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    मतदाता कैसे तय करेगा जनादेश: एक बड़ा सवाल

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    वोटर क्यों उदासीन है?

     यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता से बाहर करने और गैर-मोदीवादियों की सरकार बनाने के मद्देनजर होगा। यह तो साफ है, लेकिन गैर-मोदीवादी कौन हैं, यह अभी न तो तय है और न ही अभी परिभाषित है। लिहाजा कथित ‘महागठबंधन’ आकार नहीं ले पाया है। बेशक मंच पर विपक्षी दलों के नेता एकजुटता की बात कर रहे हों, लेकिन चुनाव अलग-अलग लड़ रहे हैं, ये कड़वी सच्चाई है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में एनसीपी और तमिलनाडु में द्रमुक का गठबंधन होता रहा है। बिहार में कांग्रेस और राजद साथ में गठजोड़ कर सकते हैं। सवाल है कि एकजुट विपक्ष की तस्वीर कहां गायब है?

    2014 में आजादी के बाद पहली बार केंद्र में विशुद्ध गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। कांग्रेस सत्ता से हटी ही नहीं 44 के आंकड़े पर सिमटकर मान्यता प्राप्त विपक्षी दल की हैसियत से भी वंचित हो गई। बीते पांच साल में देश ने बहुत कुछ अच्छा-बुरा देखा। सरकार की सफलताओं और विफलताओं को लेकर अन्तहीन बहस भी चलती रही। राजनीतिक घटनाक्रम भी अत्यंत रोचक रहा जिसका सार यदि निकाला जाए तो भले ही कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार न हो सका हो किन्तु भाजपा ने अपने आपको सही अर्थों में राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित कर लिया जो 2014 के पहले तक अकल्पनीय माना जाता था।

    इसका श्रेय निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को देना होगा लेकिन इसी के साथ ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इस अंधी दौड़ में भाजपा ने अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से काफी समझौते किये जो सफलता के शोर में भले ही उपेक्षित हो गए हों किन्तु सत्ता की चाहत में कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते-लगाते कांग्रेस युक्त भाजपा जैसी स्थिति भी बनती गई। बावजूद उसके बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी ने पूरे पांच साल अपने को प्रासंगिक बनाये रखा और ये कहना गलत नहीं होगा कि ये चुनाव भी पूरे देश में मोदी समर्थन और मोदी विरोध पर आकर सिमट गया है।

    हिन्दी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हार के बाद बीजेपी की पेशानी पर पसीने की बूंदें साफ देखी जा सकती थीं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने पहले बजट और उसके बाद पाकिस्तान के विरुद्ध बेहद आक्रमक रवैया अपनाते हुए पूरे देश का राजनीतिक वातावरण और सन्तुलन दोनों उलट पुलट कर दिए। इस वजह से विपक्ष जिन मुद्दों को बीते एक साल से जोरशोर से उठाते हुए भाजपा की राह में कांटे बिछा रहा था वे सभी फिलहाल तो गौण होकर रह गए हैं। वहीं दूसरी सबसे खास बात ये हुई कि सोनिया गांधी की लगातार कोशिशों के बावजूद भी गैर भाजपा पार्टियां एक झण्डे के तले नहीं आ सकीं।

    यद्यपि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग भाजपा विरोधी गठबंधन बने किन्तु उनका राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा। बिहार में लालू के जेल में होने की वजह से महागठबंधन का जितना हल्ला था उसके मुताबिक कुछ नहीं हो पा रहा और जिस उप्र को दिल्ली की सत्ता का प्रवेश द्वार माना जाता है वहां भी सपा-बसपा ने कांग्रेस से सलाह लेने तक की जरूरत तक नहीं समझी। अपनी उपेक्षा से आहत होकर वह अकेली मैदान में उतर रही है। इस वजह से भाजपा पर जो मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सकता था वह नहीं हो सका। इसका एक कारण घोर भाजपा विरोधी दलों के बीच कांग्रेस को लेकर सन्देह का भाव भी है।

