परिवर्तन की राह पर हैं।

    जहां पर रणनीतिक और तकनीकी गलतियां हुई हैं वहां सुशासन भी डामाडोल हुआ है। चूंकि सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है ऐसे में लोक सशक्तीकरण ही इसका मूल है। सुशासन के भीतर और बाहर कई उपकरण हैं। सिटिजन चार्टर मुख्य हथियार है। सिटिजन चार्टर एक ऐसा माध्यम है जो जनता और सरकार के बीच विश्वास की स्थापना करने में अत्यंत सहायक है। एनसीजीजी का काम सुशासन के क्षेत्र में शोध करना और इसे लागू करने के लिए आसान तरीके विकसित करना है ताकि मंत्रालय आसानी से सुशासन सुधार को लागू कर सकें।

    सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, ई-आॅक्शन को बढ़ावा देना, अर्थव्यवस्था की समस्याओं का हल तलाशना, आधारभूत संरचना, निवेश पर जोर, जनता की उम्मीद पूरा करने पर ध्यान, नीतियों को तय समय सीमा में पूरा करना, इतना ही नहीं सरकारी नीतियों में निरंतरता, अधिकारियों का आत्मविश्वास बढ़ाना और शिक्षा, स्वास्थ, बिजली, पानी को प्राथमिकता देना ये सुशासनिक एजेंण्डे मोदी के सुशासन के प्रति झुकाव को दशार्ते हैं। लोकतंत्र नागरिकों से बनता है और सरकार अब नागरिकों पर शासन नहीं करती है बल्कि नागरिकों के साथ शासन करती है। ऐसे में नागरिक अधिकार पत्र को कानूनी रूप देकर लोकतंत्र के साथ-साथ सुशासन को भी सशक्त बनाया जाना चाहिए।

                                                                                                                -सुशील कुमार सिंह

     

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