
मथुरा का प्राचीन इतिहास : भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि और सांस्कृतिक विरासत
History of Mathura: अनु सैनी। भारत की पवित्र और ऐतिहासिक नगरी मथुरा धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह नगरी भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध है और हजारों वर्षों से श्रद्धा, आस्था और कला का केंद्र बनी हुई है। यमुना नदी के तट पर स्थित मथुरा को हिंदू धर्म में सात पवित्र नगरियों (सप्तपुरी) में भी शामिल किया गया है। यहां का इतिहास केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पुरातात्विक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से भी यह शहर अत्यंत समृद्ध रहा है।
पौराणिक महत्व और नामकरण
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मथुरा का संबंध यदुवंश से है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। रामायण में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार इक्ष्वाकु वंश के राजकुमार शत्रुघ्न ने लवणासुर नामक राक्षस का वध कर इस क्षेत्र पर अधिकार किया। उस समय यह स्थान घने जंगलों से घिरा हुआ था और इसे मधुवन कहा जाता था। समय के साथ इसका नाम मधुपुरा पड़ा और बाद में यही नगर मथुरा के नाम से प्रसिद्ध हो गया। यह पौराणिक परंपरा मथुरा को केवल एक नगर नहीं बल्कि धार्मिक चेतना का केंद्र बनाती है, जहां हर गली और घाट से आध्यात्मिक इतिहास झलकता है।
प्राचीन राजनीतिक इतिहास
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मथुरा सुरसेन जनपद की राजधानी बन गई थी। उस समय यह व्यापार, संस्कृति और शासन का प्रमुख केंद्र था। इसके बाद मौर्य साम्राज्य के विस्तार के साथ मथुरा भी उनके शासन के अंतर्गत आ गया। मौर्य काल में प्रशासनिक व्यवस्था, व्यापारिक मार्ग और सांस्कृतिक गतिविधियों का काफी विकास हुआ।
यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज ने भी मथुरा का उल्लेख एक समृद्ध और महत्वपूर्ण नगर के रूप में किया है। उन्होंने इसे मेथोरा नाम से संबोधित करते हुए इसकी समृद्धि और सांस्कृतिक महत्व का वर्णन किया।
शुंग और भारत-यूनानी प्रभाव
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शुंग वंश का उदय हुआ, हालांकि मथुरा में उनके प्रत्यक्ष शासन के स्पष्ट पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं। इसी दौरान मथुरा पर भारत-यूनानी शासकों का प्रभाव भी देखा गया। यवनराज्य शिलालेख से यह संकेत मिलता है कि लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहली शताब्दी ईसा पूर्व तक मथुरा पर उनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहा। इस काल में स्थानीय मित्र वंश के शासकों का भी अस्तित्व था, जो संभवतः भारत-यूनानी शासकों के साथ सहयोग या आश्रित संबंध में शासन कर रहे थे। यह समय सांस्कृतिक आदान-प्रदान और कला के विकास का महत्वपूर्ण काल माना जाता है।
शक और कुषाण काल में उत्कर्ष
प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में मथुरा पर भारत-सिथियन (शक) शासकों का अधिकार हुआ। इस काल में उत्तरी सतपों का शासन स्थापित हुआ। इसके बाद कुषाण वंश के अधीन मथुरा ने कला, संस्कृति और व्यापार के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति की। कुषाण सम्राट कनिष्क के समय मथुरा उनकी प्रमुख राजधानियों में से एक था। इस काल में मथुरा कला शैली का विकास हुआ, जो भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। बौद्ध, जैन और हिंदू धर्म से संबंधित अनेक मूर्तियां और स्थापत्य इसी काल में निर्मित हुए, जिनका उत्कृष्ट संग्रह आज भी मथुरा संग्रहालय में देखा जा सकता है।
बौद्ध धर्म का केंद्र
चौथी और पांचवीं शताब्दी के दौरान मथुरा बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया। चीनी यात्री फाह्यान ने अपने यात्रा वर्णन में मथुरा को बौद्ध धर्म के समृद्ध केंद्र के रूप में बताया है। बाद में सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग ने भी यहां की यात्रा की और उल्लेख किया कि शहर में अनेक बौद्ध मठों के साथ-साथ ब्राह्मण मंदिर भी विद्यमान थे।
यह विवरण दर्शाता है कि मथुरा धार्मिक सहिष्णुता और विविधता का प्रतीक रहा है, जहां विभिन्न धर्मों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व देखने को मिलता था।
मध्यकालीन आक्रमण और परिवर्तन
मध्यकाल में मथुरा को कई आक्रमणों का सामना करना पड़ा। 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने इस नगर पर आक्रमण कर कई मंदिरों को क्षति पहुंचाई। इसके बाद दिल्ली सल्तनत के शासक सिकंदर लोढ़ी के शासनकाल में भी मंदिरों का विनाश हुआ और धार्मिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचा। मुगल काल में सम्राट औरंगजेब के समय श्रीकृष्ण जन्मभूमि के निकट शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया गया, जिसे लेकर ऐतिहासिक और धार्मिक चर्चाएं आज भी जारी हैं। इस काल में धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियों ने मथुरा की संरचनात्मक और सांस्कृतिक स्थिति को प्रभावित किया।
कला, संस्कृति और पुरातात्विक महत्व
मथुरा प्राचीन काल से ही कला और मूर्तिकला का केंद्र रहा है। मथुरा कला शैली की मूर्तियां अपनी विशिष्टता, भावभंगिमा और लाल बलुआ पत्थर के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां से प्राप्त बौद्ध, जैन और हिंदू मूर्तियां भारतीय कला इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित मथुरा संग्रहालय में इन दुर्लभ मूर्तियों और अवशेषों का विशाल संग्रह सुरक्षित है, जो मथुरा के गौरवशाली अतीत का जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करता है।
आधुनिक मथुरा और धार्मिक पर्यटन
आज मथुरा धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि, द्वारकाधीश मंदिर, विश्राम घाट, कंस किला और वृंदावन जैसे निकटवर्ती तीर्थ स्थल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। जन्माष्टमी, होली और अन्य धार्मिक उत्सव यहां विशेष धूमधाम से मनाए जाते हैं, जिससे शहर की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होती है।
पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों के कारण मथुरा की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है और यह शहर आधुनिकता के साथ अपनी परंपराओं को संजोए हुए आगे बढ़ रहा है।
मथुरा का इतिहास पौराणिक कथाओं, धार्मिक आस्था, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और सांस्कृतिक विकास का अद्भुत संगम है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने के कारण यह शहर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, वहीं पुरातात्विक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसकी पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय के साथ अनेक आक्रमणों और परिवर्तनों के बावजूद मथुरा ने अपनी आध्यात्मिक गरिमा और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखा है। आज भी यह नगर भारतीय सभ्यता की जीवंत धरोहर के रूप में श्रद्धालुओं, इतिहासकारों और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता है।