    कांग्रेस द्वारा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे लाया जाना भी इसके पीछे है। इस तरह विपक्षी दल चाहते हुए भी मोदी के विरोध में एकजुट होने का एहसास नहीं दिला सके। यही कारण है कि दिसम्बर 2018 में जो प्रधानमंत्री कमजोर लगने लगे थे वही दौड़ में सबसे आगे निकलते दिखाई देने लगे। पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले ने केंद्र सरकार की जमकर किरकिरी कर दी थी लेकिन उसके बाद जो हुआ उसने पांसा पलटकर रख दिया। दबी जुबान ही सही लेकिन गैर भाजपाई दल भी ये स्वीकार करने लगे हैं कि बालाकोट में की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने मोदी लहर को काफी हद तक पुनर्जीवित कर दिया है। लेकिन भाजपा यदि इसी खुशफहमी में रही तो उसके अच्छे दिन झमेले में पड़ सकते हैं। इसका कारण चुनाव अभियान का लंबा चलना है। जिन मुद्दों से जंग की शुरूवात होगी वे पूरे समय गर्म रहें ये कहना कठिन है।

    राफेल के मामले को भले ही ठंडा माना जा रहा हो किन्तु सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई के दौरान कोई ऐसी बात निकल आई जो प्रधानमंत्री के लिए नुकसानदेह हुई तब भाजपा के लिए स्थिति को संभालना बहुत कठिन हो जाएगा। अयोध्या विवाद में भी क्या स्थिति बनती है कोई नहीं बता सकता। सर्जिकल स्ट्राइक के श्रेय को प्रासंगिक बनाये रखना भी उतना आसान नहीं है जितना सोचा जा रहा है। उस दृष्टि से आगामी दो महीने बेहद असमंजस भरे होंगे जिनमें राजनीतिक दलों को भरी गर्मी में न सिर्फ पसीना और पैसा बहाना पड़ेगा अपितु जनता के सवालों का जवाब भी देना पड़ेगा।

    लोकसभा के साथ आंध्र, उड़ीसा, अरुणाचल और सिक्किम की विधानसभा के लिए भी मतदान होगा। पहले संभावना जताई जा रही थी कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव भी लोकसभा के साथ करवाये जा सकते हैं लेकिन वैसा नहीं हुआ। इसी तरह 2020 में भी चुनावी बिगुल बजता रहेगा। लेकिन आम चुनाव की घोषणा होते ही अब यह साफ हो गया कि तकरीबन सवा दो महीने तक पूरा देश चुनाव के रंग में डूबा रहेगा। एक वाक्य में भारत की चुनाव प्रक्रिया को परिभाषित करना हो, तो उन्हें पारदर्शी, निष्पक्ष, निर्भीक करार दिया जा सकता है।

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि कि बीते तीन दशकों में पहली बार लगा था कि किसान, उसकी फसल, उसके सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक सरोकारों पर 2019 के चुनाव केंद्रित कर सकते हैं, लेकिन पुलवामा और पाकिस्तान के बालाकोट में हमारी वायुसेना के हवाई हमले के बाद स्थितियां और मानस ही बदल गए। किसान, किसानी ही नहीं, बेरोजगारी, महंगाई के साथ-साथ नोटबंदी, जीएसटी और अन्य मुद्दों की गूंज तो रहेगी, लेकिन फोकस राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और पाकिस्तान पर ज्यादा रहेगा और वे मुद्दे ही जनादेश तय करते दिखाई देंगे। सवाल है कि क्या ये चुनाव भावुकता पर आधारित होंगे? तो क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों का क्या होगा?

    क्या मोदी और भाजपा को ‘राष्ट्रवाद’ का पर्याय मान लिया जाएगा? इस चुनाव से भारत का भाग्य और भविष्य दोनों जुड़े हुए हैं। नतीजे क्या होंगे ये तो मतदाता ही तय करेंगे किन्तु यदि विकास, सुरक्षा और स्थायित्व लोगों के मन में बैठे तब मोदी सरकार की वापिसी की उम्मीद है किंतु मतदाताओं ने यदि इनसे अलग हटकर विचार किया तब परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। देश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है। अब राजनीतिक दल और उनके नेता ज्यादा ही सक्रिय हो जाएंगे, हेलीकॉप्टर उड़ने लगेंगे, जनसभाएं सजने लगेंगी और जनता के सामने आश्वासन परोसे जाएंगे। इस पूरी कवायद में से निकलेगा-जनादेश। वही हमारे लोकतंत्र का बुनियादी हासिल है।
    राजेश माहेश्वरी

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